veerजगत शर्मा
एक कवि जब स्वातंत्रता सेनानी बनता है तब उसके समर्पण और संवेदनओं के अपने लक्ष्य के प्रति सजग रहने के आसार कुछ ज्यादा होते है।यह कोई स्थापित सत्य विधान नही है और न ही कई वार प्रयोग हुआ विचार है लेकिन जब बात ओजस्वी बक्ता प्रखर कवि लेखक और इन सबसे इतर किसी भी चरमसीमा तक पहुंचकर अपने राश्ट्र को प्रेम करने वाले स्वातंत्र वीर विनायक दामोदर सावरकर की हो रही हो तो फिर ये जुमला भी सिंधात की परिधी में आकर बैठ जाता है। सावरकरजी के जीवन को दो भागों में विभाजित करके देखें तो उनके बलिदान और उनके सामने प्रकट हुई कई विशम परिस्थियों को बेहद करीब से समझा और परखा जा सकता है। उनके जीवन का पहला भाग उनका प्रारंंिभक जीवन जहां वचपन में ही उनकी मां श्रीमति राधावाई का देहावसान तब होता है जब वह केवल नौ बर्श के थे इस वाल्यावस्था में ही मां का चला जाना किसी भी वालक के जीवन की धारा को मोड सकता हैं। इस उम्र में प्रत्येक कमी को पूरा किया जा सकता है लेकिन मां की कमी को नही। लेकिन सावरकर को वीर ऐसे ही नही कहा जाता हैं। उन्होने अपनी मां की कमी भारत मां को अपनी मां समझकर की उन्होने मां भारती को उसी तरह अनुभव किया जिस तरह कभी स्वामी विवेकानन्द ने किया था। उनका मां भारती के प्रति अनुराग और समर्पण इस कदर था कि मां के देहान्त के सात साल वाद पिता के देहान्त का उन पर ज्यादा प्रभाव नही पढा। वह यह सदमा यू ही झेल गये पर इसके बाद उनके भाई गण्ेाष सावरकरजी ने जिस तरह से संघर्श करके अपने पूरे परिवार और भाई वहन का पालन पोशण किया इन सब बातों ने उन्हे और संघर्शषील और अपने बडे भाई का अनुयायी वना दिया। उन्होने अपने कई भाशणों और सामान्य चर्चाओं में यह जिक्र कई वार किया कि उन्हे संघर्श और आंतरिक षाक्ति का सूत्र अपने बडे भाई से ही मिला वह उनसे बहुत प्रभावित थे। सावरकर जी को प्रारंभिक षिक्षा प्राप्ति से लेकर उच्च षिक्षा ग्रहण करने के लिये वडा संघर्श करना पडा क्योकि अत्याधिक धन अभाव के कारण उन्हे ठीक से षिक्षा उपलब्ध नही हो सकी और जब उच्च षिक्षा प्राप्त करने की वारी आई तो उन्होने यमुनादेवी के पिता के सामने उनसे षादी करने की यही षर्त रखी कि वह उन्हे उच्चषिक्षा प्राप्त करने में पूरी मदद करेगें। जो उन्होने पूरी भी की । ये दामोदर सावरकर के जीवन का एक भाग था जिसमें वह वीर बने नही थे लेकिन वीर बनने की प्रक्रिया से जरूर गुजर रहे थे जीवन उनकी कढी परीक्षा ले रहा था। जिसमें उनके मां पिता उनसे दूर हो चुके थे और बडे भाई उनके पालक की भूमिका में थे। वही जीवनसंगिनी भी उच्चषिक्षा प्राप्त कराने के बदले में मिली थी। कहा जाता है कि इसी संघर्श ने वीर सावरकर को तब ताकत दी होगी जब उन्होने अण्डमान की सेल्यूलर जेल से भाग कर मीलों लम्बा समुद्र पार किया होगा।
डनके जीवन का दूसरा भाग वह है जब उन्हेाने व्याक्तिगत संघर्शो को राश्ट्र से जोडकर उन्हे पूरे देष के संद्यर्श में परिवर्तित कर दिया। कॉलेज से पढाई के बीच में ही उन्होने अभिनव भारत नामक संगठन की स्ािापना कर दी युवाओं के वह प्रिय वक्ता और नेता तो पहले ही बन गये थे इसलिये इस संगठन को बडने में भी ज्यादा देर नही लगी और देषभक्त नौजवान अभिनव भारत के सदस्य बनने लगें। उन्होने इण्डीयन सोषलियोजिस्ट और तलबार नामक दोनो पत्रिकाओं में नियमित कांतिकारी कविताये और आलेख लिखे। जिससे थोडे ही दिनों में उनकी ख्याती देष के सभी स्वांतंत्रता सेनानियों और क्रातिकारी संगठनों के पास पहुच गई और वह एक होनहार क्रांतिकारी के रूप् में देखे जाने लगें उनका यह रूप् उनके जीवन के दूसरे भाग जिसमें वह वीर सावरकर कहलाये उसका र्निमाण कर रहा था। जिसका एक प्रमाण लंदन के इण्डिया हाउस में 10 मई 1907 को देखने को तब मिला जब उन्होने वहां अपने भाशणों से 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को आजादी पहली लडाई सि़द्ध की और उसे गदर मानने से इंकार कर दिया जिसके बाद पूरे इण्डिया हाउस में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की 50वीं जयंति मनाई गई । लंदन में ही वह अमर क्रंातिकारी लाला हरदयाल से मिले और उसके बाद ही अ्रगेजों के सिर पर बैठकर ही भारत की स्वाधीनता के लिये ल्रदन से ही क्रंातिकारी गतिविधियां संचालित की जाने लगी। एक जुलाई को अमर षहीद मदनलाल धीगरा ने जब विलियम हट वायली की गोली मारकर हत्या कर दी तो उन्होने मदनलाल धीगरा की प्रसंसा में द लंदन टाइम्स में एक लेख भी लिखा जिसके बाद अंग्रेज उनके पीछे पढ गये जिसके वाद वह लंदन से पेरिस चले गये लेकिन जब वह 13 मई 1910 को वापस लंदन पहुचे तो उन्हे हिरासत में लेलिया गया और भारत वापस भेजने की तैयारी की जाने लगी जब उन्हे जहाज के द्धारा भारत भेजा जा रहा था तों वह जहाज के सीवर हॉल के रास्ते से जहाज से फरार हो गये। यह घटना उनके साहस और उन्हे विनायक सावरकर से वीर सावरकर बनाने की कडी में एक महत्तवपूर्ण घटना है।24 दिसम्बर 1910 और 31 जनवरी 1911 को इन्हे दो दो वार आजीवन करावास की सजा दी गई साथ ही कालापानी की सजा और भी थी जो पोर्ट व्लेयर की जेल में काटनी थी ये भी उनके वीर बनने की प्रक्रिया में एक महत्तवपूर्ण घटना मानी जाती है। सावरकर संघ प्रमुख डॉ हेडगेवार के वेहद करीब थे उनकी पहचान हिन्दू महासभा के कारण भी थी, वह स्पश्ट और साफ वोलने वाले थे जिसके कारण ही तत्कालीन तथाकथित लोगों को वह सामप्रदायिक भी दिखते थे। आजादी की लडाई में उन्होने हर स्तर पर संघर्श अपना पूरा जीवन देष के नाम समार्पित किया। लेकिन आजादी के बाद उन पर गांधी हत्या का आरोप गलाकर उनकी प्रखर राश्ट्रभक्त की छवि धूमिल करने का प्रसाय तत्कालीन सरकार द्धारा किया गया। लेकिन वह पूरी तरह से बेदाग होकर वाहर निकले । स्वतंत्रता प्राप्ति के वाद जो विभाजन हुआ उसने इन्हे तोढ कर रख दिया और फिर यदाकदा वह पाकिस्तान के हुकमुरानों का विरोध करते रहते थे जिसके कारण कई वार पाक प्रधानमंत्री या अन्य कई राश्ट्राध्यक्षों के आने पर इन्हे एतियात के तौर पर तत्कालीन सराकर जेल में तक डाल देती थी। लेकिन वीर सावरकर को तोडना उसके बस की बउत नही थी वह हमेषा अखण्ड भारत के पुजारी रहे जिसके कारण ही आज करोडो युवाओं के मन में यह सपना पल रहा है। वर्तमान में देष के नवनियुक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी वीर सावरकर से वेहद प्रभावित रहे है। पूर्व प्रधानमंत्री अटलविहारी वाजपेई के कार्यकाल में वीर सावरकर की तस्वीर को संसद भवन में लगाया गया था। अब देखना होगा की पीएम नरेन्द्र मोदी उन्हे किस तरह याद रखते है।

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