pankaj sirआज 24 अप्रैल है। इस सुप्रसिद्ध पत्रकार और पत्रकारिता में मेरे गुरु घनश्याम पंकज सर का जन्म दिन होता है। अब वह इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी यादें और उनके गुरुमंत्र आज भी धरोहर के रूप में हमारे पास हैं। एक सम्पादक के रूप में वह अपने अधीनस्थ पत्रकारों को हर हाल में स्वतंत्र रखते थे। मालिक कौन है इसका उन पर कभी कोई असर नहीं होता था और न ही अपने किसी सहयोगियों पर असर पडऩे देते थे। बीते कई सालों में कितने अखबार खुले और कितने बंद हुए पर उन्होंने जनसत्ता एक्सप्रेस की जो नींव रखी थी वह आज भी वायॅस ऑफ लखनऊ बन कर चल रहा है। सम्पादक विचारधाराओं के विरोधाभास में भी संतुलन बनाना उन्हें खूब आता था। मुझे याद है कि मैं कुबेर में प्रशिक्षु के तौर पर आया था मेरे ऊपर दो सीनियर और थे। मेरा पंकज सर से पहले कभी परिचय न था और न ही मैने कभी स्वतंत्र भारत में उनके साथ काम किया था लेकिन वह मुझ पर बहुत भरोसा करते थे। उन्होंने बहुत जल्द ही मुझे फीचर प्रभारी बना दिया था। मेरे फोटो सलेक्शन पर वह इतना भरोसा करते थे कि एक बार दीवाली की एक फोटोग्राफ को मैने पसंद कर अपने फीचर पृष्ठï पर लगा लिया था। फोटो श्री स्वपन पाल जी ने खींचा था और उन्होंने यह बात पंकज सर को बता दी। उन्होंने बिना फोटो देखे मेरे फीचर पन्ने से न सिर्फ फोटो हटवाई बल्कि उसका प्रिंट मेरे डेस्क की ड्रार खुलवाकर मंगवाया। अगले दिन वह फोटो कुबेर टाइम्स के फ्रंट पेज पर थी। मै हिन्दुस्तान व जागरण के आईनेक्स्ट में कई साल काम किया पर उनके साथ काम करना अपने आप में एक गर्व की बात थी।
सत्तर की उम्र में भी बीस का जोश। मैने ने उनके साथ कुबेर टाइम्स और जनसत्ता एक्सप्रेस में दो पारियां खेली हैं। हिन्दी पत्रकारिता के सम्पादक के रूप में वे आखिरी कड़ी थे जिनका विशाल व्यक्तित्व मालिकों पर भारी पड़ता था। हिन्दी अखबार के सम्पादक होते हुए भी उन्होंने अंग्रेजी अखबारों के सम्पादकों जैसा कद पाया। मान सम्मान और कलम की धार के धनी पंकज जी की नई अखबारी सोच आज से 25 साल पहले ही दिखाई दी थी। टेबलायड साइज के अखबार की कल्पना तो उन्होंने स्वतंत्र भारत फिर जनसत्ता एक्सप्रेस में शुरू की थी। फीचर और मार्केटिंग की टीम को कोआर्डीनेट करके उन्होंने एडवरटोरियल का कानंसेप्ट रखा जिसे आज कई अखबार अपना रहे हैं। अखबार का सर्कुलेशन कैसे बढ़ता है और कैसे ब्राडिंग होती है यहां तक कि विज्ञापन कैसे और कहां से आ सकता है इन सब में माहिर थे पंकज जी। आज अखबारों में ब्रांड मैनेजर और न जाने कितने और तरह तरह के मैनेजर सब मिलकर अखबार के सम्पादकीय पर हावी रहते हैं। सम्पादक से ज्यादा सैलरी पाने वाले मार्केटिंग मैनेजरों ने अखबार का अंकगणित ही बिगाड़ दिया है। जब मैं उनसे अंतिम बार मिला तो वो बोले कि अब समय बदल गया है। अब कोई अखबार सम्पादक नहीं रखना चाहता। कटेंट पर कोई बात नहीं करता। मैं जीवन में एक और पारी खेलना चाहता हूं और अपनी टीम बनाना चाहता हूं। जैसा कि मैं कह चुका हूं कि उनकी जिंदगी की अपनी स्टाइल शीट थी और अपना अंदाज। बड़प्पन भी। कुबेर में तो मैं उनके सामने ट्रेनी था लेकिन उन्होंने मुझे फीचर का पूरा जिम्मा दे रखा था। छोटी छोटी व्यावहारिक बातें भी उन्होंने मुझे बताई थी। अखबार की हेडिंग लगाना या फिर ले आउट सब कुछ बताते थे। ये गलत है, ऐसा बताने वाले तो बहुत मिल जाएंगे लेकिन क्या गलत है और इसे कैसे सही किया जा सकता है वे यह भी बताते थे। जनसत्ता एक्सप्रेस में उन्होंने मुझे फीचर एडीटर की जिम्मेदारी दी थी। मेरे कॅरियर को टर्निंग को प्वाइंट दिया था उन्होंने। अपने निजी कार्यक्रम में वो बड़े स्नेह से अपने हाथ से लिखा हुआ आमंत्रण पत्र देते थे। चाहे बेटी इरीशिका का बर्थ डे हो या फिर बेटे कबीर की फिल्म सहर का प्रीमियर शो। घर जाने पर कई बार अपने हाथ से तैयार नीबू की शिकंजी पिलाई थी। जनसत्ता एक्सप्रेस में साथी परितोष पाण्डेय की हत्या के बाद उन्होंने अग्रलेख के स्थान पर प्रथम पृष्ठï पर शिलालेख लिखा था जिसमें उन्होंने अपने सहयोगी पर सारी संवेदनाएं उड़ेल दी थी। उनमें सबसे अच्छी बात कि वो कान के कच्चे नहीं थे। कब किसको टोॅप पर पहुंचाना है कब किसको समझाना है सब वे खुद व्यक्ति की कार्यक्षमता देख कर तय करते थे। मालिकों का दखल कतई पसंद नहीं था उन्हें। वो कभी भी पक्षपाती नहीं थे। काम के समय वो इस बात को भूल जाते थे कि किसने उनके साथ पहले काम किया और कौन पहली बार कर रहा है। उनके सिखाए कई लोग आज विभिन्न अखबारों में सम्पादक हैं। उनके साथ मैं एक और पारी शुरू करना चाहता था। मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं कि अपने साथियों को पंकज जी जैसी आजादी शायद आजकल के सम्पादक नहीं दे सकते। पंकज सर को विनम्र श्रद्धांजलि

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