सर्वोच्च न्यायालय दृढ़ प्रतिज्ञ है कि मजीठिया वेतन आयोग की संस्तुतियां अक्षरश: लागू की जाएं. विडम्बना यह है कि अखबार मालिकों व प्रबंधन का रवैया ऐसा नहीं लगता कि वे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का सम्मान करेंगे. गरीबों-मजलूमों के प्रति न्याय के लिए घड़ियाली आसूं बहाने वाले अखबार अपने पत्रकारों के प्रति कितने ईमानदार हैं, इसकी बानगी इससे बेहतर और क्या हो सकती है. किसी अखबार समूह को प्रचार के लिए लबे सड़क हाथी पर अगर बॉलीवुड की किसी मल्लिका का डांस करवाना हो तो वह करोड़ों रुपये फूंकने से भी पीछे नहीं हटेगा, मगर पत्रकारों को उनका वाजिब वेतन देने में अच्छे अच्छों को पसीने छूट जाते हैं. देश के दिग्गज पूंजीपति घराने आज इस कवायद में जुटे हैं कि कैसे पत्रकारों को उनका वाजिब वेतन देने से निजात मिल जाए. विश्व के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबार के उप सम्पादक से लेकर न्यूज एडिटर तक के पदनाम बदले जा रहे हैं, ताकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में घालमेल की गुंजाइश बरकरार रखी जा सके. अंग्रेजी अखबार तो नहीं, मगर भाषाई अखबार प्रबंधन इस जुगाड़ में हैं कि पत्रकारों को उनका वाजिब हक न देने का नया नजरिया पेश किया जा सके. कई जगह प्रिंट पत्रकार रातों रात वेब पत्रकार में तब्दील हो चुके हैं. मजेदार तथ्य यह है कि अपने हक की लड़ाई लड़ने की हिमाकत कोई भी पत्रकार दिखाने को तैयार नहीं दिखता. कारण साफ है, कौन बिल्ली के गले में घंटी बांध अपने बीवी-बच्चों के मुंह से निवाला छिनेगा.

हजारों पत्रकारों की रोजी रोटी खतरे में

जाहिर है मजीठिया आयोग के चलते इस देश के हजारों पत्रकारों की रोजी-रोटी आज खतरे में हैं. यही जमीनी हकीकत है. 2008 की मंदी में सबसे अधिक प्रभावित इस देश के अखबार समूह व एक एयरवेज कम्पनी हुई थी. यह सब कुछ सोची समझी सुनियोजित साजिश है. 2014 के आम चुनाव में यह साबित हो चुका है इस देश की मीडिया के चलते कितनी बेबुनियाद व झूठी बातें पूरे देश में फैलाई जा सकती हैं. सच्चाई यह है कि अखबार व न्यूज चैनल इस देश के पूंजीपतियों के लिए एक पोलिटिकल वीपन भर हैं और पत्रकार उनके कारतूस. अखबार समूह के मालिक करोड़पति से अरबपति बन चुके हैं, मगर अपने पत्रकारों को देने के लिए उनके पास पैसे नहीं है. यदि सही में अखबारों का प्रकाशन घाटे का सौदा है तो ये अखबार मालिक अपने प्रकाशन बंद कर कोई और धंधा क्यों नहीं करते? वे ऐसी गलती कत्तई नहीं करेंगे. कारण, उनके कई वाजिब और गैर वाजिब धंधे इन्हीं अखबारों और पत्रकारों की बदौलत फल फूल रहे हैं.

पढ़े लिखे तबके में आज भी पत्रकारों की एक साख है. मगर ज्यादातर भाषाई पत्रकार यह नहीं चाहते कि उनका बच्चा यह पेशा अपनाए. हाल ही में अमेरिका में हुए सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक पत्रकारिता उस देश का दूसरा सबसे बेकार प्रोफेशन है. आज देश के किसी भी भाषाई अखबार में काम के घंटे तय नहीं हैं. एटेंडेंस रजिस्टर में गोरखधंधा किया जाता है, ताकि पत्रकार के पास हक की लड़ाई लड़ने की कोई गुंजाइश न बचे. ज्यादातर पत्रकारों को आउटसोर्सिंग के जरिए तैनात किया जाता है. शातिर प्रबंधन उनसे पहले ही लिखवाकर रख लेता है कि पत्रकारिता उनका मुख्य पेशा नहीं है और वे शौकिया लिखते हैं. उनके आय का मुख्य जरिया खेती है. हालांकि उनसे काम 12-14 घंटे का लिया जाता है. जाहिर है उनकी हालत मनरेगा मजदूरों से भी गई गुजरी है. इस आधार पर स्टाफर पत्रकारों से काम लेने का अंदाजा लगाया जा सकता है. ऐसा नहीं है कि स्टाफरों को उनका उचित वेतन दिया जाता है. अगर ऐसा होता तो मजीठिया के नाम पर पूरे देश में सियापा नहीं पसरा होता.

ठेके पर तैनात किए जाते हैं पत्रकार

क्या आपको पता है कि ग्यारह महीने के ठेके पर भी इस देश के पत्रकार नौकरी करते हैं? जाहिर है प्रबंधन के इशारे पर न चले तो उनका पता गुल होना तय है. और कोई उपाय नहीं सुझा तो कन्या कुमारी के पत्रकार का तबादला कश्मीर कर दीजिए अपने आप नौकरी छोड़कर पत्रकार भाग खड़ा होगा. कितनी असुरक्षित नौकरी है यह. ऐसी हालत में कितनी तन्मयता से कोई पत्रकार अपने दायित्वों का निर्वहन करता होगा? क्या ऐसी स्थिति पैदा कर पत्रकारों को दलाल बनने के लिए विवश नहीं किया जा रहा. अगर उन्हें सम्मान के साथ उचित वेतन मिले तो वे क्यों ओछी हरकतें करेंगे?

बीस हजार से ज्यादा पत्रकार हुए बेरोजगार

मोटे तौर पर अनुमान है कि बीते पांच साल में इस देश में बीस हजार से ज्यादा पत्रकार बेरोजगार हुए हैं, मगर उनका कोई पुरसाहाल नहीं है. कारण, वे किसी पार्टी के वोट बैंक नहीं है. किसी चुनाव में उनका मुद्दा निर्णायक नहीं होता. क्योंकि अखबार मालिक राजनेताओं को चंदा देने और प्रचार करवाने में कहीं ज्यादा सक्षम हैं. कई अखबार मालिक तो खुद सम्पादक बनकर पत्रकारों को मिलने वाले छूट व रियायतों तक का दोहन करते हैं. इस देश में बुजुर्ग पत्रकारों के गुजारे के लिए पेंशन की कोई कारगर व मुकम्मल व्यवस्था तक नहीं है, ताकि बगैर कहीं हाथ फैलाए उनका जीवन गुजर हो सके. हां, पत्रकारों में एक मलाईदार तबका भी है गिने चुने सम्पादकों का. यह तबका अखबार मालिक के ब्लू आई ब्वाय होते हैं. आम पत्रकारों के शोषण के लिए मालिक के अमोघ हथियार. इन्हीं की बदौलत मालिक नित्य नए नए प्रयोग कर पत्रकारों की धार भोथरा करता है. इन कथित सम्पादकों का एक सूत्री लक्ष्य होता है अपनी कमाई दुरुस्त रखना. यही तबका बाकी पत्रकारों के भाग्य विधाता हैं.unnamed

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