दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार व समाजसेवी लोकादेश के बारे में बता रहे अरुण तिवारी
arun tiwariपार्टी, पार्टी और पार्टी! पार्टिंयों के उम्मीदवार, पार्टिंयों के घोषणापत्र, पार्टिंयों का ही राज! पार्टियां चाहे ं, तो कानून; न चाहें, तो जनता का हित बेमतलब! पार्टी फस्र्ट; वोटर लास्ट। 6 राष्ट्रीय, 47 राज्य स्तरीय.. कुल पंजीक ृत 1616; भारत लोकत ंत्र है यह चित्र बदलना होगा। यह चित्र असवैंधानिक है। संविधान व्यक्ति को चुनाव लडऩे का अधिकार देता है, पार्टी या पक्ष को नहीं। कोई बताय े कि भारत के संविधान में इस बाबत पार्टी या पक्ष का नाम कहां लिखा है ? मालूम नहीं, चुनाव आयोग किस संविधान के तहत् पार्टियों को पंजीकृत करता है और चुनाव में दलगत उम्मीदवारी की अनुमति देता है ? महात्मा गांधी ने तो काग्रेस को बर्खास्त करने की बात बहुत पहले कह दी थी। कायदे से संविधान लाग ू होते ही सभी राजनीतिक दलों को बर्खास्त हो जाना चाहिए था। जो आज तक नहीं हुआ। नतीजा यह है कि 150 वर्षों में अंग्रेजों ने जितना नहीं लूटा, उतना इन 66 वर्षों में पार्टिंयों ने देश को लूट लिया। गत् 14 मार्च को लोकादेश-2014 के मंच से ये सभी सवाल उठाकर नामी सामाजिक कार्य कर्ता अन्ना हजारे ने दलगत उम्मीदवारी के समक्ष एक नई बहस तो छेड़ी ही, वर्ष 2019 और आगे पक्ष, पार्टी विहीन उम्मीदवारों को समर्थन का ऐलान भी किया। कहा कि यह उनका सपना है। दलविहीन राजनीति का यह सपना कितना सही है, कितना गलत ? कितना जनहितकारी होगा, कितना अराजक ? यह सपना वैकल्पिक राजनीति है या आम आदमी पार्टी की तरह नया राजन ैतिक विकल्प खङा करने की एक और कोशिश ? अंग्रेजों ने भारत को ज्यादा लूटा या भारत की पार्टियों ने ? धोखा संतोष भारतीय ने अन्ना को दिया या अन्ना ने तृणमूल कांग्रेस को ? ये सभी प्रश्न बहस का विषय हो सकते हैं, लेकिन इस बात से भला कौन इ ंकार कर सकता है कि आजादी के वक्त जैसी शुद्ध हवा, जितने प्राकृतिक जंगल, जितनी स्वच्छ नदियां, जितना मीठा पानी, जितन े प्रवाहमान झरने, और जितने गांव भारत में थे, आज उनकी संख्या व गुणवत्ता.. दोनो मे ं कमी आई है। इन 66 वर्षों में प्रदूषण बढा है। पलायन बढा है। आत्महत्याएं बढ़ी हैं। अमीर और गरीब के बीच में खाई बढ़ी हैं। किसाना ें पर दर्ज कर्ज के मामले बढे हैं। किंतु राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर दर्ज मुकदमों में सजा का प्रतिशत आश्चर्य जनक रूप से घट गया है। एक तरफ राजनीतिज्ञों, मिलावटखोरों, मुनाफाखोरों और भ्रष्टाचारियो ं की सुरक्षा बढ़ी है, तो दूसरी तरफ हवा, पानी, नदी, खेती, जंगल, भूमि और भोजन की गुणवत्ता की सुरक्षा घटा दी गई है। सही है कि गरीब से गरीब व्यक्ति की भी आय बढ़ी है; पर क्या यह झूठ है कि उसी गरीब के लिए पानी, खेती और भोजन कई गुना ज्यादा मंहगे हो गये हैं। प्राकृतिक संसाधनों के अधिकार स्थानीय समुदायों के हाथ से खिसककर सरकारों और मुनाफाखोरों के हाथों में चले गये हैं। परिणामस्वरूप इन वर्षों में प्राकृतिक संसाधना ें का दोहन बढ़ा कब्जे बढ े; व्यापार बढा, लेकिन गरीब को बिन पैसे पर्याप्त पानी की गारंटी घटती चली गई। दुखद है कि भूमि अधिग्रहण, उत्खनन और पानी की कमी के कारण इन 66 वर्षों म ें 92,009 भारत के नक्शे से मिट गये। Óभ ूदानÓ में दान दी गई ं हजारों एकङ जमीनें जरूरतमंदों को मिलने की बजाय किन्ही औरों के कब्जों में चली गई। नय े ढांचागत निर्माण के लिए गांवों ने प्रतिवर्ष एक शिकागो शहर जितनी जमीन गंवा दी। एकता परिषद के रमेश भाई के मुताबिक जिस उत्खनन के कारण, हमने लाखोंं एकड़ जमीन बर्बाद की, उनसे मिल े खनिज उत्पादा ें का े न के बराबर मूल्य में खनन कंपनियों को बेचने की नीति अपनाई। कोयला चार पैसे प्रति किलो और बॉक्साइट जैसा कीमती खनिज एक रुपये साठ पैसे की दर से बेचा। कप ंनियों ने इसे र्कइ सौ गुना अधिक दर पर बेचकर मुंहमांगा मुनाफा कमाने दिया। गौर कीजिए कि वनक्षेत्र सिकुङकर 20 प्रतिशत से नीचे आ गया है। भूजल के 70 प्रतिशत भंडार आज संकटग्रस्त श्रेणी में शुमार हैं। 73 प्रतिशत नदियां सूखने की चुनौती से जूझ रही हैं। 27 प्रतिशत नदियां या तो नाला बन गई हैं या बनन े की ओर अग्रसर हैं। इन 66 वर्षा ें बाद कोई एक ऐसी प्रमुख नदी नहीं, पीने योग्य पानी के मापदण्ड पर जिसे खरा कहा जा सके। 66 वर्ष पहल े जो पानी हमें जीवन देता था, आज वही बीमारियां बांट रहा है। सचमुच, यह ताज्जुब की बात है कि सबसे ज्यादा वोटर गांव, गरीब और किसान ही है; बावज ूद इसके भारत की अर्थनीति गांव आधारित न होकर शहर आधारित हा े गई है। यह चित्र कैसे उलटेगा ? जलपुरुष राजेन्द्र सिंह की पहल पर आयोजित लोकादेश-2014 कार्य क ्रमों की श्रृंखला इस चित्र को उलटने की एक छोटी सी कोशिश थी। इस पहल के दौरान जल सुरक्षा, ग्राम सुरक्षा, खेत सुरक्षा, किसान सुरक्षा और भूमि सुरक्षा कानून की मांग जोर-शोर से उठाई गई। जल सुरक्षा बिल के पेश प्रारूप की प्रस्तावना मानती है कि प्राकृतिक संसाधनों के पोषण की बजाय, अधिक से अधिक शोषण को विकास मानने के की प्रवृति के कारण ही प्राकृतिक संसाधनों के व्यावसायीकरण को बढावा मिला। लिहाजा शोषण, प्रदूषण और अतिक ्रमण नई चुनौतियां बनकर हमें डरा रहे है ं। इन नई चुनौतियों से निपटन े के लिए जरूरी है कि नदी की जमीन को चिन्हित व अधिसूचित किया जाय। रिवर-सीवर अलग हा ें। औद्या ेगिक कचर े पर लगाम लगे। ठोस कचरे के पुर्नोपयोग का काम प्राथमिकता पर आये। प्रवाह का मार्ग बाधा मुक्त करने तथा नदी जल व रेत का अति दोहन रोकन े की बात जोर-शोर से उठाई गई। जल सुरक्षा अधिनियम बने। नदी जलग्रहण क्ष ेत्र विकास सुनिश्चित हो। भ ूजल की सुरक्षा लाइसे ंस अथवा जलनियामक आयोगों की बजाय जनसहमति से भूजल निकासी की गहराई सुनिश्चित कर करने जैसे र्कइ महत्वपूर्ण पानी, पर्यावरण और विकास के मसले पर जनाकांक्षा के औपचारिक दस्तावेज को पार्टिंयों के घोषणापत्र में शामिल कराने की ऐसी छोटी-छोटी का ेशिशें दिल्ली, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखण्ड में पहले भी की जाती रही हैं। Óहिमालय लोक नीति मसौदा समितिÓ के संयोजक श्री सुरेश भाई की पहल पर तैयार उत्तराखण्ड लोक घोषणापत्र को नजरअंदाज करना, उत्तराखण्ड के हितों को नजरअंदाज करने जैसा होगा – ÓÓगरीबी रेखा स े नीचे के परिवारों के चयन संबंधी केन्द ्र सरकार के वर्तमान मानकों को निरस्त करेंगे। विषम पर्वतीय परिस्थितियों के अनुकूल नय े मानकों का निर्धारण कर ेंगे।ÓÓ उत्तराखण्डी जनाकांक्षा के घोषणापत्र का यह पहला बिंदु है। जल पर जनाधिकार, आरक्षित-संरक्षित क्षेत्रों में उपयोग स ंबंधी अधिकार, अनुसूचित जनजाति व परंपरागत वनवासी अधिनियम-2006 का े प्रभावी ढंग से लागू करना, वनवासी जनजातियों की पुश्तैनी भूमि का सुधार, पंचायती वन, प्रत्येक परिवार को न्य ूनतम 63 नाली भूमि वाली भू-नीति, कृषि नीति, हिमालयी लोक नीति, युवा नीति, पंचायती राज कानून और सांसद/विधायक निधि समाप्त करने और 30 प्रतिशत बजट शिक्षा पर खर्च करने जैसे मसले घोषणापत्र की प्राथमिकता पर हैं। रोजगार नीति परिवार केन्द्रित होगी। महिला-पुरुष को समान मजदूरी होगी। उम्मीदवारों को खारिज करने तथा जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने जैसे लोकतांत्रिक कदम उठाने की घोषणा भी इस घोषणापत्र में हैं। इस जन घोषणापत्र में उत्तराखण्ड में हुए विनाश के खिलाफ चिंता साफ दिखाई देती है – ÓÓसुरंग आधारित जलविद्युत परिया ेजनाओं पर पर प्रतिबंध होगा।ÓÓ छोटी नहर आधारित सूक्ष्म जलविद्युत परियोजनाओं का वैकल्पिक सपना इस घोषणापत्र में प्रमुख है: ÓÓघराट और सूक्ष्म जलविद्युत परियोजनाओं से लोग खुद बिजली पैदा करेंगे। वितरण हेतु छोटे-छा ेटे ग्रिड स्थापित होंगे। बिजली आधारित छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों खङे किए जाय ेंगे। पंचायत स्तर पर जलविद्युत उत्पादक सहकारी समितियां गठित होंगी। वे इनका प्रबंधन करेंगी। पर्यटन को अनुशासित किया जायेगा। आपदा से पहले ही राशन, मिट्टी का तेल व वैकल्पिक ईंधन की व्यवस्था होगी। पुननिर्माण का कहना न होगा कि जो समाज अपना भविष्य किसी और को सौंपकर सो जाता है, उसकी अमानत में ख्यानत का खतरा हमेशा बना रहता है। इससे उलट जो समाज अपने भूत से सीखकर अपने भविष्य की सपना बुनने में खुद लग जाता है, वह उसे एक दिन पूरा भी करता है। यदि उसके भविष्य नियंता उसकी बात नहीं सुनते तो एक दिन वह खुद अपने भविष्य निर्माता की भूमिका में आ जाता है। लोकादेश-2014 और उत्तराखण्ड लोक घोषणापत्र ऐसे ही सपनों क े दस्तावेज हैं। अब नेतृत्व को चुनना है कि जनता के इन दस्तावेजों की सुने, ताकि जनता उन्हे चुने या फिर वह दस्तावेजों को खारिज कर दे और जनता उन्हे।

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