Copy of DSC_1743 (1)रिपोर्ट मोहित सिंह
अल्पसंख्यक भारतीय राजनीति का हमेशा से केन्द्र बिन्दु रहे है लेकिन यह भी सच है कि इन्हें केवल वोट बैंक के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाता रहा है और यह भी इस्तेमाल होते रहे। असल में यह भी अपना सामाजिक विकास करने से कतराते रहे और चन्द लाभो के लिये केवल वोट राजनीति का हिस्सा ही बन कर रह गये कभी इनका राजनीतिक दलों ने किया तो कमी ये अपने ही सम्प्रदाय के धर्म गुरूओं के शोषण का शिकार हुये। लेकिन 2014 का लोक सभा चुनाव अब जबकि समाप्ति की आगे बढ़ रहा है। इस चुनाव को कई मायनों में इसकी महन्ता अल्पसंख्यक समाज के लिये भी एक नये बदलाव की ओर संकेत कर रही है। अभी तक हुये विभिन्न चरणों के चुनावों के रूझान को यदि देखें तो ऐसा साफ नजर आ रहा है कि अल्पसंख्यक वर्ग भी अपनी वर्ग भी अपनी धारा बदलता नजर आ रहा है दूसरी सबसे बड़ी बात कि अल्पसंख्यक वोटो की इस बार केवल मुस्लिम समाज के आईने से ही देखना बेईमानी होगी।
क्यो 2014 का लोक सभा चुनाव अल्पसंख्यक वर्ग के दूसरे सम्प्रदायों पर भी फोकस करता नजर आ रहा है संकेत साफ है कि अल्पसंख्यक राजनीति के दायेर में केवल मुस्लिम वोटों की ही राजनीति करना कुछ दल विशेष के लोगों के लिये एक बड़े धाटे के रूप में उभर कर सामने आ सकता है। संकेत साफ है कि देश का ईसाई समाज भी अब भारतीय राजनीति में सीधे तौर पर अपनी भागीदारी चाह रहा है क्यो यह अल्पसंख्यक राजनीति का बदलता चेहरा है क्या ईसाई समाज का बड़ा हिस्सा कंाग्रेस का साथ छोड़ कर कही दूसरी जगह भी देख रहा है कही ऐसा तो नही कि वह भारतीय राजनीति की मुख्य धारा से जुडऩों की कोशिश कर रहा है।
अल्पसंख्यक समाज के तीन घन्टे है मुस्लिम, ईसाई और सिक्ख लेकिन भारतीय राजनीति में जब कभी अल्पसंख्यक राजनीति या वाटों की बात आती है तो चर्चा का केन्द्र बिन्दु मुस्लिम वोटों और उनके सामाजिक परिवेश और उसे विकसित करने तक ही सीमित रह जाता है। दरअसल मुस्लिम समान को राजनीतिक मुददा बताने का काम सबसे पहले इन्दिरा गॉधी ने किया और लम्बे समय तक मुस्लमानों को मूर्ख बनाकर कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक रोटिया सेकी। इन्द्रिरा गॉधी के ही समय से मुस्लिम धर्म गुरू कभी अपना विरोध दर्ज कराते रहे लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब मुस्लमानों ने लम्बे समय तक कांग्रेस से किनारा कर लिया।
सिक्ख अल्पसंख्यक दायरे में अवश्य आते है लेकिन उनका इस्तेमाल कभी उस तरह से नही हुआ लिए तरह से मुस्लिमों और इसाईयों का हो रहा है। सोनिया गॉधी ने जब से कांग्रेस में सत्ता सभाली तो हिन्दुत्व और हिन्दू वोटों के लिये उन्होनें राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ पर साम्प्रदायित्व फैलाने का आरोप लगाया लेकिन वो उस इसाई समाज पर बोलने से हमेशा कतराती रही है जो सोनिया गॉधी माग्रेट अल्वा जैसे लोगों के इशारे पर बड़े पैमाने पर छत्तीसगढ़ और झारखण्ड जैसे राज्यों में लोगों का धर्म परिवर्तन करा कर अपनी राजनीति चलाती रही लेकिन इस बार इसाई समाज ने सोनिया गॉधी और उन जैसे लोगों को सबक सिखाने की ठान ली है।
दरअसल इसाई समाज में भी दो गुट है। पहला रोम द्वारा संचालित कैथलिक चर्च है यह विभिन्न क्षेत्रों में काम करते रहते हे इनका प्रभाव केवल केरल तक सीमित है ये मुख्य रूप से कांग्रेस के समर्थक है और नरेन्द्र मोदी के प्रखर विरोधी है लेकिन इस बार यह समुदाय कांग्रेस से टूट कर बड़े स्तर पर विभाजित हो सकता है।
30 अप्रैल को लखनऊ में हुय मतदान में लोरूझान उमर कर सामने आया है उससे कयास लगाये जा रहे है सवा लाख की संख्या वाले ईसाई समाज ने बड़े पैमाने पर कांग्रेस किनारा कर के अपनी निष्ठा कही और जताई है। कानपुर में भी इनकी सख्या लगभग इतनी ही है, इलाहाबाद में 60000 और वाराणसी में 75000 वोटों वाला यह समुदाय उपस्थिति दर्ज करा रहा है और भारतीय राजनीति की धारा को थोड़ा बदलने में सक्षम दिखाई दे रहा है। यदि पिछले कई चुनावों का आकलन करे तो इस समाज का वोट पूरा-पूरा कभी एक दल के पास नही रहा बल्कि विभिन्न दलों में बंटता रहा लेकिन जिस तरह से रूझान मिल रहे है उससे साफ तौर पर यह प्रतीत हेाता है कि इस समाज का वोट कही न कही एक विशेष दल के खाते में बड़ी मात्रा में गया है। इस समाज का दूसरा गुट जो मैथडिस्ट चर्चाकी छत्र छाया में पल रहा है उसने इस बार भावया के करीब जाने की कोशिश करता दिखाई दिया है।
राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ द्वारा ईसाई राष्ट्रीय मंच की समरसता की योजना चल रही है। संघ के इन्द्रेश के स्वदेशी चर्च आन्दोलन सुदर्शन जी के नेतृत्व में ही आगे बढ़ा। इसी परिपेक्ष्य में राष्ट्रीय मुस्लिम मंच की भी स्थापना की गई उन्ही के द्वारा पहली बार ईसाई धर्माचार्यो का राष्ट्रीय स्टर पर संवाद हुआ था लेकिन कही न कही यह आन्दोलन दिशाहीन ही होता रहा है संघ भी इसे राष्ट्रीय स्तर पर विकसित नही कर सका जबकि उसे छतीसगढ़ और झारखण्ड जैसे क्षेत्रों इसे विकसित और विस्तारित करने की आवश्यकता थी।
उत्तर प्रदेश में यह आन्दोलन जरूर दिशा पकड़ता दिखाई दे रहा है इस समाज की सबसे बड़ी दिक्कत है यह अपना आन्दोलन बहुत साइलेन्टली (शांत तरीके) तरीके से करते है अब जरूरत है इसे दूसरे समाजों से जोड़ कर देखने की।
उत्तर प्रदेश में 2001 से 2003 तक उत्तर प्रदेश सरकार ने इस दिशा में अभिनव प्रयोग किया था जब किसी गैर मूस्लिम व्यक्ति को अल्प संख्यक आयोग का अध्यक्ष बनाया था। सरकार के स्तर पर या संघ और भाजपा के स्तर पर इस आन्दोलन को भले ही आगे न बढ़ाया जा सका हो लेकिन डा0 आशीष कुमार सिंह इस दिशा में सत्त प्रयत्नशील है।
गौरतलब है कि डा0 मैसी आई0टी0सी0 और ओ0टी0सी0 से प्रशिक्षित संघ के कार्यकर्ता रहे है साथ ही उनका अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से भी सम्बन्ध रहा है।
इन्ही के प्रयासों से दिल्ली पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में गैर कैथलिक ईसाइयों को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोडऩे के लिये दृहद योजना तैयार की जा रही है। इनके दिल्ली सम्मेलन तो हजारों लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई गैर कैथलिक ईसाइयों के सम्पर्क में आने अल्पसंख्यक राजनीति में एक बड़ा बप्लाव आ सकता है कहा जा सकता है कि यह बदलाव मुस्लिम राजनीति पर भी बड़ा असर डाल सकती है।
पंजाब में अमृतसर गुरूदासपुर फिरोजपुर, लुधियाना में भी स्वदेशी आन्दोलन की सक्रियता चुनाव परिणामों मे अपना असर दिखा सकती है। 30 अप्रैल को सम्पन्न हुये मतदान में लखनऊ सीट पर सवा लाख मतदाता भी कही न कही कांग्रेस और सपा के लिये चुनौती बनकर उभर सकते है।
इसी योजना के अर्न्तगत वाराणसी में भी ईसाई समुदाय के 11500 व्यक्ति के 1000 लोगों की बैठक ईसाई राष्ट्रीय मंच के तत्वधान में आहूत की जा रही है इसके पीछे मकसद साफ है बनारस में जिस तरह से मुस्लिम वोटों को आधार बनाकर मोदी को रोकेने की की कोशिश की जा रही है तो भाजपा ईसाई समाज के इस गुट का सहारा लेकर मुस्लिम वाराणसी में मुस्लिम राजनीति का पूरा समीकरण ही बदल देना चाहती है और उसे कही न कही अपने इस मिशन में आशातीत सफलता की उम्मीद कर रहा है।
इसके लिये इस सदस्यीय एक दल वाराणसी पहुंच चुका है उसे मूर्त रूप देने के लिये उसने अपनी योजना को अन्तिम रूप दे दिया है।

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