विधानसभा चुनाव परिणामों से बसपा की राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता खतरे में पड़ गई है। बसपा ने 1998 की तरह दिल्ली में इतिहास रचने और अपनी अस्मिता बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन दिल्ली वासियों ने बसपा की नीतियों और नेताओं को पूरी तरह नकार दिया। बसपा प्रत्याशी अपनी जमानत तक बचाने में असफल रहे। पूरी दिल्ली में बसपा के सभी प्रत्याशियों को 1.16773 मत ही पा सके। जबकि राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता बनाए रखने के लिए बसपा को 8 प्रतिशत मत मिलने चाहिए अथवा 6 प्रतिशत मत और 2 प्रत्याशी जीतने चाहिए, लेकिन बसपा असफल रही। महाराष्ट्र, हरियाणा जम्मू कश्मीर में मिली पराजय के बाद केंद्रीय चुनाव आयोग ने बसपा प्रमुख मायावती को राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता समाप्त करने के लिए पत्र लिखा था। पत्र के बाद बसपा प्रमुख ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में बसपा के चुनाव परिणाम तक का समय देने का आग्रह किया था। जिसे केंद्रीय चुनाव आयोग ने मान लिया था। अब दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी बसपा को हार का मुंह देखना पड़ा और एक भी प्रत्याशी जीत दर्ज नहीं करा सका। बसपा को जो मत मिले वह भी आशानुरूप नहीं थे। बसपा को 8 प्रतिशत वोट चाहिए थे और अगर 8 प्रतिशत वोट नहीं मिले तो कम से कम दो सीटों पर प्रत्याशियों का जीतना जरूरी था और 6 प्रतिशत मत मिलना जरूरी था,लेकिन इनमें से कुछ भी नहीं हुआ। 8 प्रतिशत वोटों के लिए बसपा प्रमुख ने ताबड़ तोड़ 14 चुनावी रैलियां की और उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों के बसपा नेताओं को चुनाव प्रचार में लगाया गया था ,लेकिन बसपा द्वारा पूरी ताकत झोंकने के बाद भी बसपा को शर्मनाक हार का समाना करना पड़ा है। बसपा के वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहाकि बसपा के दिल्ली में 17 प्रतिशत मतदाता है। जो बसपा की नीतियों में विास करते थे ,लेकिन पिछले 104 वर्षाें से बसपा से विमुख होने लगे थे और आज पूरी तरह बसपा नकार दिया

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