ssssमुम्बई से वरिष्ठ पत्रकार सोनीकिशोर सिंह का तस्लीमा पर विशेष लेख: तस्लीमा मेरी प्रिय लेखिका हैं। उनकी ‘द्विखंडिता’ का कुछ अँश पढ़ा था, तभी से वो और अच्छी लगने लगीं। उनकी बेबाकी, हिम्मत, संघर्ष, स्त्रीवादी विचारधारा, उनका लिखा साहित्य, आदि मुझे बहुत पसंद है। एक स्त्री जब अपनी शक्तियों को पहचान कर उसके आयामों को जीना शुरू करती है तो उसे हज़ार मुसीबतें उठानी पड़ती है। हमारा समाज एक बौद्धिक और क्रांतिकारी सोच वाली स्त्री को स्वीकार नहीं करता, उस सोच को पचा नहीं पाता और उल्टियाँ करता है। इसकी बास से बाकी तमाम स्त्रियाँ या तो डर कर अपनी सोच का दायरा सीमित कर लेती हैं या प्रतिकार कर अपना विस्तार करती हैं। हमारे समाज की अधिकाँश स्त्रियाँ, दायरा सीमित करने में अपनी भलाई समझती हैं और सदियों की सड़ी-गली परंपराओं को ढ़ोते हुये मृत्यु का वरण करती हैं, लेकिन जो अपना विस्तार करना चाहती हैं उनके लिये बहुत कठिन जीवन होता है। वो तस्लीमा नसरीन और आंग-सान सू की बन जाती हैं।
स्त्रियों के लिये जीवन के दो ही रास्ते हैं – डरो या डराओ, कोई मध्यम मार्ग बना ही नहीं है। तमाम स्त्रियाँ डरी हुई होती हैं। पुरुषवादी व्यवस्था के बीच अपने को अबला मानकर पराश्रित रहने के लिये मानसिक रूप से खुद को तैयार कर लेती हैं। वो मनु और तुलसीदास के विचारों को पोषित करने के लिये पैदा होती हैं कि स्त्रियाँ बंधन में रहने के ही योग्य होती हैं और उनका आश्रयदाता पिता, पति और पुत्र के रूप में कोई पुरुष ही हो सकता है। कभी-कभी इस डरी हुई आबादी को अपनी शक्ति का अहसास कराने के लिये कोई आवाज उठती है और हजारों-लाखों की भीड़ में कोई तस्लीमा उभरती है। अपनी किताब ‘औरत के हक में’ तस्लीमा ने उन तमाम वर्जनाओं, डर, संशय को लिखा है जो किसी औरत को औरत होने के लिये भुगतना होता है। वो मनुष्य न होकर सिर्फ औरत होती हैं। तस्लीमा इसीलिये बेहतरीन हैं कि उन्होंने अपने औरतपन का विस्तार किया है। समाज के बनाये साँचे में ढ़लने के बजाये अपने स्त्रीत्व का विस्तार किया है। असीमित, अपरिमित, असंख्य, अलौकिक, अतार्किक स्त्री के रूप में। तस्लीमा नसरीन ने औरत की अबतक की बनी-बनायी झूठी परिभाषा के स्थान पर एक नयी सोच गढ़ी है, जो देह के बंधन से ऊपर उठकर मनुष्यता की माँग करती है और जब यह मनुष्यता उसे इस समाज से नहीं मिलती तो वो तमाम स्त्रियों से अपना हक छीनने को कहती हैं। यह समाज ‘जीयो और जीने दो’ का नारा देता है तो सिर्फ पुरुषों के लिये क्योंकि स्त्रियों को समाज का हिस्सा कभी माना ही नहीं जाता है। वो सिर्फ ऐश्वर्य और उपभोग की वस्तु है। इसलिये तस्लीमा जिन्दगी की नयी परिभाषा गढ़ती हैं अपने लिये और तमाम उन स्त्रियों के लिये जो मनुष्य बनकर जीना चाहती हैं।

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