यद्यपि श्रम के रंग से जीवन तूलिका वो हर बार भरे।
लेकिन दुहिताओं की कुलटा आ-आकर नित्य प्रहार करे।
माँ की दबाई व ब्याह लली का ऊपर से मँहगाई ये,
एक ही जीवन में निर्धन के सपने तो सौ-सौ बार मरे।
हर बार दिल पे इक नया,जलजला लाया गया।
टूट कर लिखा जिसे,फिर टूट कर गाया गया।
 मुफलिसी ने हँथेली पर,मुकद्दर जब टटोले हैं।

सुलग उठ्ठे सजल नयना,गिरे शोले ही शोले हैं।

सुवह से साँझ तक खटना,अनकहे दर्द में बँटना,

निहारी जब हँथेली तो,मिले छाले-फफोले हैं।
सिंहासन पर चूहे की,लंबी देख प्रजेंस।
लोकतंत्र का हो गया,फुल्ली कानफीडेंस।।
वेदना ही,बस सहचरी रह गयी।
भावना नेह की अधमरी रह गयी।
आस्था का सुमन जब मुरझा गया,
अर्चनायेँ धरी की धरी रह गयीं।

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