old ageदादी मां को अपनी पोती के बालों च चेहरे के सेहत की फिक्र है और वह पुराने जमाने के दादी मां के नुस्खे से लेकर नई जमाने के सौन्दर्य प्रसाधन तक अखबारों की कतरन से खोज निकालती हैं। पोतियों के साथ कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर उंगलियां फिराने से उन्हें गुरेज नहीं। फेसबुक पर दोस्ती उनको भी भा रही है। पोते के साथ दादी डोरीमान में व्यस्त हैं तो दादा समाचार का मोह छोड़ छोटा भीम में रमे नजर आते हैं। सुनहरी शाम को बचपन कर रहा सलाम|

बुजुर्ग घर में एक साये की तरह रहते हैं। एक ऐसा साया जिसके बिना हम कल्पना भी नहीं कर सकते। क्या अभी आपने देखा है कि हमारे बुजुर्ग जब उम्र की ढलान पर होते हैं उनमें बचपन लौट आता है। उम्र बढऩे के साथ साथ कई बीमारियां भी जर्जर शरीर को घेर लेती हैं। उन्हें वह हर काम करने का मन करता है जिसकी इजाजत न तो शरीर देता है और न ही डॉक्टर। चुपचाप रात में उठ कर फ्रिज से मिठाई खाना या फिर चुपचाप आम खाते बुजुर्गों को देख कर लगता है कि बचपन शायद लौट आया है। कभी कभी वह रात में जिद भी कर बैठते हैं कि उन्हें नींद नहीं आ रही है या फिर कुछ चटपटा खाने का मन कर रहा है। कभी कभी बाल हठ कि वह अपने घर की चौखट नहीं छोड़ेंगे और किसी की शादी व समारोह में नहीं जाएंगे आदि आदि। जरा उन बुजुर्गों को भी देखिए कि किस तरह से वह घर के सामने आइसक्रीम बेचने वाले से बहस करते हैं और अपने जमाने की दुहाई देते हैं। बीस रुपए की आइसक्रीम या कुल्फी को बड़े ताने उलाहने के बाद ही खरीदते हैं। बाबा दादी नाती पोतों को रोते नहीं देख सकते। नाती पोतों की जिद के साथ वह इस तरह खड़े होते हैं जैसे उनके सहपाठी या दोस्त हों। अपने लिए भले ही उन्हें बीस रुपए की आइसक्रीम महंगी लगे लेकिन पोते या पोतियों के लिए सौ रुपए के पिज्जे पर वह कोई बहस नहीं करते। घर के करीब लगे चाट के ठेले पर चुपचाप गोलगप्पे खाना भी उन्हें बहुत भाता है|

लेकिन हम उनके बचपन को महसूस नहीं कर पाते। ऐसा क्यों होता है कि जब बुजुर्ग हमारे सामने होते हैं,अपनी बुराइयों के साथ ही दिखाई देते हैं। अपने बच्चों की हर अदा पर फिदा नई पीढ़ी को बात-बात में टोकने वाले, कभी कभी डांटने वाले और परंपराओं का कड़ाई से पालन करते हुए दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करने वाले बुजुर्ग उन्हें बुरे क्यों लगते हैं? रात में समय असमय कभी टॉयलेट जाना या कभी टहलना अखरता क्यों हैं। याद कीजिए वह दिन जब जरा सी देह गर्म होने पर वह हमें रात रात भर टहलाते थे और हम उनकी जरा सी आहट भी नहीं बरदाश्त कर पाते। लेकिन बुजुर्ग सब जानते हुए भी अपना दर्द बेटे व बहुओं पर जाहिर नहीं होने देते। क्या कभी हमने सोचा है कि उनका मन भी करता होगा सीरियल देखने का या फिर उन्हें भी होटल या रेस्टोरेंट में खाना या जाना भाता होगा। उनका मन भी बच्चों की तरह चाउमीन खाने को करता होगा। उन्हें भी कार में लम्बी ड्राइव पर जाना अच्छा लगता होगा। यही समय होता है पीढिय़ों के द्वंद्व का। एक पीढ़ी हमारे लिए छोड़ जाती है जीने की अपार संभावनाएंं। अपने पराक्रम और जी तोड़ मेहनत व तन पेट काट कर से हमारे बुजुर्गों ने हमें पैरों पर खड़ा होना सिखाया जीवन की हरियाली दी, हमने जो मांगा वह दिया अपनी सीमाओं व इच्छाओं से परे जा कर। यहां तक कि अपनी इच्छा कभी नहीं थोपी और हमने उन्हें दिए कंक्रीट के जंगल। एक कमरा जिसमें वह घुट कर बाकी जिंदगी गुजार दें। उन्होंने दिया अपनापन और हमने दिया बेगानापन। हमारे पास उनके लिए समय नहीं। उन्होंने हमें जमीन पर चलने की कोशिश करते देखा और पहली बार अपने बलबूत पग बढ़ाने पर तालियां बजाई और अब हम उनका लडख़ड़ाना नहीं देख पा रहे हैं। हमें अहसास भी नहीं रहा कि वह हमसे बात करने के लिए छटपटाते हैं। पहले स्कूल और फिर ऑफिस से देर होने पर बाप की बेचैनी और मां की आंखों में इंतजार और दरवाजे पर टकटकी लगाना भी हमें याद न रहा। ऑफिस से आने के बाद उनके लिए समय ही न रहा। जब कभी बात होती तो यही कहते कि बेटा बहुत दुबले हो रहे काम के साथ सेहत का भी ध्यान रखो। मां सिर पर हाथ फेरती और अपने हाथों से बालों में झांकती सफेदी को ढंकने का प्रयास कती मानों यह कहतीं कि बेटा कितना भी बूढ़ा हो जाए पर उसके लिए वो बेटा छोटा बेटा ही रहता है। हम अपने बुजुर्गों के लिए समय नहीं निकाल पाते इसकी हमारे बुजुर्ग कभी शिकायत भी नहीं करते। वह हमारा बचपन अपने नाती पोतों में अपे बेटों का बचपन देखते हैं और फिर अपने बचपन से जोडऩे की कोशिश करते हैं। जीवन संध्या पर बुजुर्ग जब अपने नाती पोतों को बढ़ा होते देखते हैं तो उनके अनुसार ढल भी जाते हैं। दादी मां को अपनी पोती के बालो च चेहरे के सेहत की फिक्र है और वह पुराने जमाने के दादी मां के नुस्खे से लेकर नई जमाने के सौन्दर्य प्रसाधन तक अखबारों की कतरन से खोज निकालती हैं। पोतियों के साथ कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर उंगलियां फिराने से उन्हें गुरेज नहीं। पोते के साथ दादी डोरीमान में व्यस्त हैं तो दादा समाचार का मोह छोड़ छोटा भीम में रम जाते हैं। रिक् शा या कार में भी किसी सहारे से बैठ पाने वाले नाना नानी या बाबा दादी अपने पोते के साथ बाइक पर बैठने का साहस करते दिखते हैं। मंदिर जाने की जिद छोड़ पोते पोतियों के जन्मदिन पर केक काटने या फिर पार्टी का पूरा जिम्मा भी दादा व दादी संभाल लेते हैं। स्कूलों में भी दादा दादी या नाना नानी की मीटिंग बुलाई जाने लगी हैं। इन पार्टियों में अनुभवों व बचपन के किस्से सुन बच्चें भी पूरा आनंद लेते हैं। जीवन की सुनहरी शाम में फिर से बचपन का लौटना बेहद सुखद है। बजुर्गों में लौट रहा बचपन एक सुखद अहसास है आपके बच्चों के लिए। सुनहरी शाम पर खुद को बदलते बुजुर्गों को आपका साथ व अहसास चाहिए।

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