कानपुर के एक अस्पताल से वरिष्ठ पत्रकार संजीव मिश्र की फेसबुक वाल से साभार
‘छोड़ आए हम वो गलियां’ माचिस फिल्म के इस गीत ने सुबह छह बजे मेरी नींद उड़ा दी। घर हो या कहीं बाहर? जगने से पहले वाली नींद में खलल मुझे कभी बर्दाश्त नहीं होता है। गुस्से में आवाज की दिशा में बढ़ा तो देखा बगल के रूम में एक हम उम्र व्यक्ति अकेला बेड पर गुमसुम बैठा गाना सुनता टप-टप आंसू बहा रहा है। उसकी हालत देख गुस्सा बिल्कुल ठंडा पड़ गया। अपने बेड पर लौट आया। थोड़ी देर उसके बारे में सोचा फिर सो गया, क्योंकि रात दो बजे एडमिट होने के बाद साढ़े तीन बज गए थे सोते-सोते और फिर ढाई घंटे बाद ही जबरन जगा दिया गया था। यह कानपुर के एक कोविड अस्पताल का वाकया है, जिसमें 21 सितम्बर को मैं भी जमा कर दिया गया था। यहां से रोज कोरोना विजेता घर लौट हैं फिर भी न जाने क्यूं संघर्षरत संक्रमितों में वायरस का खौफ इस कदर हावी है कि उससे जीतने वालों की उपलब्धि दबकर रह जा रही है।
ऐसे ही एक दिन काली बदरी के बाद ठंडी हवा के साथ रिमझिम फुहारों ने मौसम बेहद खुशनुमा कर दिया था अस्पताल में अस्थाई रूप से बनाए गए डाइनिंग हाल में गहराती शाम को खिड़कियों से बाहर झांकती कुछ मायूस आंखें भविष्य की आशंकाओं के घटाटोप अंधेरे में सरेंडर सी थीं। मौसम की खूबसूरती भी उनके मस्तिष्क में चल रही अनचाहे विचारों की जंग को रोक न सकी। वे ना उम्मीदी और निराशा के भंवर में फंसे थे, क्योंकि उम्र के छठे व सातवें दशक में उनकी बहुत सी जिम्मेदारियां अभी अधूरी थीं। छह सात लोगों में तीन महिलाएं भी थीं, जिनके चेहरे पर कुछ ज्यादा ही तकलीफ झलक रही थी। कोई किसी से बात न कर खिड़की के बाहर शून्य में निहार गहरी सोच में डूबा था। यह दृश्य देख हाल ही में कहीं पढ़ीं वे लाइनें अचानक याद आ गईं,
” मुझे वहाँ से पढ़िए
जहाँ से मैं खामोश हुआ हूँ'”
अब मुझे पहले दिन सुबह-सुबह नींद तोड़ने वाले गाने का मतलब समझ में आ गया था। उसकी कनेक्टीविटी यहां मिली थी, जो कोविड मरीजों की मनोदशा बता रही थी। कुछ लोग सचमुच क्रिटिकल हैं, बाकी को दहशत और परिवार के भविष्य की चिंता खा रही है। इस बार मैंने सन्नाटा तोड़ने का फैसला किया। बात शुरू की एक हल्के से सवाल से कि आप शहर में कहां-कहां से आए हैं? अचानक सोच भंग होने पर सबने मुझे देखा तो लेकिन शायद कुछ लोगों को अपनी प्राईवेसी में यह दखल अच्छा नहीं लगा। बस तीन चार लोगों ने जवाब दिया। कोई किदवई नगर से आया था, तो कोई कर्रही, शास्त्री नगर या किसी अन्य मोहल्ले से। थोड़ी ही देर बात करने से पता चल गया कि ये लोग कोरोना की दहशत से आधी लड़ाई पहले ही हार चुके हैं। एक ने बताया कि परिवार को मानसिक रूप से तैयार करके आया हूं। एक महिला ने कहा, छोटी बेटी को और विदा कर देती लेकिन भाग्य में शायद यह नहीं लिखा है। किसी ने बताया कि पत्नी को सब कुछ समझाकर आया हूं। बीच में ही एक मरीज बात आगे बढ़ाते हुए गहरी सांस खींचकर बोला, हां भाई साहब हम भी सब बीमा पाॅलिसियां अपडेट करवा आए हैं, फिर निराशा भरी हंसी के साथ जमीन पर देखते हुए धीमी आवाज में बुदबुदाया कि क्या पता अब पाॅलिथिन में लिपट पार्सल बनकर ही निकलना हो। इनकी बातें सुन मन अंदर तक कांप उठा। सब कोरोना की भयानकता और संक्रमित पर उसके चरणबद्ध असर की अपने-अपने ढंग से व्याख्या कर रहे थे। मसलन यह वायरस अजगर की तरह शरीर को धीरे-धीरे निगल जाता है या शुरू के चार दिनों तक धीमे असर के बाद अगले सात आठ दिन बारी-बारी ऑरगन्स पर अटैक कर सुला देता है। कुल मिलाकर सब निगेटिव सोच के साथ ही आए हैं।
सबको वे दृश्य भी याद आते रहते हैं जब उन्होंने अस्पताल आते समय अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों की आखों में नमी के बीच घर से अस्पताल को विदा ली थी। ऐसा नहीं कि घर से निकलते समय मेरे अंदर भय नहीं था। लेकिन सौभाग्य से शरीर में वायरस के घुसते ही तुरंत सक्रिय हो गया था। अस्पताल का माहौल भी नि:शब्द सा या मौत के बाद के सन्नाटे जैसा था। अन्य अस्पतालों की तरह न शोर न भीड़, न दौड़ भाग। जो संक्रमित हैं उनकी पहले ही वायरस ने घिघ्घी बंधवा दी हो तो आवाज निकले भी कैसे। माहौल बदलने के लिए इसी लिए सोचा थोड़ी देर बात करके देखते हैं। लेकिन उनके ग्रुप में शामिल होना थोड़ा मुश्किल था। लिहाजा इसके लिए पहले तो उन जैसी ही बातें कीं। कहा यहां सांस भी उखड़ जाए तो रोने वाला कोई नहीं। पड़ोसी बेड का मरीज उसे चुपचाप पन्नी में लिपटते देखने को मजबूर है। दुर्भाग्य से यदि किसी पड़ोसी संक्रमित की मौत हो गई तो उसका आत्मविश्वास और टूट जाता है। हां एक अच्छी बात बताना भूल गया कि मेरे आने के बाद से अब तक यहां कोई मौत नहीं हुई। लेकिन यहां भर्ती होने वाला हर दूसरा संक्रमित चेहरे पर एक खौफ के साथ ही नजर आया। खैर थोड़े दिनों के लिए यहां आया हूं तो चाहता था कि संघर्ष कर रहे लोगों का डर निकालने में खुद को व्यस्त कर लूं। मैं ऐसा इसलिए सोच पा रहा था क्योंकि अभी मेरा शरीर ठीक से रिस्पांस दे रहा है। बातों का सिलसिला बढ़ा और जब वे मुझे भी अपनी नाव का सवार समझ सिर हिलाते ‘ ठीक कह रहो हो भैया ‘ बोलने लगे तो मैंने धीरे से यूटर्न लिया। उनसे सवाल कर दिया कि क्या जो शरीर वर्षों की मेहनत से बना है, हमें बिना लड़े उसे यूं ही एक वायरस से हार मान मौत को सौंप देना चाहिए? फिर उन्हें अपने बारे में भी बताया कि हाईपर टेंशन, हाई बीपी और डाइबिटिक तो हूं ही आधा लीवर भी गंवा चुका हूं। बीमारियों के चौतरफा अटैक के बावजूद कोरोना वायरस से भी संघर्ष के लिए मानसिक रूप से तैयार होकर आया हूं और घर भी लौटूंगा। उन्हें यह भी बताया कि फालतू की बातें दिमाग में न आएं इसके लिए मैंने मोबाइल को ही अपना मेंटर बना रखा है। आप भी ऐसा ही करें और मोबाइल पर अपनी पसंद का मनोरंजन ढूंढ निकालें। प्रवचन या मोटिवेटरों की स्पीच सुनिए। मस्ती भरे गाने सुनिए, यू ट्यूब पर कॉमेडी फिल्में देखिए। घर लौटने पर जिंदगी की अधूरी ख्वाहिशें कैसे पूरी करेंगे, इम्युनिटी कैसे बढाएं, डाइट में इसके लिए क्या तब्दीली लाएं इसके बारे में प्लान तैयार कीजिए। 102 साल का इंसान भी जब यह जंग जीत सकता है तो हम और आप क्यों नहीं? सभी सहमत थे। इसके बाद उनके चेहरों पर हल्की सी ही सही पर रौनक लौटती दिखी। यह कुछ मिनटों के मरहम का सूक्ष्म असर था। दरअसल कोविड अस्पतालों को काउंसलरों या मेंटरों की जरूरत नजर आ रही है। यदि संक्रमितों के मन से भय निकल सके तो रिकवरी में काफी रफ्तार आ सकती है। इस वायरस से लड़ाई के दौरान मरीज मानसिक तौर पर टूट जाता है। इसीलिए काउंसलर या मेंटर की भूमिका कोविड हाॅस्पिटलों में और भी अहम हो जाती है। काउंसलर लम्बे समय से दौड़ते भागते मरीजों की सेवा में लगे डाॅक्टरों, नर्सिंग व अन्य सपोर्टिंग मेडिकल स्टाफ की भी काफी मदद कर सकते हैं, क्योंकि अब वे भी शारीरिक और मानसिक तौर पर थक रहे हैं, चिड़चिड़ा रहे हैं और बीमार पड़ रहे हैं।

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