Kapil Sibal IIT
Kapil Sibal

आईआई कानपुर के बाद अब आईआईटी दिल्ली ने भी कपिल सिब्बल के खिलाफ बगावत का ऐलान कर दिया है। दोनो आईआईटी संस्थानों ने अलग से प्रवेश परीक्षा कराने के साफ संकेत दे दिए हैं। पढि़ए न्यूज नेटवर्क 24 की विशेष खबर मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को खबरों में बने रहना खूब आता है। वह हैं तो पेशे से वकील पर शिक्षाविद बनने के चक्कर में कुछ ऐसा बोल जाते हैं जिससे हंगामा होना तय है। अब सिब्बल ने शिक्षा में सुधार का बीड़ा उठाया हैं। पहले तो बच्चों को बिना एग्जाम लिए 8वीं क्लास पास करते जाने की बात आई। फिर 10वीं क्लास के एग्जाम खत्म कर दिए या उन्हें वैकल्पिक बना दिया। अब वह एक और नया शिगूफा लाए हैं। सिब्बल के अनुसार अगले साल से आईआईटी, एनआईटी और आईआईआईटी के लिए एक एंट्रेंस टेस्ट होगा। इन सबको जोडऩे के लिए 12वीं के बोर्ड एग्जाम के रिजल्ट को भी अहमियत दी जाएगी। यह कपिल सिब्बल के उन शिक्षा सुधारों की अगली कड़ी हैं, जिनके जरिए इंजिनियर बनने की चाह रखने वाले बच्चों के सिर से बोझ उतारने की तथाकथित कोशिश की जा रही है। सिब्बल के कॉमन इंट्रेस टेस्ट का कई आईआईटी संस्थान विरोध कर रहे हैं। कानपुर आईआईटी ने अलग से प्रवेश परीक्षा कराने का ऐलान किया है तो दिल्ली आईआईटी ने भी अलग से प्रवेश परीक्षा कराने के संकेत दे दिए हैं।  राज्य सरकारें कॉमन एंट्रेस एग्जाम में बारहवीं कक्षा के नंबर को दिए जाने वाले वेटेज से नाराज हैं और आईआईटी के छात्रों का कहना है कि अगर सबके लिए एक ही प्रवेश परीक्षा होगी तो आईआईटी का रुतबा घट जाएगा। आईआईटी कानपुर ने तो इसका खुलकर विरोध करते हुए स्वयं अलग से प्रवेश परीक्षा कराने का ऐलान किया है। कानपुर आईआईटी के 210 सदस्यों की सीनेट ने ये फैसला लिया है कि अगले साल से इंस्टिट्यूट दाखिले के लिए अपनी अलग परीक्षा कराएगा। आईआईटी की संयुक्त प्रवेश परीक्षा किसी भी सम्भावित इंजीनियर की काबिलियत को परखने का सटीक तरीका है। माना जाता है कि आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में सिर्फ वही लोग पास हो पाते हैं जो सबसे अच्छे हैं। यहां तक कहा जाता है कि भारत में आईआईटी में दाखिला पाना अमेरिका समेत दुनिया के और किसी भी इंजिनियरिंग कॉलेज में दाखिला पाने से ज्यादा मुश्किल है। आईआईटी में प्रवेश की प्रक्रिया छंटनी की यह प्रक्रिया इतनी पक्की है कि एक बार कोई स्टूडेंट इससे पार हो जाए, तो फिर पूरी दुनिया उसके पीछे भागती है। बेशक, यह तनावपूर्ण है। लेकिन एक बार इसे पार कर लेने के बाद छात्रों को इनाम भी उतना ही बड़ा मिलता है। सिब्बल का तर्क है कि विशेषज्ञ भी ऐसी सिफारिशें कर चुके हैं कि स्टूडेंट्स के तनाव को कम किया जाना चाहिए। और उनके कदम से तनाव कम हो जाएगा। इससे तो कोई भी सहमत नहीं होगा कि स्टूडेंट और इंजिनियर बनने की चाह रखने वाले स्टूडेंट्स को तनाव में रखना चाहिए। लेकिन यह तनाव स्वाभाविक है। जरूरी है। और आगे बढऩे में मददगार साबित होगा। क्योंकि इसी तनाव को झेलने की क्षमता प्रतिभाशाली छात्रों को अन्य छात्रों से अलग करती है। एक तर्क यह भी है कि 12वीं के रिजल्ट की अहमियत बढ़ाने से स्टूडेंट्स बोर्ड एग्जाम को नजरअंदाज नहीं करेंगे। बिल्कुल सही बात है। कुछ हद तक ऐसा होता है कि बच्चे कॉम्पिटिशन की तैयारी में बोर्ड परीक्षाओं को नजरअंदाज करते हैं। लेकिन बोर्ड परीक्षाओं और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं में किसे महत्व देना है यह तो छात्रों व अभिभावकों को सोचना होगा। बोर्ड की परीक्षाओं और आईआईटी प्रवेश परीक्षा का स्तर एक समान कभी नहीं हो सकता। मानव संसाधन मंत्री जी अगर यही चाहते हैं कि 12वीं की परीक्षाओं को नजरअंदाज न किया जाए तो ऐसा करने के और बेहतर तरीके हो सकते हैं। 12 वीं की परीक्षा में सुधार के लिए आईआईटी जैसी एक बेहतरीन और साबित हो चुकी व्यवस्था का कबाड़ा करने पर क्यों तुले हैं मंत्री जी यह समझ में नहीं आता। और वह भी ऐसे बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे शामिल करके, जिनकी उपयोगिता और भरोसा अलग-अलग बोर्ड, क्षेत्र के हिसाब से बदलता रहता है। आज भी दुनिया की कई कम्पनियां हैं जो सिर्फ आईआईटी पास को ही लेना चाहती हैं। बड़े बड़े बिल्डर्स भी सिविल इंजिनियर तक आईआईटी का ही रखना चाहते हैं। क्योंकि अब तक कम्पनियां यह बात समझ चुकी हैं कि आईआईटी से पास हुए बच्चों में काबिलियत होती है और उन्हें ट्रेनिंग देकर अपने हिसाब से ढाला जा सकता है। और ऐसा करना बाकी बहुत सारे कॉलेजों से डिग्री लेकर निकले बच्चों के मुकाबले बहुत आसान है। आईआईटी छात्रों पर यह भरोसा आईआईटी की प्रवेश परीक्षा की कड़ाई और विश्वसनीयता से ही आता है जहां गेहूं से भूसा अलग कर दिया जाता है। पता नहीं क्यों मानव संसाधन मंत्री उससे छेड़छाड़ करना चाहते हैं। सिब्बल से मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह भी ऐसे ही ऊलजुलूल फैसले देश की भावी पीढ़ी पर थोपते थे। उन्होंने भी आईआईटी में आरक्षण की बात उठाई थी। अब समय आ गया है कि देश की भावी पीढ़ी पर थोपे जा रहे बेतुके फैसलों का विरोध हो। बेशक शिक्षा एक सुधारवादी प्रक्रिया है लेकिन इसमें सुधार के स्थान पर मनमाने प्रयोग की इजाजत नहीं दी जा सकती है। कानपुर आईआईटी का वर्ष 2013 से अलग से प्रवेश परीक्षा कराने के ऐलान का समर्थन किया ही जाना चाहिए|

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