समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने ओम प्रकाश राजभर से हाथ मिला कर ये साफ़ कर दिया कि, वो किसी की आगे झुकेंगे नहीं. जिनको साथ आना है साथ आये, सीटों की शर्तों पर कोई भी गठबंधन मंजूर नहीं. अखिलेश यादव की सेना हर दिन मजबूत होती नज़र आ रही है. कभी बसपा, कभी कांग्रेस के नेताओं का अखिलेश से मिलाना ये साबित कर रहा है, कि बीजेपी के अलावा अगर कोई विकल्प है, तो वो है समाजवादी पार्टी. अखिलेश को अभी जरूरत है पश्चिम में अपना किला मजबूत करने की साथ ही साथ अपनों को साथ लाने की यानि जरूरत हैं  JS फैक्टर की.
‘क्या हैं JS फैक्टर’
राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख जयंत चौधरी और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया (प्रसपा) के चीफ शिवपाल यादव ये वो फैक्टर हैं जो सपा प्रमुख अखिलेश यादव को विधानसभा में जीत हासिल करवाने में बड़ा कारक साबित हो सकते हैं. अगर बात करें राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख जयंत चौधरी की तो पंचायत चुनाव तक सब ठीक-ठाक चल रहा था लेकिन हापुड़ के नूरपुर में हुई राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख जयंत चौधरी की सभा ने मानो रातों रात सब कुछ बदल दिया. उनके गठबंधन पर दिए  7  अक्टूबर के  बयान  “समाजवादी पार्टी से गठबंधन 2022 की बात है और उसकी बात 2022 में ही करेंगे” ने मानो अखिलेश यादव के पश्चिम उत्तरप्रदेश विजय रथ पर विराम सा लगा दिया. हालांकि, सपा के साथ न जाने की बात कही नहीं, पर इशारों इशारों में सपा से अच्छी पेशकश की उम्मीद भी जता दी. कांग्रेस के हाथ ना थामने की बात अपने अगली सभा में कहकर ये साफ़ कर दिया की इस बार कांग्रेस के साथ नहीं जायेंगे.
शिवपाल के साथ आने पर होगा बड़ा फायदा
दूसरी तरफ चाचा शिवपाल अगर सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ आ जाते हैं तो उन सभी जगह जहां अखिलेश यादव ने जीती हुई बाज़ी हारी थी उन सभी जगह एक बार फिर साइकिल की सवारी कमल पर भारी पड़ सकती है. आज कौशाम्बी में दिए बयान (हम सपा के साथ जाने को तैयार हैं ) ने ये साफ़  कर दिया कि, चाचा अभी भी साइकिल की सवारी करने को तैयार हैं लेकिन अंतिम फैसला अखिलेश का होगा.
अगर साथ आते हैं तो एक बार फिर सारा कुनबा एक साथ खड़ा होगा
“JS ” ये दोनों वो बड़े फैक्टर हैं, जो अखिलेश के लिए संजीवनी का काम कर सकते हैं. अपने दोस्त राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख जयंत चौधरी का हाथ और चाचा का आशीर्वाद कब मिलता हैं, इस पर पक्ष और विपक्ष दोनों की निगाहें टिकीं हैं.

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