रिजर्व बैंक से नीतिगत बयाज दरों में कटौती और तरलता बढ़ाए जाने के लिए सीआरआर में कमी की उम्मीद लगाए देश के उद्योग जगत और बैंकिंग क्षेत्र को आज निराशा हाथ लगी। मंहगाई थामने को तरजीह देते हुए केंद्रीय बैक ने रेपो दर, रिवर्स रेपो और नकद सुरक्षित अनुपात (सीआरआर) में कोई बदलाव नहीं किया जिससे सस्ते कर्ज की आशा लगाए लोगों को झटका लगा है।

आरबीआई के गवर्नर डी सुब्बाराव ने मौद्रिक और ऋण नीति की तिमाही मध्यावधि की समीक्षा की घोषणा करते हुए अपेक्षाओं के विपरीत रेपो दर, रिवर्स रेपो दर और नकद सुरक्षित अनुपात (सीआरआर) में कोई परिवर्तन नहीं किया। आरबीआई के अनुसार नीति गत बयाज दरों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। रेपो दर आठ प्रतिशत और रिजर्व रेपो दर सात प्रतिशत पर बरकरार रहेगी। रिजर्व बैंक ने सीआरआर में कोई बदलाव नहीं किया है और सीआरआर 4.75 प्रतिशत पर स्थिर है।

रिजर्व बैंक को आने वाले दिनों में महंगाई बढ़ने की चिंता सता रही है। केन्द्रीय बैंक को लगता है कि जिस तरह से थोक और खुदरा दोनों ही क्षेत्रों में सकल मुद्रास्फीति पर दबाव बना हुआ है और आर्थिक वृद्धि की रफतार सुस्त पड़ रही है, उससे आने वाले दिनों में आपूर्ति गड़बड़ाने और महंगाई बढ़ने की आशंका बनी हुई है।
रिजर्व बैंक की सोमवार को जारी मध्य तिमाही समीक्षा में इसके साफ संकेत दिये गये हैं। केन्द्रीय बैंक ने कहा है कि अर्थव्यवस्था में वृद्धि की रफतार सुस्त पड़ने को देखते हुये उपभोक्ता वस्तुओं की आपूर्ति में गंभीर अड़चनें बन सकतीं हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम की घरेलू बाजार में पूरी कीमत नहीं वसूले जाने से पेट्रोलियम पदार्थों की खपत बढ़ती जा रही है। इससे मूल्य संकेतक भी गड़बड़ा रहे हैं। इससे मांग और आपूर्ति के बीच बेहतर सामंजस्य बिठाने में मुश्किलें आ रही हैं।
समीक्षा में कहा गया है कि ऐसे समय जब सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की नितांत आवश्यकता है पेट्रोलियम पदार्थों का बढ़ता सब्सिडी बोझ सार्वजनिक निवेश पर बुरा असर डाल रहा है। केन्द्रीय बैंक ने कहा है कि आर्थिक वृद्धि सुस्त पड़ने के बावाजूद चालू खाते का बढ़ता घाटा स्पष्ट तौर पर मांग और आपूर्ति के असंतुलन को दर्शाता है और यह आपूर्ति पक्ष में तुरंत सुधार की आवश्यकता की तरफ इशारा करता है।
केन्द्रीय बैंक ने कहा है हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम अप्रैल 2012 के स्तर से काफी नीचे आये हैं लेकिन डॉलर के मुकाबले रुपये की भारी गिरावट ने थोक मूल्य सूचकांक पर इसके असर को नहीं आने दिया। यहां तक कि कच्चे तेल के मौजूदा दाम पर भी पेट्रोलियम पदार्थों के दाम में कम वसूली बनी हुई है।प्राथमिक खाद्य जिंसों की मुद्रास्फीति जो कि जनवरी में शून्य से नीचे 0.7 प्रतिशत रह गई थी वह तेजी से बढ़कर मई में 10.7 प्रतिशत पर पहुंच गई। सब्जियों और प्रोटीन आधारित वस्तुओं के दाम बढ़ने से इसमें तेजी आई। मुख्य मुद्रास्फीति में खाद्य पदार्थों के भारी असर को देखते हुये दक्षिण-पश्चिम मानसून की भूमिका काफी अहम हो गई है। वर्ष के दौरान मुद्रास्फीतिक परिस्थितियों में मानसून की भूमिका बढ़ गई है।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) की नई श्रृंखला पर आधारित मुद्रास्फीति भी फरवरी में 8.8 प्रतिशत रहने के बाद मार्च में बढ़कर 9.4 प्रतिशत तथा अप्रैल में और बढ़कर 10.4 प्रतिशत तक पहुंच गई। थोक मूल्यों की गिरावट का खुदरा बाजार में असर नहीं दिख रहा है। खाद्य और ईंधन को छोड़कर सीपीआई मुद्रास्फीति अभी भी दहाई अंक में बनी हुई है, जिसका सीधा मतलब है कि थोक मूल्यों में आई गिरावट का असर खुदरा बाजार तक नहीं पहुंच रही है।
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