ओलम्पिक में देश के सबसे बड़े राज्य को एक भी पदक नहीं
लंदन में यूपी के हाथ खाली रह गए इस पर निराशा जरूर रही पर आश्चर्य नहीं। यूपी के खेल अधिकारियों को खेल शुरू हो जाने के बाद भी नहीं मालूम चला कि उनके प्रदेश से कौन कौन से खिलाड़ी भाग ले रहे हैं। खेल संघों के अध्यक्षों व मठाधीशों की जी हुजूरी में लगे खेल विभाग को ओलम्पिक में यूपी के खराब प्रदर्शन से कोई फर्क नहीं पड़ता। धाविका सुधा सिंह का मंच पर अपमान होता है तो जुडोका गरिमा चौधरी प्रदेश छोड़ हरियाणा से खेलती हैं इस पर भी खेल विभाग मस्त है। बताते चलें कि लंदन में रविवार को संपन्न हुए ओलंपिक खेलों में, यूं तो भारत को पिछले ओलम्पिक की तुलना में अधिक पदक मिले हैं, लेकिन देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की झोली आखिरकार पदकों से खाली ही रह गई।
लंदन ओलम्पिक में सूबे के खिलाडिय़ों को मिली नाकामी के बाद भले ही यह सवाल उठ खड़ा हुआ है, कि क्या उप्र की सरकार प्रदेश में खेल के भविष्य को सुधारने की दिशा में कोई ऐसा कदम बढ़ाएगी, लेकिन इसके इतर खिलाडिय़ों और खेल संघों से जुड़े अधिकारियों को आस है कि यदि खिलाडिय़ों को सुविधाएं मुहैया कराई जाए, तो रियो डी जेनेरियो में होने वाले अगले ओलम्पिक आयोजन में प्रदेश के खिलाड़ी अपना दमखम दिखा सकेंगे।

वाराणसी के डीएलडब्ल्यू से कुश्ती का प्रशिक्षण ले चुके और अलग-अलग भारवर्ग में तीन बार राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में पदक हासिल करने वाले विकास कुमार राय कहते हैं कि सुशील कुमार ने निस्संदेह देशवासियों को मुस्कराने का मौका दे दिया है, लेकिन राज्य सरकार को भी खिलाडिय़ों को अत्याधुनिक सुविधाएं मुहैया कराने की तरफ ध्यान देना चाहिए।
विकास ने कहा कि राज्य में हर खेल की स्थिति खराब है। सुविधाओं के नाम पर खिलाडिय़ों को कुछ नहीं दिया जाता। कुश्ती की ही बात करें तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जिस स्तर के गद्दों का इस्तेमाल किया जाता है, उस स्तर के गद्दे आज तक यहां के पहलवानों को देखने को नहीं मिले।
पूर्वांचल केसरी का खिताब हासिल कर चुके विकास कहते हैं कि हमने डीएलडब्ल्यू में पहलवानी का प्रशिक्षण अपने खर्चे पर लिया है। वहां पर मात्र आपको प्रशिक्षण ही मिल पाता है। अब सुशील कुमार को ही लीजिए दिल्ली और हरियाणा में पहलवानों को ढेर सारी सुविधाएं मिलती हैं। साथ ही घरवालों को भी उनको अच्छा सहयोग मिलता है।
विकास बताते हैं कि पूर्वाचल में पहलवानों की कमी नहीं है, लेकिन जरूरत सरकार की ओर से अच्छा सहयोग मिलने की है। ”जहां तक मेरा मानना है कि एक पहलवान को नियमित तौर पर आज के समय में एक पहलवान के पास यदि खुराक के तौर पर 1000 रुपये नहीं हैं तो वह पहलवानी नहीं कर सकता। सरकार की ओर से सहयोग मिले तो उप्र के पहलवान भी दुनिया में अपना नाम कमा सकते हैं।
इसे खिलाडिय़ों की लाचारी कहा जाए या फिर प्रदेश सरकार द्वारा खिलाडिय़ों को पर्याप्त सुविधाएं मुहैया न कराया जाना, क्योंकि सूबे से लंदन गए आठ खिलाड़ी खाली हाथ ही वापस लौटे यानी लंदन में उप्र का फ्लाप शो बदस्तूर जारी रहा।
यह पहला मौका था जब उत्तर प्रदेश के आठ खिलाड़ी ओलम्पिक में अपनी किस्मत आजमा रहे थे, लेकिन एक के बाद एक सभी ने निराशाजनक प्रदर्शन कर प्रदेश में खेल के भविष्य को हाशिए पर खड़ा कर दिया।
खिलाडिय़ों की असफलता की इस कहानी में खेल विभाग के साथ ही खेल संघों की नकारात्मक भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता।
लंदन जाने वाले खिलाडिय़ों की तुलना में प्रदेश के राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों ने अधिक दिलचस्पी दिखाई। इस बार सरकार की ओर से यह दलील दी गई, कि राजनीतिज्ञों एवं नौकरशाहों को लंदन भेजने का मुख्य मकसद प्रदेश में खेल के स्तर को सुधारना है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि लंदन की सैर कर वापस आए ये दिग्गज प्रदेश में खेलों के प्रोत्साहन को लेकर क्या कदम उठाते हैं, ताकि लंदन ओलम्पिक में मिली नाकामी के बाद रियो में मुस्कराने का मौका मिल सके।
प्रदेश में खेलों के भविष्य को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं राज्य तीरंदाजी संघ के अध्यक्ष व राष्ट्रीय तीरंदाजी संघ के उपाध्यक्ष कलराज मिश्र ने कहा कि सबसे पहले तो मैं सुशील कुमार को पदक जीतने के लिए बधाई देता हूं। यह गर्व करने का विषय है, लेकिन साथ ही इतने बड़े देश में एक स्वर्ण पदक का न आना कहीं न कहीं इस बात पर सवाल खड़े करता है कि खिलाडिय़ों को उनके मनमुताबिक सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं।
उल्लेखनीय है कि लंदन ओलंपिक में हिस्सा लेने वाले खिलाडियों में रायबरेली की सुधा सिंह जहां अपनी प्रतिस्पर्धा में 13वें नम्बर पर रहीं, वहीं दूसरी ओर निशानेबाजी में भी अलीगढ़ के अनुराज सिंह को 23वें स्थान से संतोष करना पड़ा।
भारोत्तोलन में लखनऊ की सोनिया चानू ने 48 किलोग्राम भारवर्ग में सातवां स्थान हासिल किया तो कुश्ती के 74 किलोग्राम भार वर्ग में नरसिंह यादव पहले ही चक्र में पराजित होकर प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गए।
मेरठ की गरिमा चौधरी जूडो प्रतिस्पर्धा में 63 किलोग्राम भारवर्ग में पहले ही दौर में बाहर हो गई। इसके अलावा रामसिंह यादव, तुषार खांडेकर और दानिश मुज्तबा भी अपनी-अपनी प्रतिस्पर्धाओं में कुछ खास नहीं कर सके।

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