एजेंसी। कानपुर

भाजपा नेता और सांसद वरूण गांधी ने ‘परिवारवाद’ को देश की सबसे बड़ी कमी बताते हुए आज कहा कि अगर वह खुद किसी राजनीतिक परिवार से नहीं होते तो आज किसी नेता के पीछे खड़े होते। राजनीतिक दलों में शामिल युवाओं में से 80 फीसदी को किसी न किसी राजनीतिक परिवार का हिस्सा बताते हुए उन्होंने नौजवानों को उनके परिवार के बजाय उनकी योग्यता के आधार पर आगे बढऩे का मौका देने का माहौल बनाने की जरूरत बताई। केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी के पुत्र वरूण ने यहां कहा, यदि मैं राजनीतिक परिवार से नहीं होता तो किसी नेता के पीछे खड़ा होता या किसी नेता के सहारे या भरोसे राजनीति कर रहा होता। जबकि होना यह चाहिए कि युवाओं को उनकी योग्यता, कर्मठता और गुणों के आधार पर मौका मिले। आम परिवारों के युवाओं भी बराबर का मौका मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा, वह यह तो नहीं कहेंगे कि भाजपा में ऐसा शून्य है लेकिन यह जरूर है कि दूसरे दलों की तुलना में भारतीय जनता पार्टी में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है जब बड़े परिवारों से ताल्लुक रखने वाले नौजवानों के अलावा अन्य को मौका नहीं मिले। वरूण गांधी आज शहर के वीएसएसडी कालेज नवाबगंज में स्वामी विवेकानंद एवं आधुनिक युवा विषय पर आयोजित संगोष्ठी में बोल रहे थे। भाजपा नेता ने कहा, इस देश की राजनीतिक व्यवस्था में सबसे बड़ी कमी यह है कि हम परिवारवाद से कभी बाहर नहीं निकल पाए। आज अस्सी प्रतिशत नौजवान और युवा किसी के बेटे हैं या राजनीतिक दलों के परिवारों से निकल कर आए हैं वो या तो किसी के बेटे है या किसी के भतीजे या किसी राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं। अगर मैं एक राजनीतिक परिवार में जन्म नहीं लेता तो मैं भी कहीं न कहीं राजनीति में किसी के पीछे चल रहा होता या किसी के भरोसे राजनीति कर रहा होता। उनके अनुसार, हालांकि, जो युवा बड़े परिवारों से नहीं आते लेकिन संगठन में मेहनत से काम करते हैं वह किसी न किसी के सहारे ही राजनीति में आगे बढ़ते हैं। आखिर स्वामी विवेकानंद को भी रामकृष्ण परमहंस का सानिध्य प्राप्त था। वरूण गांधी ने कहा, हमें यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि आम चुनाव में मिली जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जाता है। क्योंकि जिन लोगों ने भी चुनाव जीता है, फिर चाहे वह वरूण गांधी हों या कोई और, सच यही है कि हमने चुनाव मोदी के नाम पर जीता है। उन्होंने कहा कि देश के विकास में युवाओं की भागीदारी कम होना और उनमें उम्मीद की कमी होना उन्हें भटकाव की ओर ले जाता है। वरूण गांधी ने कहा, ऐसा तब होता है जब आदमी की उम्मीद शून्य हो जाती है। राजनीति में आने का मेरा लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा लोगों के भीतर उम्मीद जगाना है।

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