पवन त्रिपाठी,लखनऊ,उ.प्रsaaaa
आदरणीय आडवाणी जी,जोशी जी,75 वर्ष से अधिक वरिष्ठ नेतृत्त्व गण, सादर चरण स्पर्श, कुशलोपरांत,कुशलाकांक्षी व् ‘आपके गिरते जा रहे स्वास्थ्य हेतु चिंतित।मैं प्रतिज्ञित,प्रशिक्षित स्वयंसेवक एवं भाजपा का सामान्य कार्यकर्ता हूँ जिसने आप की तरह ”इस राष्ट्र को संगठित कर परमवैभव” पर ले जाने का संकल्प लियाहै।व्यक्तिगत रूप से हमारी श्रद्धा एवं निष्ठाए आपके नेर्त्तित्व में रही है।
परन्तु!गत दस-बारह सालो में उन सपनों,कल्पनाओ को टूटते,ढहते बिखरते देखकर लगातार क्षुब्ध हूँ।लेकिन आज उन्हें साकार होता सा देखकर यह पत्र लिखने से खुद को चाहकर भी रोक नहीं पाया।
इन वर्षो में अपने नेताओ में अनुशासनहीनता,अहंकार लालच,झूठ,फरेब, दोहरापन, नाटकीय उपदेशात्मक प्रवत्ति, अकड,अपने पुत्र,भाई भतीजों,गुट के सदस्यों के हाथ में संगठन को कब्जाने की प्रवृत्ति के साथ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का अतिरेक देखा है,यहाँ तक की कुछेक बड़े नेता सामान्य कार्यकर्ताओ के लिए दुर्लभ हो गए,निडर और विचारधारा के प्रति कतिबद्द कार्यकर्ता चापलूस न होने के कारण नेत्रित्व से अपने आप दूर होता गया।
विचारधारा से हर कदम पर समझौते हुए, छ्द्म्ध्र्मनिर्पेछतावाद,स्वदेशी,धारा-370,समान नागरिक संहिता,गोहत्या जैसी बातें जिन्हें सुनते-बताते हम यहाँ तक पहुचे, जाने कब,आप खुद ही भूल गए।अयोध्या को बिसराना,एक पीढ़ी के स्वभाव और विश्वास इन दोनों पर ही गहरा आघात था,फलस्वरूप कार्यकर्ता और जनता दोनों ही स्वाभाविक रूप से आपके साथ नहीं लग सके और 2004 में सत्ता खोने के बाद आप दोबारा नही स्थापित हो सकें।विश्वास के सौदे ऐसे ही होते हैं। आज वैचारिक समस्या खडी हो गयी है की ‘जो कभी हम लोगों के आदर्श थे उन्हें पग-पग पर आदर्शो से गिरते देखकर, विश्वास दरकने लगता है की ये लोग क्या सचमुच ”परमवैभव के सपने के साथ आगे बढ़ें है? आपसे आग्रह है’ नेत्रित्व के प्रति विश्वास को बनाये रखने के लिए वास्तविक और श्रेष्ठ चरित्र सम्पन्न कार्यकर्ताओ के हाथ में संगठन सौप कर अब घर के बड़े-बुढो की तरह परामर्श के स्थान पर खुद को स्थापित कर लें।इससे आनें वाली पीढियों में आपके लिए सम्मान व् श्रद्धा बनी रहेगी वरना आप वह भी खो देंगे।जिन लोगो को आपने ही आगे बढ़ाया है उन पर विश्वास करें की नया नेत्रित्व एक स्वयंसेवक की प्रतिज्ञा व सपनें पूरे कर सकें। आप अपनी पारी खेल चुके अब दूसरों को पारी खेलने दीजिये। एक आदर्श स्व.नाना जी देशमुख का भी ग्रहण करिए देश के किसी भी एक सुदूर,पिछड़े,अविकसित जिले को नाना जी की भाँती गोद लेकर गरीब असहाय जनता की सेवा करें,उन्हें समृद्ध और संस्कारित करें।संगठन ने आपको इतना कुछ दिया है इसी प्रकार से ऋणमुक्त हो सकती है।हिन्दुरास्त्र को विश्वगुरु बनाने में आपका यही ‘महान कर्म,महत्वपूर्ण योगदान के रूप में देखा जायेगा।

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