कार्यकर्ताओं की कमी, पार्टियों में छाई गमीrohit
मुम्बई नगरी में अभी कोई चुनावी शोर नहीं है। पार्टियों को नहीं मिल रहे कार्यकर्ता बता रहे हैं दबंग दुनिया मुम्बई के डिप्टी न्यूज एडीटर रोहित तिवारी
लोकसभा चुनाव का नगाड़ा बज रहा है, लेकिन सभी राजनीतिक दलों के प्रचार कार्यालयों में अभी गर्मजोशी नहीं चढ़ी है। अधिकतर कार्यालयों में अभी तक सन्नाटा ही पसरा पड़ा है। इक्का-दुक्का कार्यकर्ता दफ्तरों में बैठे डेली रुटीन चला रहे हैं। एक कार्यकर्ता ने दबंग दुनिया को बताया कि कार्यकर्ताओं के बच्चों की परीक्षाएं चल रही हैं तो कहीं-कहीं होली की वजह से कार्यकर्ता पार्टी कार्यालयों में नहीं दिख रहे हैं। कहीं-कहीं ईयर एन्डिंग का बहाना भी है। कई आॅफिसों में ईयर एन्डिंग के चलते लेखा परीक्षण का काम शुरू हो जाता है। इसके चलते पार्टी कार्यकर्ता दफ्तरों में फिरकते नहीं हैं।
प्रचार के लिए कतरा रहे कार्यकर्ता
चुनाव में प्रचार सभा, नुक्कड़ सभा या पद यात्रा, रैली या घर-घर जाकर किया गया जनसंपर्क हो। इनके लिए बड़ी तादाद में कार्यकर्ताओं की जरूरत पड़ती है, लेकिन मौजूदा समय में सभी पार्टी कार्यालयों में कार्यकर्ताओं की जबरदस्त कमी है। इसकी एक वजह यह है कि फसलों का नुकसान होने के कारण कई लोग अपने गांवों की ओर रुख कर चुके हैं। दूसरा मुंबई में चुनाव के पूर्व तेजी से चल रहे बड़े प्रोजेक्टों में बड़े पैमाने पर मजदूर लगे हुए हैं, जिन्हें अर्जेंट काम शुरू होने के कारण ज्यादा मजदूरी मिल रही है। बहुत से कार्यकर्ता अपने काम-धंधे, नौकरी-व्यवसाय आदि संभालकर राजनीतिक दलों के प्रचार कार्य में भाग लेते हैं। वे लोग चुनाव के 10 से 12 घंटे प्रचार के काम को अंजाम देने से कतरा रहे हैं।
पेड कार्यकर्ताओं ने बढ़ाए रेट
मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाली बेरोजगार युवतियां, आदमी, मजदूर, गरीब सभी लोग चुनाव का किसी उत्सव की तरह इंतजार करते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि इस व्यवसाय में खानपान के अलावा तगड़ी रकम मिलती है। इन दिनों 12 घंटे के रेट लगभग 800 रुपए चल रहे हैं। साथ ही 12 घंटा ऊपर होने पर प्रति घंटा 100 रुपए देने पड़ते हैं। हर पार्टी गली-गली में जनसंपर्क इसलिए रख रही है, क्योंकि इसमें 40-50 कार्यकर्ताओं से ही काम चल जाता है। ये पेड कार्यकर्ता पार्टी के झंडे उठाकर नारेबाजी करते हुए गली-कूचे में घूमते हैं। इन्हें दोपहर को पूड़ी-साग, वड़ा-पाव या बिरयानी के पैकेट भोजन के रूप में दिए जाते हैं। 12 घंटे से अधिक काम करने वाले को खाना या 180 मिली. शराब की बोतल दी जाती हैं। पार्टियां इन्हें टी-शर्ट, टोपियां और पार्टियों के चुनाव-चिन्ह छपे गमछे आदि देते हैं। इन कार्यकर्ताओं को झोपड़पट्टियों में सक्रिय मित्र मंडलों के द्वारा बटोरा जाता है। इन मित्र मंडलों की बागडोर स्थानीय असामाजिक तत्वों के हाथ में रहती है। इन लोगों ने इस बार सभी राजनैतिक पार्टियों को कार्यकर्ता सप्लाई करने का तय किया है। एक कार्यकर्ता ने बताया कि सबसे ज्यादा मांग कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बीएसपी, रिपब्लिकन पार्टी आदि से है। समाजवादी पार्टी मुस्लिम कार्यकर्ताओं को शिवाजी नगर मानखुर्द से बटोरती है। इनको लाने-ले जाने की जिम्मेदारी स्थानीय मुल्लाओं की होती है। रिपब्लिकन पार्टी भी झोपड़पट्टियों में रहने वाले दलित संगठनों पर कार्यकर्ता सप्लाई के लिए निर्भर हैं।
चुनावी मोर्चा कार्यकर्ताओं पर निर्भर
कई पार्टियों ने अपने कार्यकर्ताओं को बटोरने के लिए दूसरे दांव लगाकर रखे हुए हैं। शिवसेना गली-गली में गणेश मंडलों को संरक्षण देती हैं। उनके कार्यक्रमों को आर्थिक मदद भी देती है। साथी ही गणेश मंडलों को बीएमसी से परमीशन देलाती है। बदले में गणेश मंडल उन्हें कार्यकर्ता सप्लाई करता है। कई बस्तियों में गणेश मंडल के अलावा दही-हॉन्डी फोड़ने वाले युवा, शिव जयंती मनाने वाले युवा सेना के लिए काम करते हैं। एनसीपी भी इस मामले में पीछे नहीं है। उसकी भी जगह-जगह शाखाएं हैं और इन शाखाओं में लगे टीवी पर क्रिकेट के मैचेस दिखाए जाते हैं। इन मैचों को देखने के लिए स्थानीय नव युवक नियमित रूप से इकट्ठा होते हैं। इन्हीं के छोटे-छोटे क्रिकेट संघ बनाकर एनसीपी हर साल टेनिस बॉल क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन करती है और कार्यकर्ताओं को स्पोर्ट्स की किट व टी-शर्ट्स देकर खुश रखती है। मनसे कार्यकर्ताओं को जुटाने के लिए मुख्यत: अपनी वाहतुक सेना पर निर्भर रहती है। यह वाहतुक सेना जगह-जगह रिक्शा स्टैंड चलाती है, जहां नाके पर बैठे नौजवान रिक्शा वालों से चंदा इकट्ठा करते हैं। मनसे ने कई व्यवसायों में अपनी यूनियनें बनाई हैं। जैसे अस्पताल, फिल्म प्रोडक्शन, स्टूडियो आदि में इनके कार्यकर्ता राजनीतिक कामकाज और प्रचार का जिम्मा संभालते हैं। कांग्रेस के पास सेवा दल, महिला प्रकोष्ठ, अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ जैसे कार्यकर्ता तो हैं, लेकिन युवक कांग्रेस का संगठन अब पहले की तरह नहीं रहा। बड़े पैमाने पर छात्रों के संगठन समाप्त हो चुके हैं। क्योंकि महाराष्ट्र में छात्रसंघ चुनाव लंबे समय तक बैन रहे हैं। इसीलिए एनएसयूआई, भारतीय विद्यार्थी परिषद, नौजवान भारत सभा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विद्यार्थी सेना, जनता युवा मोर्चा, भाजयुमो आदि जैसे संगठनों के पास कार्यकर्ता नहीं हैं। एक जमाने में इनके कार्यकर्ताओं की फौज चुनावी मैदान में उतरकर चुनावी मोर्चा संभालती थी।
वाहन कंपनियों की चांदी
राजनीतिक पार्टियों को प्रचार के लिए लगने वाले जीप, रिक्शा, कार, टेंपो आदि जैसे वाहन मिलना अब मुश्किल हो गया है। इसकी एक वजह यह भी है कि इन प्रचार वाहनों को लेने के लिए शुरुआत में 20-25 हजार रुपए एडवांस के तौर पर पकड़ाये जाते हैं और महीना भर रखड़ाने के बाद इन्हें बाकी लाख-डेढ़ लाख वसूलते समय छठी का दूध याद आ जाता है। इसीलिए अधिकतर कंपनियां राजनीतिक इस्तेमाल के लिए किसी भी पार्टी को वाहन देने के लिए तैयार नहीं हैं। एक वाहन ट्रांसपोर्टर ने हमें बताया कि वाहन खड़ा भी रहे तो चलेगा, लेकिन मैं उसे किसी भी राजनीतिक पार्टी को नहीं दूंगा। कुछ चालाक व्यवसायी मौके की नजाकत को भांपकर अपना धंधा डुबाना नहीं चाहते हैं। उन्होंने इसके लिए एक नई तरकीब ढूंढ़ निकाली है। वे अपने वाहनों की बुकिंग डेली बेसिस पर ले रहे हैं, जिसमें वाहन का प्रतिदिन का भाड़ा 3 हजार रुपया वसूला जा रहा है। ड्राइवर का पगार, टोल का पैसा, गाड़ी में पेट्रोल-गैस आदि खर्चों की जिम्मेदारी वाहन किराए पर लेने वाले के ऊपर थोपी जा रही है। इसमें वाहन कितना चले, इसकी कोई तय सीमा नहीं, जिस दिन एडवांस पैसा नहीं मिलेगा, उस दिन वाहन दूसरे किसी को दे दिया जाएगा। वैसे भी गर्मी के सीजन में शादी, पर्यटन आदि का व्यवसाय जमकर चलता है और इसी वजह से वाहन खाली कम ही मिलते हैं। वैसे भी वाहन वाले बार-बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने के कारण सत्ताधारी पार्टियों से ना खुश हैं।

दक्षिण-मुध्य मुंबई से बोलेगा आनंद का पोपट
दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी
अपनी आवाज़ से पूरे महाराष्ट्र को दीवाना बनाने वाले प्रख्यात गायक आनंद शिंदे दक्षिण-मध्य मुंबई लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतरने जा रहे हैं।
माझा नवीन पोपट हा लागला मिठु-मिठु बोलायला (मेरा नया तोता बोले मीठी-मीठी बात) 80 के दशक में आनंद शिंदे के इस सोलो एल्बम ने पूरे महाराष्ट्र में लोकप्रियता के झंडे गाड़ दिए थे। आनंद शिंदे ने कई फिल्मों में प्राइवेट एल्बमों के जरिए लोकप्रियता हासिल की है। दादर, नाय गांव, माटुंगा, लेबर कैंप, धारावी, चेम्बूर, वडाला, अणुशक्तिनगर में स्थित व्यापक दलित वोटरों की संख्या पर नज़र रखकर आनंद शिंदे चुनावी मैदान में उतर रहे हैं। आनंद का कहना है कि वर्तमान सांसद एकनाथ गायकवाड से क्षेत्र के नागरिक निराश हो चुके हैं। उन्होंने न तो क्षेत्र का भला किया और न ही दलतों का। रिपब्लिकन नेता रामदास आठवले ने शिवसेना के साथ जाकर लाखों दलित आंदोलनकारियों को ठगा है। इसीलिए दलित वोटों का असली हकदार मैं हूं। उन्होंने कहा कि मैं स्वाभिमानी रिपब्लिकन की ओर से चुनाव मैदान में उतरूंगा।
विरोधियों में मची खलबली
गायक आनंद शिंदे के चुनाव मैदान में उतरने के कारण दलित वोटों पर नज़र रखकर चुनाव मैदान में कूदे एकनाथ गायकवाड, शिवसेना के राहुल शिवाले, बसपा के गणेश अय्यर और निर्दलीय नगर सेवक मनोज संसारे की परेशानियां बढ़ गई हैं, क्योंकि उनके वोट बैंक में आनंद शिंदे सेंध लगाने जा रहे हैं।

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