nehruमोहित सिंह की एक रिपोर्ट
आजाद भारत के बंटवारे के उपरान्त नेहरू ने मुसलमानों को मीठा शर्बत पिलाकर जो डोरे डाले थे वो राजीव गांधी काल तक चले। लेकिन अटल के विदेश मंत्री बनने के बाद जो आजादी मुसलमानों को मिली वो शायद किसी कांग्रेसी हुकूमत में नहीं मिली। कांग्रेस ने हमेशा मुसलमानों को उठने नहीं दिया कौम के कुछ गिने चुने लोगों को साथ लेकर कौम को ये जताने की कोशिश की कि सिर्फ कांग्रेस ही है जो मुसलमानों की सच्ची हमदर्द है। चुनावों में दिखावा करने के परिपाटी तो नेहरू युग से चली आ रही है। जिसे आज भी कांग्रेस संजोए रखे है। लेकिन अब भारत का मुसलमान कांग्रेस के ड्रामे के अंदर की स्क्रिप्ट पढ़ चुका है। अब कांग्रेस के हाथ खाली है उसके पंजे में वो अब जोर नहीं रहा जिससे दबे कुचले मुस्लिम वर्ग को जकड़ा जा सके । हाल ही में मौलाना बुखारी के बेटे दिल्ली जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी ने जो समर्थन देने का ऐलान किया है वो भी सिर्फ और सिर्फ अपने विकास के लिये दिया गया है। क्योंकि ये मौलाना भी वैसे ही हैं जैसे पश्चिम के जाट बाहुल्य इलाके के राष्टï्रीय स्तर के नेताजी जैसे हैं। जिन्हें अपनी कौम के लिये नहीं अपनी इजीनियङ्क्षरग के विकास के लिये हमेशा पलटते देखा गया है। इन्हें भी सिर्फ अपना रूतबा कायम रखना ही आता है। और कोई नहीं बल्कि सौदेबाजी कर दिल्ली में बैठना इनको भाता रहा है। उन्हीं के नक्शे कदम या यूं कह लीजिए कि इमाम बुखारी भी भारत की राजनीति में सौदागर का रोल अदा करते रहते हैं। आज बरसों बरस से मुसलमानों के लिये इन्होंने क्या किया इसका लेखा जोखा भी इनके दिल ओ दिमाग में होगा। गौरतलब हो कि मुसलमानों के असली धर्म गुरूओं कि ओर से यानि देवबंद या नदवा से कभी कोई ऐसा ऐलान नहीं हुआ कि फला पार्टी के हम साथ हैं। इसका भी एक मूल कारण है देवबंद और नदवा या अन्य राज्यों में जो भी इस्लामिक कॉलेज या विश्वविद्यालय हैं। वहां सिर्फ अल्लाह की इबादत और इंसानी तालीम दी जाती रही है यहां राजनीति की पढ़ाई नहीं करायी जाती इसीलिए सिवाय इस्लामिक मामलों पर ही यहां अपनी राय देने का महत्व है। ऐसा कहा जाता है कि स्व. विश्वनाथ प्रताप सिंह भी चुनाव के दौरान स्वर्गीय मौलाना अली मियां से नदवा कॉलेज लखनऊ में समर्थन लेने गये थे। वहां उनका अतिथि सत्कार किया गया लेकिन समर्थन के नाम पर हजरत अली मियां से कोई भी जवाब न मिलने पर उन्हें वापस बैरंग लौटना पड़ा था। गौरतलब हो कि उस वक्त भी दिल्ली के जामा मस्जिद के तत्कालीन शाही इमाम स्व. अब्दुल्ला बुखारी ने भी राजनीतिज्ञों से खूब लाभ उठाया था । ये वादा करके कि मुसलमानों का वोट उन्हें ही मिलेगा आज ठीक वैसा ही उनके बेटे इमाम अहमद बुखारी सिर्फ अपनी तरक्की और अपना रूतबा पुरानी दिल्ली में कायम रख सकें इसलिए उन्होंने कांगे्रस को पूर्ण समर्थन देने का ऐलान कर दिया। जानकारी के अनुसार मौलाना बुखारी ऐसे शख्स हैं जिन्हें दीनी तालीम और मुसलमानों के विकास से कभी कोई लेना देना नहीं रहा । इन पर तमाम धाराओं में मुकदमे भी चल रहे हैं। देश में अन्य राज्यों में भी कुछ ऐसी ही शख्सियतें हैं जो मुसलमानों के नाम पर सिर्फ अपना हित साधती रही हैं। अब सवाल उठता है कि मुसलमान आखिर कहां है उसे अपना मुकाम कहां और किस जगह मिलेगा। बाबरी मस्जिद विवाद के बाद कांगे्रस से उसके मोह भंग होने के बाद मुलायम उनके चहेते नेता बने इसका भरपूर फायदा मुलायम सिंह यादव ने उठाया भी वहीं मायावती ने भी इनके विकास की मीठी मीठी बाते कर के इस कौम का जमकर दोहन किया लेकिन दगों की आग से जले मुसलमानों का विश्वास इन दोनों से भी टूट कर बिखरता चला गया। हालात उस वक्त और खराब होते चले गये जब मुजफ्फरनगर दगें की आग में मौत समेटे लोग चिल्लाते और कराहते रहे लेकिन इनमें से कोई भी दल का नेता उनके जख्मों पर मरहम लगाने नहीं आया इस खौफनाक मंजर ने मुसलमानों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि वे अब किसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलेंगे। बताते चलें कि दंगे के दौरान इमाम बुखारी ने केन्द्र सरकार को कभी कुछ नहीं कहा। आखिर क्यों? क्या केन्द्र सरकार दंगे को ठंडा नहीं कर सकती थी दंगा कोई दैवीय आपदा नहीं थी कि इसे रोकने का दायित्व सिर्फ राज्य सरकार पर था। दंगा देश के लिए एक जहरीला दंश था इसमें भारत माता की ही संतानों का कत्ल किया गया। इस पर केन्द्र सरकार यानि कांग्रेस ने एक्शन क्यों नहीं लिया था। अब ये भी सवाल उठता है कि मुसलमानों का इस देश में कोई भी खैरख्वाह दल अथवा नेता नहीं है क्या मुसलमानों को रोटियों के टुकड़ों की तरह इमाम बुखारी जैसे लोग अपने रूतबे के लिए बांटतें रहेंगे। मुसलमान कौम का सही मायनों में कौन उद्वार करेगा ये एक यक्ष प्रश्न है।

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