Village-वीर विनोद छाबड़ा
जब भी तीज-त्यौहार के दिन आते हैं तो बड़े शहरों से बाहर जाने वाली की हर बस, ट्रेन, यहां तक कि वायु और जल मार्ग पर उपलब्ध यातायात के तमाम साधनों में भी जगह पाने के लिये भारी भीड़ उमड़ती है। कभी-कभी तो जगह के लिये मारा-मारी तक की नौबत आती है। बाखुशी ज्यादा किराया देने की व्यग्रता भी है। ये भीड़ अपने-अपने गावों में, कस्बों में, छोटे शहरों की ओर लौटने वालों की होती है जिन्हें त्यौहारों पर अपने रीति-रिवाज, धर्म-कर्म के बहाने अपनी जड़ों की याद आती है, अपने पुरखों की याद आती है, जिनसे उनका जन्म हुआ है और जिनका खून उनकी रगों में गर्दिश कर रहा है। उन घरों की याद आती है जहां वे पैदा हुए थे, उस ज़मीन की गंध की याद पुलकित करती है, जिस ज़मीन पर उनके घर बने हुए है। उस जमीन की माटी पर पैर रखते ही, उसे छूते ही उन्हें अपने पुरखों की गंध महसूस होती है उनकी रूहों के वहीं कहीं ‘होने‘ का अहसास होता है। उनकी आखें में साफ़-साफ़ पढ़ा जा सकता है कि इसे पाने की चाहत उनमें इतनी तीव्र होती है कि जानते-बूझते हुए भी वो परवाह नहीं करते कि वहां खंबों पर लटकती तार होगी मगर उसमें बिजली नहीं दौड़ रही होगी। पाईप लाईन में पानी नहीं होगा। गंदगी से बजबजाती नालियां होंगी। टूटी-फूटी सड़कें होंगी जिसमें कई जगह गहरे गहरे गड्डे होंगे। गलियां में भी इंटें भी उखड़ी मिलेंगी। कुल मिला कर तमाम ज़रूरी नागरिक सुविधाओं का सर्वथा अभाव होगा। इन सबके बावजूद उन्हें अपने मुलूक, अपने घर से बेसाख्ता प्यार है, जैसा भी टूटा-फूटा है, है तो अपना ही। और इसके दर्शन करने के लिये उनकी बेताबी इतनी ज्यादा है कि इसके लिये वे कोई भी कीमत अदा करने के लिये आतुर दिखते हैं।

घरौंदों में लौटे परिंदे इसी बहाने बड़े शहरों की बेरहम भीड़ से़ पटी, दिखावटी व तनावपूर्ण भागम भाग भरी आडंबरी जिंदगी को भी कुछ दिन तक भुलाने की कोशिश करेंगे। साथ ही उन दिनों की भी याद करते हैं जब वो यहां की गलियों में गुल्ली-डंडा खेलते थे। कंचे और छुपन-छुपाई आदि दूसरे खेल भी उतने ही चाव व उत्साह के साथ खेले जाते थे। यहीं पिछली गली में स्कूल था, जिसमेें ज़बरदस्ती ठेल कर पढ़ने भेजा जाता था। यहीं वे जवान हुए थे। फिर कमाई के लिये बड़े शहरों की ओर कूच कर गये। कुछ जड़ बुद्धि लोग ज़रूर शहर के होकर रह गये है। वो अपनी जड़ों को भूल गये। ज़रूर उनकी जड़ में कोई कमजोरी रही होगी या फिर कोई गहरी मजबूरी। मगर ज्यादातर तो अपनी जड़ों को, अपनी जुबान, अपनी उस बोली को नहीं भूले जिससे वो पहचाने जाते है कि वो किस इलाके के है। इनमें दफतरों में काम करने वाले कामकाज़ी हैं। मिस्त्री, राजगीर व मजदूरी करने वाले खासतौर पर शामिल हैं। स्टूडेंट्स भी है, जो अच्छी और आला तालीम हासिल करने शहर आये हैं और तालीम पूरी करने के बाद उन्हें शहर में ही कहीं नौकरी भी तलाशनी है। दो दिन की छुट्टी पर आये हैं, मगर आठ-दस दिन से पहले किसी का भी जाने को मन नहीं करेगा। बचपन के सारे यार जो जमा होंगे। जमकर मौज मस्ती जो होनी है।
इस बीच शहर वीरान हो जायेंगे। तमाम किरायेदार ताला लगा कर चले गये है। जाने कब लौटेंगे? किसी के मकान की छत का ढोला बांध कर बिना स्लैब डाले मिस़्त्री-मजदूर घर चले गये हैं और कहीं दीवार अधूरी छोड़ दी। किसी की रंगाई-पुताई छूट गयी है। स्कूटर-कार की मरम्मत वक़्त पर नहीं हो पायेगी। खराब पंखे आप का मुंह देखेंगें । छोटी-बड़ी हर किस्म की दुकानों, वर्कशापों से हेल्पर-मैकेनिक गायब हैं। दर्जियों की दुकानों पर कारीगरों का अकाल पड़ जाता है, टेलर मास्टर कई ग्राहकों से तय वक़्त पर वादा पूरा नहीं कर पाने का अफ़सोस ज़ाहिर कर चुका है। सारे काम अटके-लटके हैं। जिंदगी अपंग सी लगती है। ऐसे ही मौकों पर अहसास होता है है कि कितना ज़रूरी हिस्सा हैं ये शहरी जिंदगी के चलने में, इस सिस्टम को चलाने में। आठ-दस दिन बाद जब ये परिंदे घरों को लौटेंगे तो शहर की जिंदगी तभी पटरियों पर वापस आयेगी। लेकिन कुछ अभागे कभी नहीं लौटते। घरों को जाते हुए या घरों से लौटते हुए भारी भीड़ और आपा-धापी में कुछ त्रासद वाहन दुर्घटनायें होती हैं। नतीजतन वे तस्वीर बन कर घर वापसी करते हैं।

ये सब देख कर बंदा बहुत खुश होता है कि परिंदों को मूल बसेरा याद हैं। हालांकि ये देर-सवेर फिर परदेस को उड़ान भरेंगे, मगर तय वक्त आने पर फिर चिर-परिचित डेरों पर लौटेंगे। मगर बंदा उदास भी होता है। उदास होने वालों में वो अकेला नहीं है। उस जैसे चंद और भी हैं, जिनका इस मुल्क में अपना कोई घर नहीं है, जहां जाकर उन्हें अपने पुरखों के होने का अहसास हो सके, रोम-रोम रोमांचित हो। दरअसल, बंदे के पुरखे सरहद पार के इलाके में, जो अब पाकिस्तान के नाम से जाना जाता है, पैदा हुए थे। वो 1947 की तक़सीम के हालात
के मारे परिवार का एक सदस्य है जो यहां भारत के इसी शहर में जन्मा है। उसने सिर्फ़ अपने बुजुर्गाें में मुंह से सुना है कि उनके शहर की जिंदगी में कितनी चहल-पहल थी। गलियों में मटरगश्ती करके और चैबारों पर बैठ कर कितनी मस्ती काटी जाती थी। उस स्कूल के कड़क हेडमास्टर और छड़ी वाले मास्टरों का ज़िक्र अक्सर किया करते थे जो उन्हें पढा़ते थे। वहां घने दरख्तों पेड़ की छांव तले उसके पिता अपने साथियों संग खेलते थे। पेड़ की वो डाल जिस पर झूला डाल कर उसकी मां और उसकी सखियां पींगे भरती थीं। ये सब सुन कर बंदे का मन बहुत करता है कि वो जाकर उन तमाम जगहों को छूए, उन दरों-दीवारों व धरती को चूमे, उन दरख्तों से जाकर लिपटे जहां उसके माता-पिता और तमाम दीगर पुरखे जन्मे थे और जिनके जिस्म की गंध वहां की माटी में आज भी मिली हुई है। मगर कुछ खराब सियासी हालात और कुछ

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