प्रभात रंजन दीन

तेरह साल पहले करगिल युद्ध हुआ। इकतालीस साल पहले बांग्लादेश मुक्ति युद्ध हुआ। सैंतालीस साल पहले भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ। पचास साल पहले भारत-चीन युद्ध हुआ। …पंजाबी में कहते हैं ‘की फरक पैंदा’ …यानी क्या फर्क पड़ता है! आजादी के बाद आज तक भारतीय सेना युद्ध ही तो लड़ रही है। शहादतें ही तो दे रही है। शत्रु-पोषित आतंकवाद से युद्ध लड़ते हुए अपमानित ही तो हो रही है। सीमा से लेकर अंदर तक सारे प्रशासनिक-शासनिक नाकारेपन की भरपाई के लिए मुहरे की तरह इस्तेमाल ही तो हो रही है… देश पर इससे क्या फर्क पड़ रहा है? हमने अपने घर में अवांछित तत्वों को घुसने का मौका दिया, हम आंखें मूंदे पड़े रहे। उन्हें अपने घर से बाहर धकेलने के लिए अपने नौनिहालों को कुर्बान कर दिया और उस आरोपित बलि को ‘विजय-दिवस’ के रूप में मनाने लगे। विजय दिवस मनाएं या करगिल दिवस या शहादत दिवस… दरअसल यह दुकान सजाने का नेताओं का माल है। ये जिंदगियां बेचते हैं, मृत्यु बेचते हैं, शोक बेचते हैं, संवेदनाएं बेचते हैं और सियासत का ‘बिग-बाजार’ चलाते हैं? इन युद्धों और शहादतों से देश पर क्या फर्क पड़ता है! व्यक्ति पर फर्क पड़ता है, जिसके घर का बच्चा बलि का बकरा बनता है…

Indian Army

अगर देश पर फर्क पड़ता तो उपसेनाध्यक्ष रहते हुए सैन्य खुफिया इकाई का ढांचा तहस-नहस करने वाले सुंदरराजन पद्मनाभन को क्या भारत का सेनाध्यक्ष बना दिया जाता? पद्मनाभन ने उत्तरी कमान जैसे संवेदनशील सैन्य क्षेत्र में ‘प्रयोग के बतौर’ सैन्य खुफिया एजेंसी की अभिसूचना प्रणाली बदल दी थी। उसी दरम्यान करगिल में पाकिस्तान की सेना ने घुसपैठ कराई, जो बाद में खूनी जंग के रूप में तब्दील हुई। करगिल युद्ध के बाद उसी व्यक्ति को सेनाध्यक्ष बना कर सरकार की तरफ से पुरस्कृत किया गया। जनरल एस पद्मनाभन को सेनाध्यक्ष क्यों बनाया गया? उसने पाकिस्तान के लिए घुसपैठ का रास्ता खुलवाया, इसलिए? या कि भारत के सैकड़ों बच्चों को बलिदान की आग में झोंक कर सियासत की आंच तेज करने का रास्ता प्रशस्त करने के एवज में ऐसे हीन व्यक्ति को सेनाध्यक्ष की पदवी ईनाम में दी गई थी? इसका जवाब न तो कोई मांगता है और न कोई देगा।

उत्तरी कमान जो कश्मीर से लगे संवेदनशील पाकिस्तान सीमा की सुरक्षा का दायित्व संभालता है, उस कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल दीपक कपूर ने सीमा पर जूझने वाले सैनिकों के अंडे तक बेच कर खा लिए थे। रसद में घपला किया। कपड़े-कम्बल तक बेच डाले। हड्डियां गला देने वाली ठंड में युद्ध लड़ रहे सैनिकों के ‘स्नो-बूट’ में घोटाला किया जिसके चलते सैनिकों के पैर सड़ गए लेकिन उन्होंने युद्ध से अपने पैर पीछे नहीं खींचे। …और जिन दिनों हमारे-आपके बच्चे युद्ध में शहीद हो रहे थे, उनके ताबूत तक जिस अधिकारी ने बेच डाले उसे भारत का सेनाध्यक्ष का पद दिया जाता है। जनरल दीपक कपूर को सेनाध्यक्ष बनाने वाले सत्ताई अलमबरदार युद्ध में शहीद हुए बच्चों के प्रति सम्मान में ऐसा गलीज आचरण कर रहे थे या शहादत को ही गलीज बना रहे थे? यह सवाल भी न कोई पूछेगा और न कोई इसका जवाब देगा। भारत में युद्ध और शहादतों का यही सम्मान है कि लेफ्टिनेंट जनरल दीपक कपूर का घोटाला पकडऩे वाले वरिष्ठ लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग को सेनाध्यक्ष नहीं बनाया जाता है। जनरल पनाग को दीपक कपूर का मातहत बना कर मध्य कमान के कमांडर के रूप में लखनऊ भेज दिया जाता है, जहां से रिटायर होकर वह विलुप्त हो जाता है। यह भारत देश है। जहां प्रतिबद्धता और राष्ट्रधर्म आपको एचएस पनाग बना कर हाशिए पर धकेल देती है और निकृष्टता-चरित्रहीनता आपको दीपक कपूर बना कर नियंता बना देती है।

… तो सवाल उठेगा न कि क्यों लड़ रहे हैं और शहीद हो रहे हैं हमारे बच्चे? इस पर एक कविता की बड़ी सटीक पंक्तियां हैं… खून जमा देने वाली इस बर्फानी घाटी में / किसके लिए लड़ रहा हूं मैं / पत्र में पूछा है तुमने / यह जो बहुत आसान सा लगने वाला सवाल / दुश्मन की गोलियों का जवाब देने से भी / ज्यादा कठिन है इसका जवाब / अगर किसी और ने पूछा होता यही प्रश्न / तो, सिर्फ अपने देश के लिए लड़ रहा हूं / गर्व से कहता सीना तान / पर तुम जो मेरे बारीक से बारीक झूठ को भी जाती हो ताड़ / तुम्हारे सामने कैसे ले सकता हूं इस अर्धसत्य की आड़ / देश के लिए लड़ रहा हूं यह हकीकत है, लेकिन / कैसे कह दूं कि उनके लिए नहीं लड़ रहा मैं / जो मेरी जीत-हार की बिसात पर खेल रहे सियासत की शतरंज / और यह कह भी दूं तो क्या फर्क पड़ेगा / जबकि जानता हूं इनमें से कोई न कोई / उठा ही लेगा मेरी जीत-हार या शहादत का लाभ / मेरा जवाब तो छोड़ो / तुम्हारे सवाल से ही मच सकता है बवाल / सरकार सुन ले तो कहे / सेना का मनोबल गिराने वाला है यह प्रश्न / नेता के हाथ पड़ जाए / तो वह इसे बट कर बनाए रस्सी / और बांध दे मुझ जैसे देशभक्त के हाथ-पांव / इसी रस्सी से तुम्हारे लिए / फांसी का फंदा भी बना सकता है वह / इसीलिए तुम्हारे इस सवाल को / तुम्हारी हिफाजत के लिए सात तह के नीचे छिपाता हूं / इसका जवाब देने से कतराता हूं / सवाल का जवाब देने में देश को लाज आए, इससे बचाता हूं / तुम्हारे सवाल को अपनी आत्मा की तरह मारता हूं…
लेकिन मेरा सवाल जिंदा है, चीखता रहेगा लगातार नक्कारखाने में…

साभार कैनविज

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