उन्हीं के नाम पी मुहर लगी जिनपर अमित शाह रहे मेहरबान
आडवाणी खेमा मजबूत न हो इसलिये उमा और सुषमा ऊपर संघ ने की मेहरबानी

amit shahमोहित सिंह

लखनऊ 27 मई। सम्मान अभिमान भरोसा और आत्म विश्वास ये सभी शब्द मोदी सरकार में बिलकुल शीशे की तरह दमकते नजर आ रहे हैं। वहीं देश के कई प्रान्तों में मंत्री बनने की आस लगाये सांसदों को अपने द्वारा पोषित आत्म विश्वास के पालने में जोरदार झटका लगा है। मनन के साथ साथ शिकायतों की हवाएं चलने लगी हैं। लेकिन एक मदमस्त हाथी के तरह संघ मोदी और भाजपा आलाकमान सरकार चलाने में व्यस्त हो गया है। ये तो सत्य है कि जब ईश्वर सबकी इच्छाओं की पूॢत नहीं करता तो एक इंसान या उनका समूह हर एक को कैसे खुश रख सकता है। चुनाव से पूर्व टिकट को लेकर भी शिकवे शिकायतों के पहाड़ लगाये गये कितने तो इतना नाराज हुए कि उन्होंने अपनों को छोडक़र दूसरे दलों की गेंद उछालने लगे उन्हें ये गुमान था कि उनकी गेंद ही उछलेगी लेकिन चुनावी मैच में ऐसे कई खिलाड़ी पस्त हो गये। उनकी गेंद उछलना तो दूर उसमें से हवा ही निकल गयी। ऐसा ही कुछ शपथ से पहले देखने को मिला राजस्थान के ग्वालियर घराने की राजकुमारी बिफरीं लेकिन उनकी टीम के एक सदस्य को संघ के इशारे पर मोदी ने अपने कुनबे में शामिल कर लिया। वहीं उत्तर प्रदेश में भी पूर्वांचल में ऐन वक्त पर द्ददन मिश्र के नाम को मोदी की सूची से गायब कर दिया गया। इसमें ब्राह्मण लॉबी के कद्दावर नेता ने उनके नाम पर टांग अड़ा दी। अमित शाह ने भी मोदी से हामी भरवा ली। गौरतलब हो कि अमित शाह मंत्री तो नहीं बने लेकिन उन्होंने जो ताकत हासिल की है उसके आगे सभी चुप्पी साध लेते हैं। संघ ने भी अमित को अनौपचारिक रूप से अपना हाथ यानी मोदी सेना की कमान सौंप रखी है। अमित जो चाहते हैं उस पर संघ और मोदी ही नहीं भाजपा के बूढ़े शेर भी हाथों पर दस्तखत कर देते हैं। सुषमा स्वराज का नाम आया फिर पीछे कर दिया गया लेकिन अमित के सुझाव जिसमें कहा गया कि अगर सुषमा और उमा को तरजीह नहीं दो तो आडवाणी खेमा एक बार फिर मजबूत हो जायेगा। जो आगे चलकर पार्टी और मोदी सरकार के लिये तकलीफ का कारण बन सकता है। इसीलिये सुषमा और उमा भारती को तिलक लगाया और तो और शाह की सलाह पर ही ये फैसला किया गया कि उत्तर प्रदेश से किसी भी साधु समाज के बड़े नेता को कुर्सी नहीं दी जोयगी क्योंकि वक्त बेवक्त हिन्दुत्व की ललकार कर पार्टी पर संकट ही नहीं बल्कि 2017 के चुनाव में खराब असर डाल सकते हैं। इसीलिये गोरखपुर के कद्दावर नेता योगी आदित्यनाथ महाराज को किसी तरह समझा बुझकार शान्त करा दिया गया। वहीं बिहार में भी रामविलास पासवान को महत्वपूर्ण विभाग नहीं दिया गया पासवान ने नाक भौं सिकोड़ी तो उन्हें अगले विस्तार में उनके बेटे चिराग को स्थान देने का आश्वासन देकर ठंडा कर दिया गया। अमित शाह की सलाह पर ही कुछ राज्यों को तरजीह नहीं दी गयी। तरजीह उन्हीं राज्यों को दी गयी जिनमें आने वाले वर्षों में विधान सभा चुनाव होने हैं। दिल्ली से मीनाक्षी लेखी को मंत्रीमडंल में न लेने के पीछे संघ की सोच है। संघ को उन्हें पार्टी संगठन में एक मजबूत स्तम्भ के रूप में स्थापित करने का विचार है। डा. हर्षवधन को इसलिये लिया गया कि दिल्ली में भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विजेन्द्र कुमार गुप्ता को दिल्ली के मुख्यमंत्री बनाने पर मुहर लगायी जा चुकी है। इतना ही नहीं अभी भी भाजपा के कई सांसद ये नहीं पचा पा रहे हैं कि स्मृति ईरानी का इतना बड़ा और महत्वपूर्ण विभाग कैसे और क्यों दे दिया गया। इस मामले में सूत्रों के अनुसार स्मृति मोदी, संघ और अमित शाह की पंसद के साथ सुषमा स्वराज की टक्कर की हैं । और तो और स्मृति मोदी की महिला सेना की प्रमुख भी गिनी जाती हैं।

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