कोरोना वायरस से निपटने के लिए पीएम मोदी की अपील पर राजधानी लखनऊ में सभी जगह लोग खुद को घरों में कैद लिया है। पूरे शहर में जनता कर्फ्यू का असर दिख रहा है। सड़कों पर सन्नाटा पसरा है। दूसरी तरफ घंटाघर पर प्रदर्शन कर रही महिलाओं को कोरोना का खौफ नहीं है। वह अपने साथ दूसरों की जिंदगी को भी खतरे में डाल रही हैं।

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर घंटाघर पर महिलाएं पिछले तीन महीनों से प्रदर्शन कर रही है। प्रदर्शनकारी शबीह फातिमा का कहना है कि कोरोना से बचाव के सभी तरीके अपनाए जा रहे हैं लेकिन जब तक सरकार कानून वापस नहीं लेगी उनका प्रदर्शन जारी रहेगा। वहीं, कोरोना वायरस फैलने के बाद प्रदर्शन में शामिल रही महिलाएं भी अब इस प्रदर्शन का स्थगित करने की बात कह रही है। सदफ जाफर कहती हैं कि केन्द्र सरकार ने कोरोना को महामारी घोषित कर दिया है। इसका इलाज सिर्फ बचाव है।

अब समाजिक जिम्मेदारी निभाएं प्रदर्शनकारी महिलाएं
सदफ जाफर कहती हैं कि पूरे देश में जरूरी चीजों को छोड़ कर पूरे देश बंद है तो घंटाघर पर बैठी महिलाओं को अभी अपनी समाजिक जिम्मेदारी को निभाना चाहिए। प्रदर्शन में महिलाएं एक दूसरे के पास पास बैठी हैं। इससे संक्रमण का अधिक खतरा है। बचाव की साधन उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में हमें इंसानियत के खातिर कुछ दिनों के लिए धरना स्थगित कर देना चाहिए। हालात सामान्य होने पर फिर से धरना दे सकते हैं। शनिवार को मैं महिलाओं को समझाने गई थी लेकिन वह नहीं मानी।

इंसानियत के खातिर खत्म करें धरना
मशहूर शायर मुनव्वर राणा की पुत्री सुमैया राना का कहना है कि इस्लाम ने हमेशा इंसानियत को बचाने का संदेश दिया है। ऐसे में घंटाघर पर महिलाओं को अपना प्रदर्शन समाप्त कर देना चाहिए या फिर सांकेतिक रूप से एक या दो महिलाएं ही वहां पर बैठे। सबकी जिंदगियों को खतरे में डालना गलत है।

कुछ महिलाओं की वजह से सबकी जान खतरे में
इस वक्त जो पूरी दुनिया में महामारी चल रही है। हर एक को भीड़ से बचना चाहिए। जहां तक घंटाघर की बात है। इस धरने का कोई लीडर नहीं है। कुछ औरतों की वजह से सैकड़ों औरतों की जान को खतरा है। जो औरतें धरने पर बैठी है उनको आपस में बात करके इसे स्थगित करने के बारे में सोचना चाहिए।

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