arun tiwariपांच साल में कोई चुपके से आकर हमारा मत चुरा ले जाता है; कभी जाति-धर्म-वर्ग-वर्ण, तो कभी किसी लोभ, भय या बेईमानी की खिङकी खोलकर और हम जान भी नहीं पाते। ये खिङकियां कब सीलबंद करेगा मतदाता ? इस राष्ट्रीय मतदाता दिवस द्वारा मतदाता से जवाब म ंागता मूल प्रश्न यही है। हां! इस राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर हम यह सोचकर जरूर खुश हो सकते हैं कि स्वाधीन भारत के राजनीतिक इतिहास में यह पहला मौका है कि जब मतदान के अलावा किसी अन्य काम के लिए भी मतदाता की पूछ हो रही है। आगामी लोकसभा चुनाव स्वाधीन भारत का ऐसा पहला चुनाव होने जा रहा है कि जब मतदाता पार्टियों का भविष्य ही नहीं, भविष्य के काम का घोषणापत्र भी तय करेगा। ÓआपÓ के अलावा देश की प्रमुख आला राजनीतिक पार्टियों ने अपने घोषणापत्रों की निर्माण प्रक्रिया को मतदाताओं के लिए खोल दिया है। कांग्रेस ने जनस ुनवाई कर घोषणापत्र तैयार करने की घोषणा कर दी है। हार्वर्ड यूनिवर्सि टी के पढे कुछ नौजवान अमेठी लोकसभा क्षेत्र में लोकमत संग्रह कर रहे हैं। राहुल गांधी खुद जाकर भोपाल की महिलाओं से प ूछ रहे हैं कि उन्हे कैसा भारत चाहिए। भारतीय जनता पार्टी ने आम सुझावों के लिए अपनी खास वेबसाइट गत ् विधाानसभा चुनावों से पहले से खोल रखी ह ै। अब उसक े नेता कह रहे है ं कि भाजपा कई प्रमुख शहरों का घोषणापत्र शहर के डी एन ए और जनाका ंक्षा के आधार पर बनायेगी। राहुल गांधी ने इससे आगे बढकर 15 सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों का चयन रायशुमारी क े जरिए कराने की घोषणा कर चुके हैं। आम आदमी पार्टी ये दोनों काम पहले ही शुरु कर चुकी है। कि ंतु यदि यह रायशुमारी पहले की तरह एजेंसिया ेंं द्वारा कराये गये सैंपल सर्वे जैसी दिखावटी होकर रह गई या फिर बिन्नी जैसों को उ ंगली उठाने का मौका देने वाली हुई, तो निराशा तो होगी ही; वरना् घोषणापत्र निर्माण से लेकर उम्मीदवारों के चयन तक की प्रक्रिया के दरवाजो ं का मतदाताओं के लिए थोङा खुल जाना लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण तो है ही। शुभ लक्षण यह भी है कि मतदाता अब खुद अपने मतदान की सुरक्षा जांचना चाहता है। उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखण्ड विधानसभा क े बीते चुनावों के दौरान हुए असली मतदान तथा चुनाव आयोग की वेबसाइट पर दर्ज मतदान संख्या में अंतर को लेकर गाजियाबाद के मतदाता ने उंगली उठाई। नये मतदाताओं की संख्या को लेकर आयोग द्वारा किए जा रहे दावे पर भी प्रश्न चिन्ह खङा किया।
इलेक्ट्रॉनिक मशीनों में हेराफरी की आंशका समय-समय पर जाहिर की ही जाती रही है। उम्मीदवारों द्वारा जमा किए गये शपथपत्रों के सत्यापन की मांग को लेकर हाल ही में दिल्ली के एक ट्रस्ट ने याचिका दायर की है। अब ऐसे में मतदाताओं द्वारा इंगित की जा रही खामियों में सुधार की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग जैसी बङी संवैधानिक संस्था नहीं लेगी, तो का ैन लेगा ? यह सच है कि बीते एक दशक में चुनाव को कम खर्चीला बनाने में निर्वाचन आयोग ने निश्चित ही शानदार भूमिका निभाई है; कि ंतु लोभमुक्त और भयमुक्त मतदान कराने में अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अत: निर्वाचन आयोग के चुनाव आयुक्तों को चाहिए कि वे सेवानिवृति के पश्चात् अपने लिए किसी पार्टी के जरिए पद सुनिश्चित करने की बजाय, निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित कराने क े लिए संकल्पित हों। सूचना के अधिकार का सम्मान कर उम्मीदवार व मतदान से जुङी ज्यादा से ज्यादा स ूचनाओं में शुचिता लाये। मैं समझता ह ूं कि कम से कम जीते हुए उम्मीदवारों के शपथपत्रों को जांचकर सत्यापित करने का कदम उठाकर निर्वाचन आयोग शुचिता की शुरुआत कर सकता है। जानकारी गलत अथवा आधी-अधूरी पाई जाने पर पद गंवाने तथा दण्ड के प्रावधानों को और सख्त करने से यह शुचिता सुनिश्चित करने में और मदद मिलेगी ही।
मतदाता मित्रों! शुचिता सुनिश्चित करने की इस बहस में क्या हमें खुद अपने आप से यह प्रश्न पूछना माकूल नहीं होगा कि यदि भारतीय राजनीति गंदी है, तो इसके दोषी क्या सिर्फ राजनेता है ं ? क्या इन्हे चुनने वाले हम मतदाताओं का कोई दोष नहीं ? हम म ें से कितने मतदाता हैं, जो पांच साल के दौरान जाकर अपने चुने हुए जनप्रतिनिधि से उसे मिले बजट का हिसाब प ूछते हैं ? कितने हैं, जो सार्वजनिक हित के वादों को प ूरा करने को लेकर जनप्रतिनिधि को समय-समय पर टोकते हैं ? सार्वजनिक हित के काम में उसे सहयोग के लिए खुद आगे आते हैं ? हम भूल जात े हैं कि जहा ं सवालपूछी होती है, जवाबदेही भी वहीं आती है। यह सवालपूछी की प्रक्रिया और तेज होनी चाहिए। इसलिए हम यह ता े याद रखें कि मतदान हमारा अधिकार है, कि ंतु कर्तव्य को न भूल जायें। जाति, धर्म, वर्ग, पार्टी, लोभ अथवा व्यक्तिगत संबंधों की बजाय उम्मीदवार की नीयत, काबिलियत, चिंता, चिंतन, चरित्र तथा उसक े द्वारा पेश पांच साल की कार्ययोजना के आधार पर मतदान करना हमारा कर्तव्य है। लेकिन सिर्फ मतदान कर देना मात्र ही लोकतंत्र के निर्माण में हमारी एकमेव भूमिका नहीं है। मेरा मानना है कि एक मतदाता के रूप में लोकतंत्र के निर्माण म ें सहभागिता के लिए जागने की अवधि सिर्फ वोट का एक दिन नहीं, पूरी पांच साल है; एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक। कि ंतु यह तभी हो सकता है, जबकि मतदाता मतदान के बाद सो न जाये; जनप्रतिनिधि को लगातार पांच साल जगाता रहे। जनप्रतिनिधि से लगातार स ंवाद कर जनमत के अनुरूप दायित्व-निर्वाह को विवश करे। राष्ट्र स्तर पर नीतिगत निर्णयो ं के लिए संासद को और राज्य स्तर पर हितकारी विधान निर्माण के लिए विधायक को प्रेरित भी करे और शक्ति भी दे। निगम पार्षद को विवश करे कि वह इलाक े का विकास नागरिकों की योजना व जरूरत के मुताबिक करे।
ग्रामपंचायत के निर्णयों में ग्रामसभा का साझा सपना झलकना ही अच्छा ह ै कि हमने जागना शुरु कर दिया है। थोङा और जागे ं! राजनेता चुनना बंद करे ं। लोकनेता चुनना शुरु करे ं। हर चुनाव स े पहले सामुदायिक रूप से एकत्र होकर पिछले पांच सालों की योजना और व्यवहार का सच्चा आकलन करें। लोकघोषणा पत्र के रूप में अपने क्षेत्र के विकास को लेकर योजनाओ ं और अपेक्षाओं का खाका हम मतदाता खुद तैयार करे ं। सभी उम्मीदवार व पार्टियों को बुलाकर उनके समक्ष लोकघोषणा पत्र पेश करे ं। उनसे संकल्प लें और जीतकर आये जनप्रतिनिधि को उसक े संकल्प पर खरे उतरने का े न सिर्फ विवश करें, बल्कि सहयोग भी करे ं। सरकारी योजनाओं का सफल कि ्रयान्वयन सुनिश्चित करे ं और करायें। उनके उपयोग-दुरुपयोग व प्रभावों की खुद कङी निगरानी रखें। सरकारी योजनाओं के जरिए हमारे ऊपर खर्च होने वाली हर पाई का हिसाब मांगे। Óपब्लिक ऑडिटÓ यानी लोक अंकेक्षण करे ं। यदि ग्रामवासी हर निर्णय की चाबी ग्रामप्रधान को सौंपकर सो जायें, तो वह हर पांच साल म ें एक गाङी बनायेगा ही। तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफिर जाहिर ह ै कि ऐसा करना पांच साल बाद जनप्रतिनिधियो ं के आकलन में भी हमारी मदद करेगा। कि ंतु यह तभी संभव है, जब हमारे लिए बनी योजनाओं की जानकारी हमें खुद हो। उनम ें जनप्रतिनिधित्व, अधिकारी और खुद की भूमिका को हम जाने। हम मतदाताओं की सकरात्मकता, सजगता, समझदारी और संगठन से ये सब संभव है। देशव्यापी स्तर पर निष्पक्ष मतदाता परिषदों का गठन कर यह किया जा सकता है। यह रास्ता, भारतीय लोकशाही पर हावी राजशाही मानसिकता को बाहर का रास्ता दिखा सकता है। लोक उम्मीदवारी का मार्ग भी इसी स े प्रशस्त होगा। आइये! प्रशस्त करें।

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