देश के जाने माने वरिष्ठ पत्रकार प्रभात रंजन दीन की फेसबुक वाल से साभार:
कोई अखबार छोटा नहीं होता। कोई पत्रकार बड़ा नहीं होता। अगर वह वाकई अखबार है तो। और अगर वह वाकई पत्रकार है तो। कुछ पत्रकारों की अतिरिक्त आर्थिक सम्पन्नता और कुछ पत्रकारों की अतिरिक्त आर्थिक विपन्नता का विचित्र-विरोधाभास पत्रकारीय-धर्म पर वेदना की तरह चस्पा है। अभी चुनाव का समय है। ‘पेड न्यूज़’ की फिर चर्चा शुरू हुई और पत्रकारों की निन्दा का प्रस्ताव फिर से जारी होना शुरू हो गया। यह ‘पेड न्यूज़’ किन पत्रकारों को और किन मालिकों को फायदा पहुंचाता है, इसके बारे में आप सब अच्छी तरह जानते हैं। छोटे कस्बों, तहसील, ब्लॉकों से लेकर जिलों और राज्य मुख्यालय तक के संघर्षशील ईमानदार पत्रकार खुद अपनी ताकत के प्रति कब सतर्क होंगे..? हमलोग संवाद बनाएं और पहल करें… कृपया अपना नम्बर, ई-मेल आईडी और अपना संक्षिप्त परिचय मेरे मेल [email protected] पर भेजें, ताकि हम सब मिल कर शक्ति का शामियाना खड़ा कर सकें… जिनकी चुटकी में चिंगारी निकालने की ताकत हो या चिंगारी पैदा करने की ताकत लाने की जिजिविषा हो, वे साथी ही दोस्ती का हाथ बढ़ाएं…
(‘वॉयस ऑफ मूवमेंट’ में मैंने आज जो सम्पादकीय लिखा है, आपके लिए भी प्रस्तुत कर रहा हूं। यह भी अखबार है, जिसका सम्पादक ऐसे सम्पादकीय लिख देता है और यह ऐसा अखबार है जो ऐसे सम्पादकीय प्रकाशित करने का साहस कर देता है)… आपका प्रभात

पत्रकारों की तो बहुत बुरी दशा है। अब चुनाव आ रहा है तो और बुरी दशा होने वाली है। जबकि समाज में ठीक इसके उलटी कथा चलती है। चुनाव आ रहा है अब तो पत्रकारों की मौज ही मौज है। जबकि यह घोर विपरीत तथ्य है। चुनाव आ रहा है तो पत्रकारों की बहुत बुरी दशा होने वाली है और मीडिया मालिकों की मौज ही मौज। यह कोई लिखेगा-बोलेगा नहीं। जो मुंडी पर पेट्रोल का पीपा उठाए चलते हों वही चुटकियों से चिंगारी चटखाने की हिम्मत करें तो बात बनती है। वरना वाक-रति का तो भारत में कम्पीटिशन ही कम्पीटिशन है। जितने खोखले लोग उतनी ही भरी-भरी बातें। सीतापुर में एक सेमिनार में मुझे भी बुला लिया था पत्रकार भाइयों ने। साख का संकट सेमिनार का विषय था और इस फैशनेबुल विषय पर बोलने वाले निन्दा-फैशन के धनी लोगों ने पत्रकारों को गरियाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। जो आए, वही गरियाए। दारू-मुर्गा खा कर खबर लिखते हैं। खबरें बेचते हैं। पत्रकार और दारोगा में कोई फर्क नहीं रहा। बिक चुके हैं। मर चुके हैं। वगैरह वगैरह। जो लोग निन्दा रस का गायन सुर और ताल का ध्यान रखे बगैर चला रहे थे, उन सब की चारित्रिक पृष्ठभूमि का तो नहीं पता और पृष्ठभूमि का पता चलना भी नहीं चाहिए जब अग्रभूमि ही सामने दिख रही हो तो। क्योंकि शब्दों की मर्यादा का आचरण तो मंच पर प्रदर्शित हो ही रहा था। बहरहाल, इतना गायन सुनने के बाद यह आत्मज्ञान हुआ कि इस सेमिनार में मैं तो गलत आ गया। मंच के सामने करीब-करीब सारे नहीं तो बहुसंख्यक पत्रकार और उन्हें गरियाने वाले मंच पर महिमामंडित भी और गालियां सुन-सुनकर तालियां भी। बड़ा अचंभित करने वाला ‘कॉम्बिनेशन’ बन रहा था। गालियां सुनते-सुनते उसी बीच अचानक मेरा नाम भी गूंजा। लगा कि गरियाने के क्रम में चलो अच्छा हुआ कि मेरा भी नाम सार्वजनिक रूप से पुकारा गया। लेकिन फिर झटका लगा कि वह तो मुझे बोलने के लिए आमंत्रित किया जा रहा था और इसीलिए मेरा नाम अनाउंस किया जा रहा था। खैर, मैंने अपनी भ्रांति दूर की कि मैं विचार सभा में नहीं बल्कि भर्त्सनासभा में आया था और मुझे ऐसी सभा में आने का अफसोस है। बहुत ही हार्दिक तकलीफ पत्रकारों की दशा देख कर हुई कि गालियां भी सुन रहा है और तालियां भी बजा रहा है। गालियां सुनने के बावजूद तालियां बजाने की जीवन-शर्त है पत्रकारिता का धंधा। मंच पर अच्छी संख्या में नेता भी बैठे थे। सांसद-विधायक भी थे और कुछ पूर्व थे तो कुछ वर्तमान और कुछ भविष्य के नेता भी थे। ये सारे नेता अखबार का इस्तेमाल कर ही नेता बने और अपनी स्थितियां मजबूत कीं। यह सिलसिला जारी है। लेकिन विडम्बना देखिए कि जिस जमात के बूते कोई सड़कछाप आदमी नेता बना उसने फौरन ही अपनी साख देखे बगैर मीडिया की साख तौलनी शुरू कर दी। मैंने पत्रकारों से कहा कि नेताओं के बारे में छापना बंद न करें, क्योंकि यह समाचार संकलन के कर्म के साथ अन्याय होगा, लेकिन जिस भी किसी नेता के बारे में छापें या उनका साक्षात्कार छापें, आप उनका इंटरव्यू इस सवाल के साथ शुरू करें कि ‘आपने पत्रकार को करप्ट करने के अलावा क्या उसे जीवन में आर्थिक तौर पर विधिक रूप से स्थापित करने और प्रतिष्ठित करने के लिए कभी भी संसद या विधानसभा या नगर पालिका या पार्टी फोरम में बात उठाई? अगर उठाई तो उसका विवरण दें।’ इस पहले सवाल के साथ देशभर में किसी भी नेता का इंटरव्यू होने लगे तो यकीन मानिए साथियो कि नेता इंटरव्यू से भागने लगेगा। क्योंकि उसने पत्रकारों को भ्रष्ट करने के सिवा कुछ किया ही नहीं है। कुछ नेताओं ने पत्रकारों के ‘वेज बोर्ड’ को लेकर बात उठाई भी तो वह केवल मीडिया में नाम छपवाने की प्रक्रियाभर थी। कभी किसी ने यह फिक्र नहीं कि कौन सा वेज बोर्ड बना, पत्रकारों का क्या वेतन है, कौन संस्था वेतन देती है, कौन किश्तों में देती है, कौन नहीं देती है, क्यों नहीं देती है, नेता मीडिया मालिकों को पैसा खिला कर खबरें क्यों छपवाता है और पत्रकारों को क्यों बदनाम करता है, वगैरह वगैरह… नेताओं ने पत्रकारिता के पेशे को कानूनी तौर पर सम्मानित कराने की फिक्र की होती तो आज हमें कोई गरियाने की हिम्मत नहीं करता। इस प्रायोजित-निन्दा कार्यक्रम के खिलाफ हम उठें, बहुत ही सार्थक तरीके से उठें, बहुत ही कारगर तरीके से उठें, पहल तो करें…

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.