भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान का अनंत भंडार मौजूद है। भारतीय भाषाओं और ग्रंथों में हर चीज का हल मौजूद है। इसीलिए दुनिया ने हमें विश्व गुरू माना है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह बात साहित्यकार गोविन्द मिश्र को सरस्वती सम्मान प्रदान करने के मौके पर कही।

गृहमंत्री ने कहा कि कई विदेशी वैज्ञानिकों ने अपने अन्वेषण की प्रेरणा भारत के ज्ञान से ली है। उन्होंने अनिश्चितता का सिद्धांत देने वाले वैज्ञानिक हाइजनबर्ग का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे उन्होंने इस सिद्धांत की प्रेरणा गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर के साथ वेदांत पर चर्चा के दौरान ली थी।

गृहमंत्री ने कहा कि केके बिरला फाउंडेशन ने इस पुरस्कार का नाम किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर नहीं रखा। बल्कि यह ज्ञान की देवी सरस्वती के नाम पर रखा गया है। यह हमारी सांस्कृतिक विरासत की सम्मान है। साहित्य मनुष्य के मन को बड़ा करने की कोशिश करता है। जिस अनुपात में मन बड़ा होता है उसी अनुपात में आनंद और सुख की अनुभूति भी बढ़ती जाती है। गोविन्द मिश्र को उन्होंने सकारात्मक साहित्यकार बताया।
इस मौके पर गोविन्द मिश्र ने कहा कि साहित्यकार होना सबसे बड़ा वरदान है। साहित्यकार अपना, अपने देश का और समाज का सुख-दुख बार-बार भोगता है। कई-कई जीवन जीता है। समय से मुठभेड़ करता है और लहू-लुहान होता है। उन्होंने कहा कि साहित्य समाज की आत्मा है। मनीषियों द्वारा रचे हुए साहित्य की अनुभूति नहीं करने वाला सही मायनों में अशिक्षित ही रह जाता है।

सरस्वती सम्मान की चयन परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति रमेश चंद्र लाहोटी ने गोविन्द मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व की जानकारी दी। उनके उपन्यास ‘धूल पौधों पर’ का संक्षिप्त परिचय भी उन्होंने प्रस्तुत किया। फाउंडेशन की अध्यक्षा शोभना भरतिया ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने फाउंडेशन द्वारा साहित्य के क्षेत्र में दिए जाने वाले सरस्वती सम्मान, व्यास सम्मान और बिहारी पुरस्कार की जानकारी दी। देश की आठवीं अनुसूची में वर्णित 22 भाषाओं की पिछले दस सालों में प्रकाशित सर्वश्रेष्ठ पुस्तक का त्रिस्तरीय प्रक्रिया के जरिए इस पुरस्कार के लिए चयन किया जाता है। कार्यक्रम के अंत में प्रियव्रत भरतिया ने धन्यवाद ज्ञापन किया। फाउंडेशन के सदस्य-सचिव सुरेश तुपर्ण ने सम्मान के साथ दिए जाने वाला प्रशस्ति-पत्र का पाठ किया।

गोविन्द मिश्र: एक परिचय
-1939 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के अतर्रा में शिक्षक परिवार में जन्म
-1957 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की विशारद परीक्षा उत्तीर्ण
-1959 में अंग्रेजी साहित्य में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए.
-1959 से 1961 तक अध्यापन कार्य किया
-1961 में भारतीय राजस्व सेवा के लिए चुने गए

साहित्यकार होना है सबसे बड़ा वरदान: गोविन्द मिश्र
-1997 अध्यक्ष, केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड से सेवानिवृत्त
-1965 से नियमित लेखन
-अब तक 11 उपन्यास, 14 कहानी संग्रह, 5 यात्रा वृत्तांतों का सृजन
-साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, भारत-भारती सम्मान जैसे सम्मान पहले ही मिल चुके हैं

‘धूल पौधों पर’ में है नारी का संघर्ष
सरस्वती सम्मान से सम्मानित कृति ‘धूल पौधों पर’ में यूं तो बहुआयामी जीवन विमर्श प्रस्तुत हुआ है। लेकिन, व्यापक स्त्री विमर्श इसमें सर्व प्रमुख है। नारी जीवन के विडम्बनापूर्ण संघर्ष और प्रेम के द्वंद से उपजी स्नेहिल करुणा की विलक्षण अभिव्यक्ति इस उपन्यास में हुई है। काव्यात्मकता के कारण इसे उपन्यास के कलेवर में एक लंबी कविता भी कहा जाता है।

22 सालों बाद हिंदी कृति का चयन
सरस्वती सम्मान के लिए 22 सालों बाद हिंदी भाषा की किसी कृति का चयन किया गया है। वर्ष 1991 में डॉ. हरिवंश राय बच्चन को ‘दशद्वार से सोपान तक’ के लिए पहला सरस्वती सम्मान प्रदान किया गया था।images

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