IMG_0055अनुमान था कि ÓआपÓ के लिए जीत की पहली खबर दिल्ली, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, उङीसा, केरल, प. बंगाल, पंजाब, झारखण्ड अथवा उत्तर प्रदेश के किसी हिस्से से आयेगी; लेकिन ÓआपÓ के लिए ला ेकसभा में प्रवेश का द्वार खोला एकमात्र पंजाब ने: 24.5 प्रतिशत वोट, 13 में से 9 सीटों पर शानदार प्रदर्शन और चार पर सीधे नंबर वन। चंडीगढ में भी ÓआपÓ ने 24 प्रतिशत मत हासिल किया है। पंजाब ने ÓआपÓ की लाज रख ली। हालांकि इसे पंजाब प्रदेश में सत्तारूढ शिरोमणी अकाली दल-भाजपा गठबंधन तथा केन्द्र में कांग्रेस के खिलाफ सख्त नाराजगी का नतीजा कहा जा रहा है। ÓआपÓ की भ्ूामिका सिर्फ इतनी है कि सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारकर वह एक बेहतर विकल्प के रूप में सामने आई। बावजूद इसके पंजाब में यह प्रत्याशित प्रदर्शन अनापेक्षित और लाज है। इससे भी अधिक अनापेक्षित और पङताल का विषय है, दिल्ली वोटर का ÓआपÓ को दिया मत प्रतिशत। कयास लगाया जा रहा था कि ÓआपÓ को दिल्ली की कुर्सी छोङने का सबसे ज्यादा नुकसान दिल्ली मे ं ही होगा। विधानसभा की 28 सीटो ं की तुलना मे ं दिल्ली की सातों ला ेकसभा सीटों का हार जाना राजनीति बदलने निकली पार्टी के लिए निश्चित ही सबक सिखाने वाला है। लेकिन ताज्जुब है कि विधानसभा चुनाव की तुलना में दिल्ली के वोट में ÓआपÓ की हिस्सेदारी बढ गई है। विधानसभा चुनाव में 30 प्रतिशत थी; ला ेकसभा में 32.9 प्रतिशत है। कांग्रेस को पछाङकर आम आदमी पार्टी अभी भी दिल्ली प्रदेश की नंबर दो पार्टी बनी हुई है। राष्ट्रीय चित्र यह है कि हिमाचल की मंडी-हमीरपुर, राजस्थान की कोटा-टोंक-उदयपुर, गुजरात की अमरेली-जूनागढ-नवसारी, महाराष्ट्र की बारामती-सतारा, म.प्र. की इंदौर, उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट के अलावा मिजोरम जैसी सीटों पर ÓआपÓ ने प्रथम चार में शामिल होकर बेहतर उपस्थित दर्ज करा दी है। पूरे देश का कुल मतदान प्रतिशत देखें तो ÓआपÓ को कुल दो प्रतिशत मत हासिल हुआ है। करीब एक करोङ, 13 लाख, 23 हजार, 510 वोटर ने ÓआपÓ को मत दिया है। हरियाणा मे ं हासिल मत प्रतिशत 4.2, हिमाचल में 2.1, उत्तराखण्ड में 1.6, उ. प्र. में 1.0, महाराष्ट्र में 2.2, कर्नाटक मे ं 0.8, गुजरात में 1.2, गोवा में 3.3, मिजोरम में 2.7, मणिपुर मे ं 0.5, अरुणांचल मे ं 0.7, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ में 1.2, तथा उङीसा में 0.7 है। राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने से दो कदम पीछे रह गई है। उत्तर प्रदेश मे ं मिल े मात्र एक प्रतिशत वोट और गाजियाबाद मे ं शाजिया इल्मी समेत ज्यादातर सीटों पर जब्त जमानत को लेकर उंगली सीधे ÓआपÓ की सांगठनिक क्षमता पर है। इस पर खास मंथन व बदलाव की जरूरत इसलिए भी होगी कि पार्टी के प्रमुख संगठक संजय सि ंह उत्तर प्रदेश से आते हैं तथा कुमार विश्वास व स्वयं केजरीवाल उ, प्र, मे ं उपस्थित रहकर चुनाव लङे। झारखण्ड, बिहार, आंध्रप्रदेश, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल जैसे प्रदेशों ने ÓआपÓ को पहचानने से इंकार कर दिया है। ऐसे प्रमुख प्रदेशों मे ं पार्टी के इस हश्र और वोट प्रतिशत के जमाजोङ के बीच पेश चिंता और चिंतन का प्रश्न सिर्फ एक ही है – हिसाब ज्यों का त्यों, फिर कुनबा डूबा क्यों ? उत्तर की तलाश जरूरी है। ÓÓआधी छोङ पूरी को धावे, आधी मिले न पूरी पावेÓÓ वाली कहावत की अनदेखी करने की एक गलती से दिल्ली-पंजाब का दिल भल े ही न टूटा हो, देश के दूसरे हिस्से में बङे पैमाने पर ला ेगों का दिल भी टूटा और भरोसा भी। अत: पहला सबक यह है कि राजनीति मे ं एक छोटी सी चूक भी बङे विनाश का सबब बन सकती ह ै। राजनीति न तो इंटरनेट पर सवार होकर बदली जा सकती है और न ही राजनीतिक और ग ंदी सांप्रदायिक होङ मे ं शामिल होकर। नरेन्द्र मोदी, अडाणी, अंबानी और सोशल मीडिया चक्कलस पर ध्यान लगाने मे ं काफी वक्त जाया कर चुके; ÓआपÓ नेतृत्व को चाहिए कि वह अब थोङा वक्त जमीनी अनुभवों से निकली इन कहावतों को सुनने और इनके आधार पर जमीनी कामकाज करने मे ं लगायें। दूसरा सबक यह कि सार्वजनिक जीवन में निजी कुछ नहीं रह जाता; न समय, न धन, न धर्म, न आचार और न विचार। निजी होते हुए भी दूसरे पर इन्हे थोपने की आजादी आपके हाथ नहीं होती। इन्हे निजी मानकर सार्वजनिक यानी पार्टी, संगठन या समाज पर थोपने की गलती के नतीजे कभी अनुकूल तीसरा सबक यह कि दुनिया जीतते हुए को सलाम करती है। चंदा देने वाला व्यापारी भी जीतते हुए पर ही दांव लगाता है। आजकल ला ेग सिद्धांत और व्यक्ति से ज्यादा संभावनाओं से दोस्ती करते हैं। भंवर मे ं फंसी नौका का साथ सबसे पहले उसके सवार ही छोङते हैं। अत: च ंदा और समर्थक नहीं, अच्छी राजनीति की संभावनायें तलाशें। शेष स्वत: फिर जुट जायेगा। चौथा सबक यह कि देश की जनता ने आम आदमी पार्टी को सिरे से खारिज नहीं किया है। प्रचारित की गई तमाम हताशा के बावजूद हासिल वोट प्रतिशत बताता है कि ÓआपÓ को लेकर जनाकांक्षायें अभी मरी नहीं हैं। एक करोङ भारतीय आज भी चाहते हैं कि यह पार्टी टिके भी और बढे भी। दिल्ली के वोटर ने प्रायश्चित करने का वक्त दिया है। बिजली, पानी, मंहगाई, भ्रष्टाचार और ला ेकाधिकार के जिन मुददो ं को लेकर आम आदमी पार्टी मात्र सात महीने पहले पहली बार चुनाव में उतरी थी, ये आज भी पूरे देश की जनाकांक्षा के करीब के विषय हैं। राजनीति न भी बदल सको, तो कम से कम इन मुद्दों का जवाब तलाशने की राजनीति तो करो।

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