दिल्ली से हमारे वरिष्ठ पत्रकार अरुण तिवारी जी का बचपन वाली गौरैया पर अनूठा लेख…
आ, मेरी गौरैया आ
Houses_wallpapers_174आ, मेरी गौरैया आ !
चीं चीं फुदक चिरैया आ !!
मैं भी खाऊं! तू भी खा !!
चोंच में दाना लेती जा !
हंसी-ह ंसी कुछ कहती जा !!
क्या आपको गौरैया के बारे में ऐसी कुछ लाइनें याद हैं ? मुझे याद हैं। तब हमारे दिल्ली वाले मकान में मात्र दो कमरे, रसा ेई, गुसलखाना, शौचालय और एक बरामदा था। बाहर, अमरूद के नीचे आंगन में खाना खाते, तो एक चिङा और कई चिङिया नियम से हमारे इर्द-गिर्द मंडराते रहत े थे। हमें खाना देने के लिए तरह-तरह से आकर्षित करते। इसक े लिए उनमें कभी झगङा या यूं कहें कि कुछ प्रतियोगिता जैसी होती। अक्सर चिङा भारी पङता। हम उन्हें रोटी के टुकङे तोङकर देते, जिसे लेकर वे फुर्र से उड़ जाते। फिर आते, फिर जाते। वे तब तक डटे रहते, जब तक कि हम खाना न खा लेते। वे हमसे इतने हिले-मिले थे कि फुदकते-फुदकते कभी-कभी वे हमारी थाली की कोर पर ही आ बैठते। वे अक्सर आंगन में बीट कर देते। हमें कभी बुरा नहीं लगता; बल्कि मेरी बहन तो उन्हे रोटी-दाना चुगाने के चक्कर में अक्सर इतनी मगन हो जाती कि खुद खाना ही भूल जाती। इसके लिए उसे डंाट भी पङती। बावज ूद इसके उसके आनंद में कोई कमी नहीं आती। वह ऐसे ही कोई गाना गुनती, गुनगुनाती और मस्त रहती- आ मेरी गौरैया आ……। मैं भी रोज सुबह मिट्टी के बङे से कटोरे में भरकर उनक े लिए साफ पानी रख आता। जब अम्मा चावल बीनती, पछोरती या गेहू ं साफ करती, तब भी गौरैया न मालूम कहां से बिन बुलाये फुर्र से पहुंच जाती। हमारी अम्मा भी अक्सर उन्हे दाना फेंकती रही और गुनगुनाती रहती – ÓÓराम जी की चिरिया, रामजी का खेत। खाय ले चिरिया, भर-भर पेट। हां जी भर-भर पेट….। कभी गुस्सा हो जाती – ÓÓअब का सारा दाना तुम्हइय दै दंू ? चलो भगो, हां अ अ, नही ंतो… जाओ अपौ काम करौ ।ÓÓ कभी बुआ को छेड़ द ेती – ÓÓननद रानी! इ चिरैया तुम्हरे ससुराल से आई है।ÓÓ फिर चिरैया से कहती- ÓÓऐ चिरैया ! जाय के ननदोई राजा से कहिओ कि ठंड परन लगी है। अब तुम्हार दुलहनिया मायके न रहन चाहत। समझि गई ? हां ! ठीक से कहियो जाय। तोहे मोती से चाउर चुगाउंगी।ÓÓ चिरैया भी जैसे ÓहांÓ में सिर हिला देती और बुआ शरमा के वहां से भाग जाती। लेकिन यह रिश्ता सिर्फ गौरैया के साथ था और किसी चिङिया के साथ नहीं। गौरैया ही एक ऐसी चिरैया थी, जो हमें अपनी सी लगती थी. .बिल्क ुल घर की सी, जिसे घर में आने-जाने की तब पूरी आजादी थी। उसने हमारा कभी नुकसान नहीं किया; बल्कि शैतान लङके ही कभी-कभार गौरैया का घोसला उजाड़ दिया करते; तब दादी बहुत पश्चाताप् करती। करीब डेढ साल पहले 15 अगस्त की पूर्व संध्या पर दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित ने गौरैया को राज्य पक्षी का दर्जा देकर उन दिनों की याद ताजा कर दी। पिछले वर्ष 20 मार्च का दिन Óविश्व गौरैया दिवसÓ घोषित कर दिया गया। अब गांव जाकर ही मेरी ब ेटी इस आनंद को हासिल कर पाती है। हाला ंकि अब हमारा दिल्ली का मकान पहले से ज्यादा बङा है और रौनकदार भी, लेकिन अब इसमें गौरैया के लिए कोई जगह नहीं है। पहले वह हमारे रौशनदान में घोसला बनाया करती थी। अ ंडे देने से पहल े घास-फूस.. न मालूम क्या-क्या लाने मे ं जुटी रहती। अंड े देने के बाद उसे घंटो स ेती। हम ध्यान रखते कि कहीं उसके अंड े गिर न जाये।… आते-जाते कहीं वह पंखे स े कट न जाय े। जब बच्चे निकल आते, तो उनकी चीं ची सुनते बैठ े रहते। उन्हे देखने के चक्कर में घोसले के पास जाना चाहते, लेकिन अम्मा डा ंटकर भगा देती – ÓÓछूना मत! मर जाय ेंगे। पाप लगेगा।ÓÓ फिर एक दिन वे बच्चे भी फुर्र से उङ जाते और हम कई दिन के लिए उदास हो जाते। मेरी बेटी पूछ ही बैठी – ÓÓक्यों पापा ! अब क्यों नहीं आती गौरैया हमारे घर ? गांव में तो आती है।ÓÓ मैं क्या जवाब देता ? मैन े भी कह दिया – ÓÓ शहर में उसका दम घुटता है न, इसीलिए। कोई-कोई तो कह रहा है कि दिल्ली में कब ूतरों की संख्या बढ गई है, इसलिए गौरैया घट गई हैं। भई, यह बात मेरी तो समझ में नहीं आई; पर बिटिया! एक बात तो सच है कि गौरैया बहुतय नाजुक चिरैया होती है। अब हमारे घर में हरे पेङ-पौधे नहीं रहे। बिजली-टेलीफोन के तारों के फैले जाल में फंसकर घायल होने स े उसे डर लगता है। हमारे मोबाइल फोन और इसक े लिए लगे ऊंचे-ऊंचे टावरों से कुछ ऐसी तरंगे निकलती हैं, जो हमें तो नुकसान पहुचाती ही है उन्हें भी नुकसान पहुंचाती है; बच्चे पैदा करने की उनकी क्षमता घटाती है; उन्हे बीमार बनाती है। अब वह बिजली के मीटर बक्से की खाली जगह में भी घोसला नहीं बनाती। पहले वह कहीं भी थोङी ऊंची जगह देखकर घोसला बना दिया करती थी। अब शायद डरती है कि कोई उजाङ न दे। दिल्ली में 7777 ह ेक्टेयर रिज एरिया है। लेकिन इसमें पेङ के नाम पर यदि कुछ है, तो बस! कीकर !! अब न खाने को कीट-पंतगे, फल-फूल उतनी संख्या में है और न हवा उतनी माकूल है कि वह रहना चाहें। पानी पीने को कोई देता नहीं। ताल-तलैया बचे नहीं। यमुना का पानी भी ऐसा नहीं कि नन्ही गौरैया पीना चाहें।ÓÓ अब मैं बिटिया से कैसे कहता कि अब पानी तो बोतलों म ें बंद होकर बिकन े चला गया है। गौरैया के पास पानी खरीदने को पैसे नहीं है, ता े मरे प्यासी और क्या ? वह अपनी गुल्लक लेकर आ जाती; कहती कि पापा! इसमें से पैसे ले लो और उसके लिए पानी खरीद लाओ या शायद वह गौरैया को देने के लिए अपने गिलास का पानी लाकर मेरे सामने रख देती और खुद प्यासी रहना पसंद करती। खैर! उस े यह जानकर थोङी तसल्ली हुई कि कोई है, जो 14 से 16 स े.मी. ल ंबी इस घरेलु चिरैया को बचाने की कोशिश कर रहा है। मध्य यूरोप, दक्षिण अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रलिया और न्य ूजीलैंड के अलावा भारत जैसे देशों मं े कभी बहुतायत में पाई जाने वाली इस गौरैया की संख्या में 60 स े 80 फीसदी कमी आई है। गौरैया अब विलुप्त प्रजातियों की सूची में दर्ज है। गौरैया के अस्तित्व पर मंडराते खतरे को देखत े हुए ब्रिटेन की Óरॉयल सोसाइटी ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ बर्डस्Ó ने इसे लाल सूची म ें दर्ज किया है। मशहूर पर्यावरणविद् दिलावर की पहल पर अब दिल्लंी में Óराइज फॉर द स्प ैरोजÓ यानी ÓÓगौरैया के लिए जागोÓÓ अभियान शुरु हुआ है। गत् वर्ष 20 मार्च को Óविश्व गौरैया दिवसÓ के तौर पर मनाने की भी एक पहल की गई। तय किया गया था कि गौरैया पर अध्ययन के लिए एक साझा निगरानी कार्य क ्रम चलाया जाय ेगा। अब शीघ्र ही इसक े बारे में दिल्ली क े बच्चे अपनी स्कूल की किताबों में पढ.सकेंगे। लेकिन मेरे प्यारे बच्चो ! हमउम्र दोस्तो ! गौरैया सिर्फ किताबों का चित्र बनकर न रह जाये। अपने आंगन और छत पर हम इसक े साथ फिर से बातें कर सकें, गा सकें। हमारी सुबह गौरैया की चहचहाहट से शुरु ह, इसलिए दिल्ली सरकार जागी है। अत: हम भी जागें; गौरैया के लिए कोई कॉलोनी न बना सकें, तो गौरैया को कुछ दाना, कुछ पानी और अपने घर व दिल में थोङी सी जगह तो दे ही सकत हैं। क्या आप द ेंगे ?

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.