मैसूर: वादियों में चंदन की खुशबू और टीपू सुल्तान के किस्से

ब्लर्ब: जैसे लक्ष्मीबाई को झांसी से जोडक़र देखा जाता है, वैसे ही टीपू को मैसूर से। मैसूर के शेर टीपू सुल्तान की वीरता के किस्से मैसूर की धरती पर बिखरे पड़े हैं। मैसूर का श्री रंगपटनम टीपू के अंगे्रजों के खिलाफ शौर्य और पराक्रम का गवाह रहा है। टीपू या लक्ष्मीबाई का लक्ष्य भले ही सीमित हो लेकिन मगर हमारी स्वतंत्रता के संघर्ष की नींव इन लोगों ने ही रखी थी।  मैसूर की वादियों में एक तरफ चंदन की खुशबू है तो दूसरी ओर टीपू सुल्तान की बहादुरी के किस्से बिखरे पड़े हैं। मैसूर चंदन के विशाल जंगलों, हाथियों, बगीचों और महलों के अलावा कला, संस्कृति, प्राकृतिक सुंदरता तथा ऐतिहासिक धरोहर से समृद्ध भारत का प्रमुख शहर है। यहां अनेक दर्शनीय स्थल हैं।

कर्नाटक का दूसरा बड़ा शहर मैसूर अपने पास 11वीं शताब्दी की धरोहर तक समेटे है। यहां की संस्कृति को छह महलों में देखा जा सकता है। चेलुवंबा मेंशन, जगमोहन पैलेस, जयलक्ष्मी विलास, करांजी मेशन, ललिता महल और मैसूर पैलेस की भव्यता देखते ही बनती है। फिर यहां आपको बहुत से मंदिर मिलेंगे। यहां जहां श्रद्धा से सिर झुकेंगे, वहीं इनकी भव्यता व डिजाइन पर आंखें खुली रह जाएंगी। यहां आप लक्ष्मीनारायण मंदिर, श्वेत वराहस्वामी मंदिर, महाबलेश्वर मंदिर, प्रसन्ना कृष्णास्वामी मंदिर जरूर देखें। वैसे, मैसूर में पांच म्यूजियम हैं। एशिया के बड़े संग्रहालयों में एक गिने जाने वाले फॉक ऑर्ट म्यूजियम में मैसूर की लोककलाओं को करीब से देखा व समझा जा सकता है। चन्दन के इस शहर में प्रवेश करते ही मन अतीत के झरोखों में झांकने लगता है और उसका इतिहास जानने को बेताब हो जाता है। इतिहास जानने के लिए पहले चलें मैसूर के कोदिभैरेश्वर मन्दिर की ओर जहां ईसा से 1399 वर्ष पूर्व दो राजा यदुराय और कृष्णराय गुजरात के द्वारका से भगवान नारायण की पूजा करने आये थे, लेकिन महिसुर यानी मैसूर की खूबसूरती ने उनका मन मोह लिया। बाद में मैसूर की राजकुमारी देवजम्मनी से यदुराय का विवाह हुआ और इस तरह सन 1399 ई.पू. में वाडियार शासन की नींव पडी। 1578 ई.पू. में राजा वाडियार के उदय से पहले मैसूर विजयनगर राज्य का एक छोटा सा अंग था, लेकिन 1565 ई.पू. में विजयनगर राज्य के पतन के साथ साथ मैसूर एक बडा राज्य बन कर उभरा। कुछ इस तरह कि पूरा प्रदेश ही मैसूर कहलाने लगा।

श्री रंगपटनम
मुख्य शहर से 16 किलोमीटर दूर ‘श्रीरंगपटनम’ अंग्रेजों से आजीवन युद्ध करते रहने वाले महान शासक टीपू सुल्तान की राजधानी थी। श्री रंगपट्टïनम में प्राचीन मैसूर का इतिहास जीवन्त हो उठता है। श्रीरंगपटनम से सडक़ के दूसरी ओर है दरिया दौलतबाग, टीपू सुल्तान का ग्रीष्मकालीन महल, गुम्बज और संग्रहालय। दरिया दौलतबाग एक खूबसूरत बगीचा है जिसमें स्थित संग्रहालय में रखी वस्तुएं टीपू सुल्तान की याद दिलाती हैं। विभिन्न चित्रकारों द्वारा बनाये गये टीपू सुल्तान और उसके परिवार के चित्र, रेखाचित्रों के अलावा दीवारों पर बने अनेक चित्र टीपू सुल्तान और अंग्रेजों के युद्ध के दृश्य अंकित करते हैं।
श्रीरंगपटनम का चप्पा चप्पा टीपू के पराक्रम का गवाह रहा है। यहां वह इमारत दर्शनीय है जिसमें टीपू सुल्तान ने अंग्रेज सैनिकों को कैद कर रखा था। 18 वीं सदी में मैसूर पर मुसलमान शासक हैदर अली की पताका फहराई। सन् 1782 में उसकी मृत्यु के बाद 1799 तक उसका पुत्र टीपू सुल्तान शासक रहा। इन दोनों ने अंग्रेजों से अनेक लड़ाईयाँ लड़ी।  देवनहल्ली वर्तमान में कर्नाटक का कोलर जिला में 20 नवम्बर 1750 को जन्मे टीपू सुल्तान हैदर अली के पहले पुत्र थे। इतिहास गवाह है कि बहादुर और कुशल रणनीतिकार टीपू सुल्तान अपने जीते जी कभी भी ईस्ट इंडिया साम्राज्य के सामने नहीं झुके और फिरंगियों से जमकर लोहा लिया। मैसूर की दूसरी लड़ाई में अंग्रेजों को खदेडऩे में उन्होंने अपने पिता हैदर अली की काफी मदद की। टीपू ने अपनी बहादुरी के चलते अंग्रेजों ही नहीं, बल्कि निजामों को भी धूल चटाई। अपनी हार से बौखलाए हैदराबाद के निजाम ने टीपू से गद्दारी की और अंग्रेजों से मिल गया। मैसूर की तीसरी लड़ाई में अंग्रेज जब टीपू को नहीं हरा पाए तो उन्होंने मैसूर के इस शेर के साथ मेंगलूर संधि के नाम से एक सममझौता कर लिया, लेकिन फिरंगी धोखेबाज निकले। ईस्ट इंडिया कंपनी ने हैदराबाद के निजाम के साथ मिलकर चौथी बार टीपू पर जबर्दस्त हमला बोल दिया और आखिरकार 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए टीपू शहीद हो गए। लड़ाई के बाद टीपू सुलतान का शव आम फौजियों के बीच पड़ा था और मुठ्ठïी में अतिंम समय तक तलवार तनी थी। टीपू की ऐतिहासिक तलवार अंगे्रज अपने साथ ले गए। इतिहासकार बताते हैं कि मैसूर के इस शेर की सबसे बड़ी ताकत उनकी रॉकेट सेना थी। रॉकेटों के हमलों ने अंग्रेजों और निजामों को तितर-बितर कर दिया था। टीपू की शहादत के बाद अंग्रेज रंगपट्टनम से निशानी के तौर पर दो रॉकेटों को ब्रिटेन स्थित वूलविच म्यूजियम आर्टिलरी गैलरी में प्रदर्शनी के लिए ले गए। मिसाइल मैन व पूर्व राष्टï्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने तो टीपू को राकेट का आविष्कर्ता भी बताया था। इतिहास के पन्नों को और पलटें तो टीपू के मैसूर का एक और अलग रंग दिखेगा। पश्चिम के इतिहासकार भले ही टीपू को कट्टïरपंथ मुसलमान बताने की घिनौनी हरकत करते हो लेकिन साम्प्रदायिक सदभाव की अनूठी मिसाल कायम की थी टीपू सुल्तान ने। टीपू सुल्तान के प्रधानमंत्री पुनैया नामक एक ब्राहम्ण थे और उनके सेनापति भी एक ब्राहम्ण कृष्णाराव थे। टीपू सुल्तान ने श्रंगेरी मठ के जगद्गुरू शंकराचार्य को लिखे थे और जिनके साथ सुल्तान के अति घनिष्ठ मैत्री सम्बन्ध थे। मैसूर के राजाओं की परम्परा के अनुसार टीपू सुल्तान प्रतिदिन नाश्ता करने के पहले रंगनाथ जी के मंदिर में जाते थे, जो श्रींरंगापटनम के किले में था। श्रीरंगपटनम की चारदीवारी के अंदर एक मस्जिद और श्री रंगनाथ स्वामी का मंदिर भी है जो आज भी अस्तित्व में है।18वीं शताब्दी के अन्त में टीपू ने यहां अंग्रेजों से अन्तिम लड़ाई लडी थी। हालांकि उस समय के बहुत कम अवशेष बाकी हैं, क्योंकि अंग्रेजों ने कई महल और भवन तहस-नहस कर दिये थे। फिर भी कुछ इमारतें और दरवाजे अभी बाकी हैं, जहां टीपू ने अंग्रेज सैनिकों को कैद कर रखा था।
मैसूर का महल

सुंदर कलाकृतियों, आकर्षक झाड़-फानूस व कीमती पत्थरों से सुसज्जित इस महल की खूबसूरती देखते ही बनती है। वाडयार शासकों की इस निशानी को ब्रिटिश शिल्पकार हेनरी इरविन ने डिजाइन किया था। 1897 में राजकुमारी जयलक्ष्मी के विवाह के वक्त लकड़ी का बना यह महल आग में जल कर खाक हो गया था। इसे फिर से बनने में करीब 15 साल लगे। महल के बीचों बीच एक बडे से आंगन के दक्षिण में कल्याण मण्डप है, जिसका प्रयोग शादी-विवाहों के लिये किया जाता है। यहीं पहली मंजिल पर निजी अम्बा विलास और दीवाने खास हैं। आंगन का मुख्य प्रवेश हाथी द्वार भी कहलाता है। महाराजा के समय में विशेष अवसरों पर शाही हाथी इसी पीतल के बने द्वार से गुजरकर आंगन में जाता था। मैसूर पैलेस का सबसे मुख्य आकर्षण है पारम्परिक स्वर्ण सिंहासन। नाचते मयूर की आकृति का यह सिंहासन भारत की शक्ति और अधिकार का प्रतीक माना जाता था। मैसूर पैलेस की छटा देखनी है, तो शाम के समय देखें, जब लगभग साढे तीन लाख बल्बों की रोशनी से पूरा महल जगमगा उठता है और एकदम परीकथाओं के महलों की परिकल्पना साकार कर देता है। महल की दूसरी मंजिल में है दरबार हॉल। यहां खम्भों पर बारीक नक्काशी देखने को मिलती है। परीकथाओं जैसे अदभुत सौन्दर्य से युक्त इस महल के कारण ही मैसूर को परियों का देश भी कहा जाता है। होयसल वास्तुशिल्प का अदभुत नमूना यह महल हिन्दू और मुस्लिम वास्तुशिल्प के संगम का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस महल में प्राचीन अवशेष अब न के बराबर हैं। सन 1911-12 में इसका पुनर्निर्माण हुआ, जिसका डिजाइन अंग्रेज वास्तुशिल्पी हेनरी इर्विन ने तैयार किया था। महल की मुख्य इमारत धूसर रंग के ग्रेनाइट पत्थर से बनी है, जिसमें तीन मंजिलें हैं और उसके ऊपर पांच मंजिली मीनार पर बने गोल गुम्बद पर सोने का पत्र चढ़ा है। यह मीनार जमीन से 44 मीटर ऊंची है। महल के सात मेहराबदार दरवाजे और खम्भे वास्तुशिल्प का अनूठा नमूना हैं।

सेंट किलोमिनास चर्च
अब चलते हैं सेंट किलोमिनास चर्च। इसे 12-16वीं शताब्दी के बीच यूरोप में प्रचलित गोथिक शैली में बनाया गया है। दूर से देखने पर यह किसी बड़े चॉकलेट केक की तरह लगता है। यह भारत के सबसे भव्य चर्चों में से एक है। इसे शाम को 5 से 8 के बीच देख सकते हैं। जब हम मैसूर की सैर कर रहे हैं और वृन्दावन गार्डन नहीं गये तो सब अधूरा। तो चलिए वृंदावन गार्डन
वृन्दावन गार्डन
कावेरी नदी पर बने कृष्णसागर बांध से ही जुडा है वृन्दावन गार्डन। शहर से मात्र 19 किलोमीटर दूर स्थित यह उद्यान पर्यटकों में विशेष लोकप्रिय है। इस उद्यान की प्राकृतिक छटा के अलावा दूसरा प्रमुख आकर्षण है पश्चिमी और भारतीय संगीत की लय पर थिरकते झूमते फव्वारे। पश्चिम में सूरज ढलते ही उधर आसमान में अंधेरा घिरने लगता है और इधर रंग-बिरंगी रोशनियों में नहाये फव्वारे दिलकश संगीत के साथ कदम मिलाते झूमने लगते हैं। यह दृश्य देख रहे हजारों दर्शक थिरकने लगते हैं- फव्वारों की ताल पर। अपने सौन्दर्य और जीवंतता में वृन्दावन गार्डन सैलानियों के दिलों में बस जाता है।

चामुण्डा हिल
मैसूर शहर से 13 किमी दूर है चामुण्डा हिल। बस से पहाड़ी के बीच बने घुमावदार रास्तों से गुजरते हुए  यहां पहुंचने पर महिषासुर की एक विशालकाय प्रतिमा दिखती है। एक हाथ में फरसा और दूसरे हाथ में जहरीला सांप लिए यह मूर्ति कुछ डरावनी सी है। इस मूर्ति के थोड़ा आगे है चामुण्डा देवी के तीन विशाल मंदिर। किंवदती है कि देवी चामुण्डेश्वरी ने महिषासुर का वध कर इस समूचे क्षेत्र को उसके आतंक से मुक्त करवाया था। चामुंडी पहाड़ी पर बने इस मंदिर तक एक हजार सीढियां चढ कर या पैदल सडक़ के रास्ते भी जाया जा सकता है। यह सतमंजिला मंदिर है। रास्ते में 5 मीटर ऊंचे ठोस चट्टानों को काट कर बनाए गए भगवान शिव के वाहन नंदी के दर्शन भी होते हैं। मंदिर तक जाने के मार्ग में हरे-भरे वृक्षों और सुरभित पवन के स्पर्श से मन आनंदित हो उठता है।
भारत के सबसे सुंदर शहरों में एक कर्नाटक की राजधानी बंगलौर से महज 140 किमी की दूरी पर स्थित मैसूर एक ऐसा स्थान है जो एक बार देख लेने के बाद बार-बार याद आता है। चंदन की खुशबू से महकते इस शहर में चमेली, मोगरा, गुलाब की सुगंध इस तरह समाई है कि जो भी यहां आए सराबोर हो जाए। राजमहल, चंदन, चामुंडी हिल्स, अगरबत्तियां, इत्र व वृन्दावन गार्डन्स इतना कुछ यहां है कि सबके बारे में लिख पाना बहुत मुश्किल है। इस तरह मैसूर सिर्फ देखने की नहीं, बल्कि रच-बस जाने लायक शहर है। मैसूर के चंदन से बनी छोटी-बड़ी चीजें, अगरबत्तियां व महकदार साबुन विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। यहां अगरबत्ती की हर बत्ती हाथ से बनाई जाती है जिसे सामान्यतया औरतें और बच्चे ही बनाते हैं। मैसूर का पूरा बाजार ऐसी दुकानों से पटा है जहां हस्तकला की छोटी-बड़ी चीजें बेची जाती हैं। हाथी दांत, चंदन और रोजवुड से बना फर्नीचर मैसूर की खास पहचान है। सामान्य लकड़ी या विशुद्ध चंदन से बने बेशकीमती हाथी यहां की हर दुकान पर मिल जाएंगे।
टीपू सुल्तान के पराक्रम और चंदन आज यही मैसूर कला, संस्कृति, प्राकृतिक छटा और ऐतिहासिक धरोहर से समृद्ध भारत का एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल बन गया है और अपनी खूबियों से पर्यटकों को लगातार अपनी ओर खींचता है।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.