Conversations with Namu Kini IVजब मैं सोडा गांव की सरपंच बनी थीं तब अपने गांव को लेकर कई सपने थे सोचा था कि गांव तरक्की की राह पर आगे बढ़ेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। हमें बताया जाता है कि हमारी जरूरतें क्या हैं हम अपनी जरूरतें उन्हें नहीं बता सकते। हमारे सोडा गांव में पानी की बहुत समस्या है। जब हम पानी मांगते हैं तो कहा जाता है कि आंगनबाड़ी केन्द्र खोल लें। हमें अपने पैसों के लिए ही चक्कर लगाने पड़ते हैं। मनरेगा का पूरा पैसा तो तीन साल से नहीं मिला है। खानापूरी के नाम पर कुल फंड का दस प्रतिशत ही मिल सका है। यह कहना है राजस्थान में जयपुर जिले के सोडा गांव की सरपंच छवि राजावत का।
यह वही छवि राजावत हैं जिन्होंने 24 व 25 मार्च 2011 को संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर एक सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया था और भारतीय सरपंचों की छवि ही बदल दी थी। एमबीए स्नातक छवि ने टाइम्स ऑफ इंडिया, कार्लसन ग्रुप ऑफ होटल्स और एयरटेल जैसी कम्पनियों में हाई प्रोफाइल जॉब छोड़ कर सरपंच की जिम्मेदारी सम्भाली थी। उन्होंने
तीन साल में अपने गांव को आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखा था। अपने गांव को संवारने का ब्लू प्रिंट है छवि के पास। निजी प्रयासों से वह जुटी हुई हैं। सरकारी मदद की उम्मीद छोड़ चुकी छवि राजावत बताती हैं कि ग्राम पंचायतों की योजना में हमसे सलाह ली नहीं जाती बल्कि दी जाती है। हम क्या करें यह हमें बताया जाता है। सच पूछिए तो ग्राम पंचायतें बिल्कुल भी स्वतंत्र नहीं हैं। पंचायत सचिव तक सरपंच को दबाव में लेते हैं। एक छोटा सा उदाहरण आपको बताऊं कि हमारी ग्राम पंचायत में राजीव गांधी कम्युनिटी सेंटर बनना था। इसे बनवाने में भी बड़ी मेहनत करनी पड़ी। दिल्ली तक भी किसी
ने दिलचस्पी नहीं दिखाई। किसी तरह यह कम्युनिटी सेंटर शुरू हुआ तो स्थानीय पुलिस ने अडंग़ेबाजी शुरू कर दी। मैं तो साफ कहती हूं कि काम होना चाहिए श्रेय कोई भी ले। छवि कहती हैं कि ग्राम पंचायतों के लिए योजनाएं बहुत बनती हैं पर हम तक पहुंचती ही नहीं। सरकार कहती है कि हमने ग्राम पंचायतों के लिए बहुत कुछ किया अफसर कहते हैं कि पंचायतें उनकी प्राथमिकता में सबसे ऊपर हैं तो फिर मामला कहां अटकता है। यहां सरपंच को मात्र तीन हजार पांच सौ रुपए मिलते हैं वहीं पंचायत सचिव को 35 हजार रुपए। मैं अपना पूरा वेतन ग्राम पंचायत को दे देती हूं। ग्राम पंचायतों का संगठन है। पंचायतों की महापंचायत होती है पर उसमें मुझे नहीं बुलाया जाता। उन लोगों के अपने राजनीतिक हित हैं फिलहाल मेरा किसी पार्टी से कोई लेना देना नहीं है।मैं पढ़ी लिखी हूं और जागरूक हूं फिर भी छोटे छोटे काम के लिए मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ती है। मैंने सरपंच व ग्राम प्रधानों को केन्द्र में रखकर छवि राजावत रूरल डेवलपमेंट संस्था बनाई है। इस संस्था के माध्यम से मैं ग्राम पंचायतों के अधिकारों के प्रति उन्हें जागरूक करने का प्रयास कर रही हूं। मैं अपने गांव की तरक्की के लिए बैंक खुलवा रही हूं। हमारे गांव में स्टेट बैंक की शाखा खुल गई है। इंटरनेट भी है। छवि बताती हैं कि बड़े कॉरपोरेट घरानों और कम्पनियों के पास समाजसेवा के लिए बजट होता है। वे गांव की परियोजनाओं को गोद भी ले सकती हैं पर उनकी अपनी बंदिशें हैं। गांव के आसपास कम्पनियों के प्लांट नहीं हैं इसलिए मदद में थोड़ी दिक्कत आ रही है। सिंचाई की बहुत परेशानी है। पीने के पानी की दिक्कत है। मैं निजी स्तर पर कम्पनियों से बात कर रही हूं। उम्मीद है कि जल्द ही उत्साहजनक परिणाम सामने आएंगे।
साभार: ग्राम्य संदेश

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