नई दिल्ली बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में त्रिपुरा के ‘अद्वितीयÓ योगदान को एक नई किताब का विषय बनाया गया है। ‘कॅन्ट्रीब्यूशन ऑफ त्रिपुरा इन द लिबरेशन वार ऑफ बांग्लादेशÓ नाम की इस किताब को बांग्लादेशी लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता सलाम आजाद ने लिखा है। सलाम आजाद ने अपनी किताब में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पूर्वोत्तर के इस राज्य की भूमिका से लेकर युद्ध संग्राम के नायकों और लाखों शरणार्थियों को भोजन और शरण दिए जाने की पहल को याद किया है। एक गरीब किसान की आपबीती सुनने के बाद उन्होंने त्रिपुरा के योगदान को लेकर किताब लिखने का निर्णय किया था। किसान ने बताया था कि किस तरह से तमाम मुश्किलों के बावजूद उसने बांग्लादेशी शरणार्थियों को भोजन और शरण दी थी। ‘कंट्रीब्यूशन ऑफ त्रिपुरा इन द लिबरेशन वार ऑफ बांग्लादेशÓ आजाद की पूर्व दो किताबों ‘कंट्रीब्यूशन ऑफ इंडिया इन द वार ऑफ लिबरेशन ऑफ बांग्लादेशÓ और ‘रोल ऑफ इंडियन पीपल इन लिबरेशन वार ऑफ बांग्लादेशÓ की अगली कड़ी है। इन सभी किताबों में उन्होंने युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों के बलिदान के बारे में बताया है।
आजाद कहते हैं कि भारत सरकार पर इस युद्ध का खर्च कुल 7 हजार करोड़ रुपए आया। उन्होंने यह भी दावा किया कि इसमें लगभग 3,630 भारतीय सैनिकों की जान गई जबकि 9,856 घायल हुए। बुकवेल द्वारा प्रकाशित इस किताब के लिए मौलाना अबुल कलाम आजाद इंस्टीट्यूट ऑफ एशियन स्टडीज की ओर से उन्हें छात्रवृत्ति मिली। वे कहते हैं कि इस छात्रवृत्ति से मुझे जमीनी कार्य, कागजी कार्य और पांडुलिपि पूरा करने में मदद मिली।
आजाद ने बताया कि बांग्लादेश की आजादी में त्रिपुरा की अहम भूमिका है। यह लोगों के लिए अद्वितीय है, खासतौर पर लेखकों के लिए, जो कि बांग्लादेश निर्माण में त्रिपुरा के लोगों की भूमिका के बारे में लिखते हैं या उसका दस्तावेजीकरण करते हैं। उन्होंने कहा कि त्रिपुरा के लोगों ने बांग्लादेश के शरणार्थियों को बसाने के लिए अपने बिस्तर तक छोड़ दिए थे और शैक्षणिक संस्थानों में भी उन्हें आसरा दिया गया था। आजाद एक विधवा के बारे में अदभुत घटना बताते हैं। यह महिला शुद्ध शाकाहारी थी जो प्याज और लहसुन तक नहीं खाती थी। लेकिन यह महिला मुस्लिम शरणार्थियों के लिए मांस और मछली पकाती थी। उन्होंने कहाकि वह हमेशा खुद खाना पकाती थी। वह अपने धर्म के दूसरे संप्रदायों का बना भोजन छूती तक नहीं थी। लेकिन उसने मुस्लिम शरणार्थियों को शरण दी और उन्हें अपनी रसोई भी इस्तेमाल करने दी। वह शरणार्थियों के लिए मछली और मांस पकाती थी। वे कहते हैं कि 1971 में त्रिपुरा की जनसंख्या 15.56 लाख थी लेकिन अक्तूबर में बांग्लादेशी शरणार्थियों की संख्या ही 13.42 लाख हो गई। आगामी महीनों में यह संख्या बढक़र त्रिपुरा की अपनी जनसंख्या जितनी ही हो गई।

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