Narendra Modi
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भाजपा में मची अंतरकलह के बीच शनिवार से गुजरात के राजकोट में भाजपा की दो दिवसीय कार्यकारिणी की बैठक शुरू हो रही है। मिशन-2012 नाम से बुलाई गई इस बैठक में विधानसभा चुनाव की रणनीति पर खासी चर्चा हुई। और इस बैठक में मोदी का खौफ नजर आया और संजय जोशी के इस्तीफ की चर्चा तक नहीं हुई। हालांकि गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के मोदी के खिलाफ मोर्चा खोलने से भी पार्टी में अंदरूनी मतभेद बढ़ गए हैं।

भाजपा की इस दो दिवसीय बैठक को मिशन-2012 नाम दिया गया है और दिलचस्प बात यह भी है कि बैठक केशुभाई पटेल के गृह नगर में हो रही है। केशुभाई पटेल को पटखनी देने के लिए मोदी की रणनीति का हिस्सा है यह बैठक।
भाजपा में नरेंद्र मोदी और संजय जोशी के टकराव ने अनुशासन की सीमाएं लांघ ली हैं। यहां तक कि संजय जोशी को पहले भाजपा कार्यकारिणी से बाहर होना पड़ा और अब जोशी ने खुद ही भाजपा छोड़ दी है। संजय जोशी को उत्तर प्रदेश का प्रभार मिला था। संजय जोशी के इस्तीफे के बाद भाजपा में बवाल बढऩा तय है। मोदी से मनमुटाव के बाद जिस तरह अचानक जोशी के पक्ष में अहमदाबाद और दिल्ली में पोस्टर लगे, उससे साफ है कि पार्टी में एक बड़ा तबका मोदी के खिलाफ है। मुम्बई कार्यकारिणी बैठक के बाद मोदी समर्थकों ने कुछ इस तरह का माहौल बनाया कि नरेंद्र मोदी पार्टी के सर्वमान्य नेता के रूप में उभरकर आए हैं। लेकिन खुद गुजरात में मोदी का विरोध होना शुरू हो चुका है। पार्टी के मुखपत्र कमल संदेश और संघ के हिंदी मुखपत्र पांचजन्य में घुमा-फिराकर मोदी पर निशाना साधा गया तो संघ के अंग्रेजी मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने उनकी तारीफ के पुल भी बांधे। यह इस बात का संकेत है कि मोदी को लेकर इन दिनों संघ और भाजपा में मंथन जारी है और उन्हें पार्टी का चेहरा बनाने पर आम सहमति अब भी नहीं बन पाई है। आम तौर पर समझा जाता था कि संघ ही अंतिम निर्णय करता है और भाजपा उसे आंख मूंदकर स्वीकार कर लेती है। लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं रही है। संघ ने कई मामलों में लचीला रुख अपनाया है। भाजपा के फैसलों पर अब संघ की मंजूरी का होना जरूरी नहीं रह गया है। मोदी को लेकर संघ और भाजपा में कोई मतभेद नहीं है पर असली परेशानी मोदी के खिलाफ माहौल को लेकर है। अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को नए चेहरे की जरूरत है, लेकिन मोदी के सामने कोई चेहरा ठहरता नहीं है। यह अलग बात है कि मोदी के खिलाफ माहौल बनाने और नेताओं में अपना वर्चस्व कायम करने की होड़ सी लगी हुई है। उनके छोटे-छोटे गुट बन गए हैं जो एक-दूसरे को मात देने में जुटे हैं। ये पार्टी के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने या जनता के बीच काम करने से ज्यादा रुचि एक-दूसरे के खिलाफ दांव आजमाने में लेते हैं। उधर भाजपा हाईकमान से भी आम कार्यकर्ता नाराज है। सबसे ज्यादा नाराजगी कन्नौज को लेकर है जहां आम कार्यकर्ताओं में यही संदेश गया है कि सपा और भाजपा हाईकमान में कोई गुप्त समझौता हुआ है। उत्तर प्रदेश भाजपा को दरकिनार कर जब बाबू सिंह कुशवाहा भाजपा में लाए गए थे तब भी पार्टी में विरोध हुआ था। यूपी के विधानसभा चुनाव में हुई फजीहत के बाद भाजपा को अगर लोकसभा चुनाव जीतना है तो सबसे पहले उसे कार्यकर्ताओं को विश्वास में लेना होगा। आने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अगर मोदी को आगे करने का फैसला किया है तो उस पर आम सहमति बनानी ही होगी। पार्टी को नेतृत्व के सवाल को समझदारी से सुलझाना होगा। पार्टी में वैचारिक लड़ाई तो ठीक है, पर वह नेताओं की नाक की लड़ाई में बदल जाए तो उसका पार्टी पर बुरा असर पड़ता है। भाजपा का इतिहास रहा है कि वहां संगठन ही एक ऐसी नैतिक सत्ता है जो जनादेश पा चुके नेता को तानाशाह बनने से रोकता है। मोदी को लेकर भाजपा में अभी कई और जोशी हैं जिनकी शिनाख्त भाजपा को जल्द ही करनी होगी नहीं तो आने वाले लोकसभा चुनाव तक नेतृत्व को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनी रहेगी। जब से भाजपा ने मोदी को आगे किया है तबसे मोदी के सुर भी बदले हैं। याद रहे कि बड़बोलेपन और बदजुबानी किसी का कद बढऩे नहीं देती। मोदी ने मुम्बई अधिवेशन के बाद जहां प्रधानमंत्री पर हमला बोला और रुपए को कमजोर करने के पीछे उनका हाथ बताया तो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर भी निशाना लगाने से नहीं चूके। मोदी के बड़बोलेपन से भाजपा नेता भी हैरत में हैं। अभी तक के ढेर सारे उदाहरण इसी बात की गवाही देते हैं कि कम से कम भाजपा में कोई व्यक्ति पार्टी से बड़ा नहीं हो सकता चाहे उसे कैसा भी जनादेश मिला हो। चाहे अभूतपूर्व बहुमत के साथ सत्ता में आईं उमा भारती हों या अयोध्या कांड के नायक कल्याण सिंह या फिर गुजरात के शंकर सिंह बाघेला और झारखंड में बाबूलाल मरांडी हों। पार्टी लाइन से निकलने के बाद यह सभी दिग्गज अपनी धार खो बैठे। यही खतरा मोदी के साथ भी हो सकता है। मोदी का कद भाजपा में दूसरी पीढ़ी के नेताओं में सबसे ऊंचा है लेकिन इस कद और पद को सहेज कर रखना भी मोदी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं। मोदी भाजपा का भविष्य हैं लेकिन अतीत को भी नजरअंदाज करना नासमझी होगी।
संघ प्रमुख भागवत अपने लाडले संजय जोशी को कुटिल सियासत की बलि चढऩे से रोक नहीं सके। जाहिर तौर पर, मोदी ने संगठन के सीने पर चढक़र ठीक वैसे ही अपनी बात मनवा ली, जैसे बीजेपी के नेताओं की छाती पर चढक़र मोहन भागवत गडकरी को नागपुर से दिल्ली लाए और दोबारा कार्यकाल के लिए बीजेपी के संविधान में संशोधन तक करवा डाला। लिहाज़ा मोदी ने भी संघ को सच से सामना करा दिया।
भाजपा के झोले में सैकड़ों सीट दिलाने वाली उमा भारती को भी आडवाणी से पंगा महंगा पड़ा था। भाजपा के मौजूदा हालातों को देखते हुए आने वाले समय में मोदी अपवाद हो सकते हैं लेकिन कम से कम अभी तक का अनुभव तो यही कहता है कि बीजेपी में किसी व्यक्ति का शरद पवार, लालू यादव, नीतिश कुमार आदि बन पाना तो सम्भव नहीं है। भाजपा के लिए मोदी बेशक अनमोल हैं लेकिन पार्टी से ज्यादा कीमती नहीं। यह बात भाजपा और मोदी दोनो को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए।

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