लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और महामंत्री ओंकार भारती ‘बाबा’ अब छात्र राजनीति में ब्रांड बन चुके हैं। ‘बाबा’ लम्बे समय बाद फिर छात्र राजनीति में सक्रिय हो रहे हैं। इस बार उन्होंने देश भर के छात्र संगठनों को एक मंच पर लाने के लिए अखिल भारतीय छात्र महासभा बनाई हैं। उन्होंने देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र नेताओं से इस संगठन से जुडऩे के लिए सम्पर्क करना शुरू कर दिया है। निकट भविष्य में उनकी विश्वविद्यालयों समेत तमाम विद्यालयों के छात्रनेताओं को एक मंच पर लाने की योजना है।

बाबा ने फिलहाल छात्र महासभा को आम राजनीति से दूर रखने की बात कहीं है। लेकिन बाबा के इरादों में लोकनायक जयप्रकाश की झलक दिखाई देती है। आपातकाल के दौरान जयप्रकाश जी ने भी इसी तरह छात्रों को एक मंच पर लाकर और उन्हें आंदोलन का अगुआ बनाकर सत्ता के खिलाफ जंग छेड़ी थी। मायावती के राज में लगे छात्र संघ चुनावों पर प्रतिबंध के बाद राजनीति की नर्सरी छात्र राजनीति में सूखा पड़ा था लेकिन सपा की सत्ता में वापसी से एक बार फिर राजनीति की नर्सरी हरी भरी होने को है। छात्र राजनीति को उसके सुनहरे दिन वापस लौटाने के ऐलान के साथ ही बाबा फिर मैदान में हैं। वर्षाें लखनऊ युनिवर्सिटी कैम्पस से दूर रहने के बाद भी ओंकार भारती बाबा का भौकाल टाइट है। यकीन न हो तो छात्र संघ के सम्भावित उम्मीदवारों के पोस्टर व बैनर देख लीजिए। उभरते छात्र नेताओं में अपने नाम के आगे बाबा लगाने की होड़ मची हुई है। बाबा सिर्फ छात्रनेता ही नहीं रहे बल्कि मेधावी छात्र भी रहे हैं। बाबा देश के एकमात्र छात्रनेता हैं जिन्होंने छात्र राजनीति के साथ ही छात्र राजनीति पर पीएचडी भी की है।

हबीबुल्ला छात्रावास में रहने वाले बाबा और गोमतीनगर में अखिल भारतीय छात्र महासभा के कार्यालय में बैठने वाले बाबा के तेवरों में रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा है। जब कहीं छात्र उत्पीडऩ की बात सुनाई पड़ती है तब बाबा अपने युनिवर्सिटी वाले तेवर में लौट आते हैं। अभी कुछ दिन पहले लविवि कैम्पस में जब छात्राओं पर पुलिस की लाठियां चली थीं तब ओंकार भारती बाबा ने घटना के विरोध में आवाज उठाई थी। ओंकार भारती बाबा के संघर्ष को लखनऊ विवि परिसर ने न सिर्फ देखा है बल्कि महसूस भी किया है। परिसर में नहीं बल्कि परिसर के बाहर भी बाबा छात्रों के सुख दुख में साथ दिखाई दिए। छात्र छात्राओं मे बाबा की लोकप्रियता का यह आलम था कि बाबा ने लखनऊ विश्व विद्यालय छात्रसंघ के महामंत्री और अध्यक्ष का चुनाव जेल में रहते हुए जीता था। वर्ष 1995 में तो अध्यक्ष पद के लिए खड़े ओंकार भारती बाबा को लड़कियों के कैलाश छात्रावास के शत प्रतिशत वोट भी मिले थे।

यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि बाबा ने वर्ष 2002 में गोंडा की कटरा विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव भी लड़ा था। लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति उन्हें बिलकुल रास न आई। कांग्रेस के मंच पर जब उन्होंने छात्रहितों व युवाओं की बात उठाई तो कांग्रेस के कई पुरोधाओं को बाबा की सोच रास न आई। एक बार सार्वजनिक मंच पर जब बाबा कांग्रेस में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने पर अपनी बात रख रहे थे तभी कुछ नेताओं ने टोकाटाकी की। उसी समय रीता बहुगुणा जोशी और कई नेताओं के सामने बाबा ने कांग्रेस छोडऩे का ऐलान कर दिया। बाबा के इस फैसले पर चकित नेताओं ने बाबा को मनाया पर बाबा ने कहा कि जहां युवाओं और छात्रों की कोई कदर नहीं वहां उन्हें एक पल भी नहीं रहना। अतुल कुमार अनजान को अपना आदर्श मानने वाले बाबा पुराने छात्रों के लिए आज भी सहज उपलब्ध हैं। लखनऊ युनिवर्सिटी के छात्रावास में रहने वाले विशेषकर ग्रामीण परिवेश से आए छात्रों के लिए बाबा औरों से हमेश एक कदम आगे बढ़ कर दिखे। बाबा का मानना है कि आज के छात्रों में वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं रही। संगठित नहीं हो पा रहे हैं। एक साजिश के तहत फीस बढ़ाकर ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों को विश्वविद्यालयों में आने से रोका गया। रही बात शहरी छात्रों की, तो उनमें संघर्ष करने की क्षमता ही नहीं रही। इसका कारण उनके अभिभावक भी हो सकते हैं, जिनके साथ छात्र रहते हैं। आंदोलन में ग्रामीण क्षेत्र के ही छात्रों की अहम भूमिका होती है। शहरी छात्रों में भी संघर्ष की क्षमता को विकसित करना है। बाबा छात्र राजनीति में उभरते छात्रनेताओं के लिए इन दिनों अभिभावक का काम कर रहे हैं। बाबा कहते हैं कि कई नए छात्र नेता मेरा नाम अपने बैनर पर लिखवाने को उतावले हो रहे हैं पर उन्हें यह कह कर मना करना पड़ता है कि पहले छात्रसंघ चुनाव की घोषण तो हो जाने दो। सपा ने कम से कम छात्र संघों को बहाल कर दिया है अब चिंता किस बात की। बाबा कहते हैं कि छात्रसंघ चुनाव में उम्र की बंदिश को खत्म किया जाना चाहिए इसके लिए मुख्यमंत्री से मिलकर वह अपनी बात रखेंगे।

समाजसेवा में भी पीछे नहीं बाबा

बता दें कि ओंकार भारती के नाम आगे लगा ‘बाबा’ शब्द अकारण नहीं है। कुछ लोग इसे छात्र राजनीति के लिए आवश्यक मानते हैं, लेकिन भारती वास्तव में ‘बाबा’ हैं। एक बार की घटना है। 1995 की बात है। वह कैलाश छात्रावास की ओर से गुजर रहे थे। सडक़ किनारे कई फीट गहरा गड्ढा खुदा था। वहां पर काफी भीड़ लगी थी। जिज्ञासावश रुक गए। देखा कि गड्ढे में स्कूटर सहित एक व्यक्ति गिर गया है। उसके साथ छोटी सी बच्ची भी थी। बाबा ने न आव देखा न ताव। कूद गए गड्ढे में। पहले बच्ची को निकाला। बाहर उसकी मां रो रही थी। फिर स्कूटर हटाकर अचेतावस्था में पड़े व्यक्ति को बाहर निकाला। इतना ही नहीं अस्पताल तक पहुंचाया और भर्ती कराया। उस व्यक्ति की पत्नी के अनुरोध पर फोन कर घर वालों को बताकर चुपके से वहां से निकल लिए। इस घटना को कैलाश छात्रावास में रहने वाली सभी लड़कियों ने देखा। कुछ ही दिनों बाद छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए शत-प्रतिशत छात्रावासी लड़कियों ने उनको वोट दिया।

शोध भी छात्र राजनीति पर

लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष और पूर्व महामंत्री ओंकार भारती बाबा देश के पहले छात्र नेता हैं जो पिछले बीस सालों से न सिर्फ छात्र राजनीति में सक्रिय हैं बल्कि उन्होंने ‘छात्र नेतृत्व के अभरते प्रतिमान’ विषय पर शोध भी की है। छात्र राजनीति और नेतृत्व पर शोध का विचार बाबा को कब और कैसे आया इस पर बाबा कहते हैं कि वह सोशल वर्क के स्टूडेंट थे। पीजी के बाद जब रिसर्च की बात आई तो टॉपिक भी चुनना था। उन्हीं दिनों कुलपति महेंद्र सिंह सोढ़ा से मुलाकात हुई और उन्होंने कहा बाबा तुम छात्र संघ के महामंत्री रह चुके हो और छात्र राजनीति में अच्छी पैठ है तुम्हारी, तो क्यों नहीं छात्र राजनीति पर ही रिसर्च कर लेते हो। बात में दम था बस जुट गए छात्र राजनीति पर शोध के मंथन में। अपने प्रोफेसरों से राय ली। डॉ. ए एन सिंह के रूप में मुझे गाइड मिल गए। दुर्घटना व कुछ निजी कारणों के चलते शोध में कुछ समय लग गया लेकिन, डॉ. ए एन सिंह ने शोध कराने में बहुत मदद की। अपने रिसर्च वर्क के लिए सामग्री जुटाने में मुझे दिल्ली के कुछ साथियों की मदद लेनी पड़ी। हमारे रिसर्च वर्क में डॉ. विवेक सिंह जो कि हमारे सहपाठी थे और अब कानपुर विश्वविद्यालय में हैं ने बहुमूल्य सामग्री जुटाने में मदद की। इसी तरह हमारे साथी पॉलटिकल साइंस के डॉ. मृत्युजंय मिश्र जो कि अब उत्तराखंड सरकार में सहायक निदेशक उच्च शिक्षा हैं, ने भी युवा नेतृत्व पर उपयोगी सामग्री भेजी। इसी के साथ लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ भवन के कर्मचारी पंत बाबू और राजेश श्रीवास्तव ने हमारे रिसर्च वर्क को संकलित करने में मदद की उन्हें सिलसिलेवार ढंग से एक पुस्तक की शक्ल दी। सबसे महत्वपूर्ण पल वह था जब इस शोध पर हमारा इंटरव्यू हुआ। यह इंटरव्यू जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सोशल वर्क डिपार्टमेंट के प्रो. संजय सिन्हा आए थे उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के सोशलवर्क डिपार्टमेंट के प्रो. आर के सिंह से पूछा कि बताओ बाबा से क्या पूछना है। इस पर प्रो. बोले क्या बताए भाई। जो पूछना हो पूछिए। बाबा ने जेके ब्लॉक वह भवन जहां समाजशास्त्र और समाजकार्य विभाग दोनों ही हैं के लिए बहुत सारे ऐसे काम किए हैं जो समाजकार्य का आदर्श उदाहरण हैं।

आवंछित तत्वों को रोकने के साथ ही छात्र-छात्राओं को कक्षाओं में जाने के लिए प्रेरित करना और पढ़ाई का माहौल बनाने में भी बाबा की भूमिका है। जेएनयू के प्रोफेसर साहब बहुत प्रभावित हुए और हमारी तारीफ की|

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