सोनी किशोरसिंह के फेसबुक पर वूमन ट्रस्ट पेज से सुधा अरोड़ा:
sudha arora‘‘ हिंसा का एक बेहद सूक्ष्म प्रकार है जिसे मानसिक प्रताड़ना कहा जा सकता है । एक पुरुष पति कुछेक बरस साथ रहने के बाद यह सूंघ लेता है कि वह किस ‘ जाति ’ या ‘ किस्म ’ की औरत के साथ है । वह जानता है कि अपनी पत्नी को सजा देने का सबसे बेहतरीन तरीका या नुस्खा क्या है । उसे कितने नुकीले या कितने भोथरे औजार किस तरह से इस्तेमाल करने है । वह जानता है कि अपनी पत्नी पर शारीरिक बल का इस्तेमाल कर या उसे चांटा मारकर वह उतनी तकलीफ नहीं पहुंचा सकता , जितनी उसकी उपेक्षा या अवहेलना कर। वह अपनी संभ्रान्तता का मुखौटा ‘ इन्टैक्ट ’ रखकर एक साधुनुमा तटस्थता अपना लेता है । वह अपने ही घर में इस तरह रहता है , जैसे उस घर में बच्चे हैं , बुजुर्ग हैं , नौकर – चाकर है , आने – जानेवाले मेहमान हैं , नहीं है तो सिर्फ उसकी पत्नी । पत्नी की ‘ उपस्थिति ’ या उसके ‘ अस्तित्व ’ को पूरी तरह योजनाबद्ध तरीके से नकारता हुआ वह अपनी पत्नी को अवहेलना के धीमे जहर से खत्म करना चाहता है । ‘संवादहीनता’ की स्थिति से पैदा हुई इस – ‘ स्लो डेथ ’ को जब तक पत्नी पहचानने की कोशिश करती है , वह भीतर से पूरी तरह टूट चुकी होती है । बहरहाल , बाहर से देखने पर यह एक हद तक आकारहीन स्थिति लग सकती है और इसे वही औरतें बखूबी समझ सकती हैं जिन्होंने इस ‘ धीमी मौत ’ को अपने भीतर घटते हुए देखा है , पहचाना है । ’’
महिला संगठनों में कार्यालय में होने वाली यौन हिंसा (सेक्सुअल वायलेंस) की बात होती है । घरेलू हिंसा में शारीरिक, लैंगिक, आर्थिक, शाब्दिक हिंसा तथा वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप ) आदि सभी का जायजा लिया जाता है । इन सलाहकार केंद्रों में मानसिक हिंसा को रेखांकित नही किया जाता क्योंकि बाकी सब यातना के बहुत स्थूल प्रकार हैं और उन्हें पहचानना आसान है । पन्द्रह सालों की काउन्सिलिंग के दौरान हमारे संगठन में मानसिक प्रताड़ना का एक भी मामला दर्ज़ नहीं हुआ । जबकि एक औरत के लिए ज्यादा तकलीफदेह , लाइलाज और असमंजस वाली स्थिति मानसिक प्रताड़ना है , जिसका जिक्र तक नहीं किया जाता । शरीर पर लाल-नीले निशान या होंठों पर या आंखों के नीचे कटा हुआ घाव तो किसी मलहम या दवा से आखिर ठीक हो ही जाता है , पर शाब्दिक तिरस्कार , उलाहने , व्यंग्यबाण चलाकर या संवादहीनता और निरंतर उपेक्षा से की गई चोट जैसा घाव मन पर बनाती है , वह शरीर पर हुए घाव से ज़्यादा गहरा होता है । इस अदृश्य चोट को भरने में कहीं ज़्यादा वक्त लग जाता है ।
अपने साथी की निर्मम चुप्पी और सायास संवादहीनता भी हिंसा का ही एक प्रकार है और चूंकि शरीर पर इसके निशान दिखाई भी नहीं देते इसलिए यह भीतर ही भीतर देह को अमूर्त बीमारियों से लैस कर देती है। पति की मारक चुप्पी या चीख चिल्लाहट हमें शिकायत करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं लगते । ऐसी अमूर्त तकलीफें हमारे सरोकार का मुद्दा इसलिए नहीं बनतीं क्यों कि मानसिक यातना की शिकार औरत जब खुद ही मरते दम तक इसकी शिनाख्त नहीं कर पाती तो उसके बिना कहे कोई दूसरा व्यक्ति उसके मन के भीतर चलते उहापोह को कैसे पहचान सकता है ।
जहां शारीरिक हिंसा निम्न और निम्न मध्यवर्ग की औरतों की समस्या है , मानसिक यातना उच्च मध्यवर्ग और सुसंस्कृत अभिजात्य शालीन दिखने वाले प्रगतिशील वर्ग का हथियार है । निम्न और निम्न मध्यवर्ग का पुरुष इतना शातिर और समझदार नहीं होता । वह गुस्सा आते ही आगा पीछा नहीं देखता और झट से हाथ उठा कर हिंसक हो जाता है । इस हिंसा के निशान शरीर पर दिखते हैं , इसलिए इसे लेकर निर्णय लेना आसान हो जाता है ।

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