Planning Commission
Planning Commission of india

कितने स्मार्ट हैं हम?

आजकल पूरे देश को मंदी की आहट से कठोर फैसले लेने और फिजूलखर्ची रोकने वाली सरकार की नजर योजना आयोग पर नहीं पड़ रही है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री सरकारी खर्चों में कटौती की बात करते हैं। वहीं, दूसरी ओर उनकी नाक के नीचे जमकर फिजूलखर्ची हो रही है। गरीबों के लिए योजना बनाने वाला योजना आयोग खुद जनता की गाढ़ी कमाई को उड़ाने में लगा है। पर उपदेश कुशल बहुतेरे वाली कहावत योजना आयोग पर लागू हो रही है। गरीबों को 28 रूपए से कम में प्रतिदिन गुजारा करने की नसीहत देने वाला योजना आयोग अपने कार्यालय के शौचालयों की साज सज्जा पर ही 35 लाख रुपए खर्च कर रहा है। सूचना के तहत समाजसेवी सुभाष अग्रवाल द्वारा मांगी जानकारी में यह चौंकाने वाला सच सामने आया। योजना अयोग ने इस शौचालय का इस्तेमाल करने वालों को स्मार्ट कार्ड तक उपलब्ब्ध करवाया है। शौचालय की ओर जाने वाले गलियारे में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं। यह वही आयोग है जो गरीबों को घर मुहैया कराने की इंदिरा आवास योजना के तहत एक मकान के लिए 45 हजार रुपए (मैदानी इलाकों में) और 48 हजार रुपए (पहाड़ी इलाकों में) खर्च करता है। इन मकानों की मरम्मत के लिए मात्र 15 हजार रुपए दिए जाते हैं।  जहां देश की करोड़ों महिलाएं खुले मेें शौच जाने को विवश हैं जहां गांव में बसी तीन चौथाई आबादी को शौचालय नसीब ही नहीं है वहां स्मार्ट कार्ड के जरिए शौचालय का उपयोग गरीबों का मजाक उड़ाने से ज्यादा कुछ नहीं। प्रधानमंत्री आम आदमी को मंदी की मार से डराने का हरसम्भव प्रयास करते दिख रहे हैं। पहले पेट्रोल महंगा किया और अब रसोई गैस की बारी है। प्रधानमंत्री हमेशा मंदी या फिर महंगाई से निपटने के लिए कठोर कदम उठाने की बात करते हैं और कठोर कदम की पहली ठोकर भी आम आदमी को ही लगती है। चाहे सर्विस टैक्स या हो या फिर रेलवे के माल भाड़े में बढ़ोतरी। सरकार ने फिजूलखर्ची रोकने के लिए सरकारी नौकरियों पर पाबंदी समेत कई कदम उठा भी लिए गए हैं पर योजना आयोग जिसके वह अध्यक्ष हैं वहां का नजारा ही कुछ और है। योजना आयोग को मंदी की मार का कोई भय ही नहीं। मंदी को मात देने की सरकार की मुहिम को ठेंगा दिखाता है योजना आयोग। 28 रूपए प्रतिदिन खर्च करने वाले को अमीर मानने वाले आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिह अहलूवालिया ने विदेश दौरों में प्रतिदिन दो लाख रुपए से ज्यादा उड़ाए हैं। अपने कार्यकाल के दौरान 42 बार विदेश यात्राएं करने वाले अहलूवालिया ने करोड़ों रूपए किराए पर ही खर्च कर दिए। शौचालय की साज सज्जा पर 35 लाख खर्च करने देश के नीति निर्धारण करने वाले कैसे जायज कहेंगे यह एक बड़ा सवाल हैं। क्या उनको पता नहीं है कि देश के करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनका आशियाना इतने पैसे में बनता है। देश में कई सरकारी स्कूल हैं जहां आजादी के 50 से ज्यादा वर्षों के बाद भी शौचालय की सुविधा तक नहीं है। लेकिन देश की योजना बनाने वाले विभाग का यह हाल है कि उसके शौचालय की मरम्मत में जनता के टैक्स के 35 लाख रुपए फूंक दिए जाते हैं। योजना आयोग ने गरीबी की जो परिभाषा बनाई है उसकी पहले ही काफी आलोचना हो चुकी है। 28 रूपए रोज खर्च करने वाले को अमीर बताने वाले आयोग का असली मकसद तो गरीबी हटाना नहीं बल्कि गरीबों को हटाना है या कहें गऱीबों की संख्या को घटाना है ताकि कम लोगों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का फायदा देना पड़े।   व्यक्ति की गरीबी नापने का आयोग का पैमाना कैलोरी है। भोजन से मिलने वाली कैलोरी के आधार पर तय होती है गरीबी। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल कैलोरी से व्यक्ति कि गरीबी तय की जा सकती  है। किसी व्यक्ति के पास कपड़े नहीं है, घर नहीं है लेकिन लंगर में खाना खा रहा और उसे कैलौरी मिल रही है तो क्या वह गरीब नहीं है। ये पैमाना नाकाफी औैर बेहद बचकाना है।  जरा देखिए तो सही कि एक तरफ प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री सरकारी खर्चों में कटौती की अहमियत समझाते रहते हैं तो दूसरी तरफ योजना आयोग है जिसका काम ही यह सुनिश्चित करना है कि हर कोई सरकारी नीति का पालन करे वहीं दो शौचालयों की सजावट में लाखो लुटा रहा है। 35 लाख की साज सज्जा वाले व स्मार्ट कार्ड से इस्तेमाल होने वाले शौचालय में जाने वाले लोग तो दूसरी ओर प्रतिदिन 28 रूपए में अपना पेट भरने वाले लोगों के बीच गहरी होती खाई कभी भर भी पाएगी या नहीं। यह सवाल साल दर साल और जटिल होता जाएगा|

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