अयोध्या के नायक की कुंद होती धार पर मोहित सिंह का लेख
याद कीजिए 1991 का दौर और थोड़ा ये भी याद कीजिए कि भाजपा का वो वक्त जब वह kalyan-singh-650_102612115340 के उग्र तेवरों से पहचानी जाती थी यही वह समय था जब उन्हें अयोध्या का नायक करार दिया गया था । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह उस दौर में अपने बेबाक बयानों के कारण में हमेशा चर्चा का केन्द्र बने रहे लेकिन 2004 में उनके ऊपर एक गंभीर आरोप भी लगा था कि 2004 लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को चुनाव में हरवाने की कोशिश की थी इस संबध में यह भी सवाल उभरा था कि लाल कृष्ण अडवाणी ने कल्याण ङ्क्षसह पर निशाना साधा था कहा यह जा रहा था कि दरअसल अटल बिहारी वाजपेयी के इशारे पर कल्याण सिंह को बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी की गयी थी ।
उस दौरान लखनऊ संसदीय सीट को सुरक्षित रखने के लिए नरेन्द्र मोदी से लेकर पूरा संघ जुट गया था। तब कही जाकर 2004 में यह सीट जीती गई थी। 2009 के चुनाव में कल्याण ङ्क्षसह एक बार फिर भडक़ गये जब उन्होंने पश्चिमी उत्तर की बुलन्दशहर की सीट को प्रतिष्ठïा का प्रश्न बना लिया था। स्थिति यहा तक पहुॅंच गई कि कल्याण ङ्क्षसह ने पार्टी तक छोड़ दी और मुलायम सिंह से हाथ मिला कर इस सीट पर एक सामान्य से कार्यकर्ता कमलेश वालमीकि को अशोक प्रधान के खिलाफ उतार दिया । खुर्जा से लगातार पांच बार सांसद अशोक प्रधान भी बुलन्द शहर पर ही चुनाव लडऩा चाहते थे। भाजपा ने यह तो मंजूर कर लिया कल्याण सिंह पार्टी छोड़ते है तो छोड़ दे लेकिन पार्टी ने अशोक प्रधान को अनदेखा नहीं किया और भाजपा ने उन्हें टिकट दे दिया । 2014 के चुनाव से पूर्व कल्याण सिंह एक बार फिर वापिस आए और अपनी जन क्रांति पार्टी का विलय भाजपा में कर दिया लेकिन अशोक प्रधान और कल्याण ङ्क्षसह एक बार फिर आमने सामने है। कल्याण सिंह और प्रधान में इस बार हाथरस सीट को लेकर ठन गई है।
भाजपा ने कल्याण सिंह को पश्चिमी उत्तर की कुछ सीटों को जीताने के जिम्मेदारी सौंपी है। लेकिन क्षेत्र के लोग मानते हैं कि कल्याण ङ्क्षसह लोध वोटों की धार उनके ही गढ़ अलीगढ़ और हाथरस में कुंद होती जा रही है। कल्याण हाथरस सीट पर अपने ही किसी विश्वासनीय को लड़ाने चाहते हैं जब कि अशोक प्रधान इस सीट से सांसद होना चाहते है। फिर एक बार दोनो का अहम आपस में टकरा रहा है। कल्याण सिंह की दलील है ‘ हाथरस सीटÓ पर भाजपा को जाटव समाज का व्यक्ति उतारने पर घाटा हो सकता है। जब कि अशोक प्रधान साफ तौर पर कहते हैं हाथरस सीट पर जाटव का ही हक बनता है दूसरी तरफ जमीन से जुड़े कार्यकर्ता यह संदेश दे रहे हैं कि यदि कल्याण सिंह और अशोक प्रधान के विवाद पर विराम नहीं लगाया गया तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा को बड़ा नुकसान हो सकता जिस पर बसपा बहुत ही गभीर आकलन कर रही है और इस क्षेत्र की 25 सीटों में से अधिकांश पर कब्जा कर लोकसभा चुनाव में एक बड़ी ताकत के रूप में उभर सकती है। कल्याण सिंह के ही इशारे पर अशोक प्रधान का टिकट काटा गया इधर विभिन्न दलों द्वारा कराये गये सर्वे के आधार पर जो समीकरण उभर रह हैं। उसमें एक उनझन भरी स्थिति सामने आ सही है वह यह कि 2009 तक जिस कल्याण सिंह का आधार लोध वोट काफी हद तक उनके पीछे खड़े थे लेकिन लोध कि जान का मोह कल्याण सिंह भंग होता दिख रहा है। उधर लम्बे समय तक कल्याण सिंह के साथ रही उनकी महिला मित्र जो निगम पार्षद से राज्य सभा तक पहुॅुंच गई, ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। एक समय था जब कल्याण और यह महिला सांसद एक दूसरे के पूरक थे और आज ये दोनों एक दूसरे धुर विरोधी हैं इसका भी नुकसान अन्तत: पार्टी को ही उठाना पड़ेगा। कल्याण सिंह उनके अपने ही गढ़ अलीगढ़ में जबरदस्त चुनौती मिल रही है। पार्टी संगठन का ढ़ाचा है कि बनने का नाम नहीं ले रहा । खीचतान के चलते विभिन्न मंडलों के प्रकोष्ठïकों की कार्य कारिणी के गठन का सिलसिला जारी है। ऐसे में यह पार्टी मैदान कैसे जीतेगी । इस सवाल का उत्तर पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता तलाश रहे हैं।
2012 में विधान सभा चुनावों में और भाजपा की दुर्गाति हुई तब सूर्य प्रताप शाही को हटाकर लक्ष्मीकांत बाजपेई को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। बाजपेई ने ऐलान किया कि जिला एवं महानगर अध्यक्ष नामित नहीं निर्वाचित होंगे इसके लिये प्रकिया भी शुरू हो गई । जनपद के साथ महानगर में भी इस प्रकिया को अपनाने के लिये तैयारी हो गई। इसी दौरान कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह की वापसी ने इस प्रकिया को प्रभावित किया। परिणाम स्वरूप यह तय हुआ कि आम राज्य ये यदि अध्यक्षों की नियुक्ति हो तो बेहतर है। लेकिन यह भी संभव नहीं हुआ । अन्त: अलीगढ़ में चौधरी देवराज सिंह को जिलाध्यक्ष की कमान सौंप दी। इसी दौरान पार्टी के वरिष्ठïों ने इनके साथ काम करने से मना कर दिया । क्या ऐसे संगठन से हो रही है 2014 की तैयारी । भाजपा ने कल्याण सिंह से किनारा करते हुये बड़ा झटका दिया और एटा से कल्याण सिंह की जगह उनके बेटे राजवीर सिंह को उतारा है। गौरतलब है कि इस बार ऐटा संसदीय क्षेत्र में टिकट घोषित होने से पूर्व कल्याण सिंह सर्घष के दौर से गुजर रहे थे । राजवीर सिंह के नाम पर तो भाजपा में आंतरिक संघर्ष और तेज हो गया है वहीं अलीगढ़ और हाथरस सीट भी हाशिए पर आ गई है। कल्याण सिंह को जो चार सीटे सौंपी गई है वह उनके लिए परेशानी का सबब बन गई है।

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