ऽ डॉ0 दिलीप अग्निहोत्री

navaj sarifआईपीएन। यदि निचले स्तर के पदाधिकरियों पर गाज गिराना समीक्षा है, तो कई राजनीतिक पार्टियां यह काम पूरा कर रही है। लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने अपनी जिम्मेंदारी पर आत्मचिंतन नहीं किया। कांग्रेस ने अब तक की सबसे शर्मनाक पराजय का सामना किया। पिछले दस वर्षो से केन्द्र की सत्ता पर सोनिया और राहुल का अपरोक्ष निमन्त्रण था। प्रधानमंत्री और कांग्रेस कोटे के मंत्री उनकी सलाह को नजरअन्दाज नहीं कर सकते थे। संगठन शीर्ष पर मां-बेटे आसीन थे। चुनावी समर में वह सेनापति थे। फिर भी जवाबदेही के नाम पर रस्मअदायगी की गयी। राहुल और सोनिया ने हार की जिम्मेंदारी ली। अपने-अपनेपद से इस्तीफे की पेशकश कर दी। वह जानते थे कि सामने बैठे लोगों की प्रतिक्रिया क्या होगी। इस्तीफा स्वीकार नहीं होगा सबने कहा पराजय के लिए सामूहिक जिम्मेंदारी होगी। इस तरह कांग्रेस की समीक्षा पूरी हो गयी। सच्चाई यह थी कि राहुल और प्रियंका अपनी दोहरी जिम्मेंदारी का ठीक से निर्वाह नहीं कर सके। सरकार और पार्टी दोनो को रसातल में जाने से वह रोक नहीं सके। लेकिन इसके मद्देनजर फिलाहाल कोई बड़ा परिवर्तन देखने को नहीं मिलेगा। मिलिन्द देवड़ा जैसे नेता अवश्य प्रश्न उठा रहे है। उन्होने आरोप लगाया कि राहुल गांधी अनुभवहीन लोगो से घिरे थे। वह जमीनी हकीकत को नहीं समझ सके। मिलिन्द की बात ठीक है। लेकिन यह बात तब कह रहे है, जब पार्टी चवालिस सीटे पर आ गयी। जब पार्टी बहुमत में थी। सरकार में थे, मिलिन्द मंत्री थे, तब वह खामोश रहे। शायद तब उनके लिए मंत्री पद का सुख अधिक महत्वपूर्ण था। ऐसे सलाहकारो से किसी पार्टी का भला नहीं हो सकता। आज मिलिन्द जैसे नेता अपनी भावी रणनीति को ध्यान में रखकर ऐसे बयान दे रहे है। उनका निशाना कहीं और हो सकता है। लेकिन किसी पार्टी के शीर्ष नेताओं को यह समझना चाहिए कि लोग उनमें जीत दिलाने वाला करिश्मा देखना चाहते है। बार-बार की पराजय उनके प्रति आस्था में कमी करती है। राहुल की जगह प्रियंका को कमान सौंपने की मांग उठने लगी है।
आम आदमी पार्टी में भी कार्यकात्राओं ने कोई गलती नहीं की थी। शीर्ष नेतृत्व की दिशाहीनता ने पार्टी को इस दशा में पहुंचाया। पूरे देश में उसे चार सीटे पंजाब से मिली। यहां शीर्ष नेताओं का खास दखल और प्रभाव नहीं था। नही ंतो पूरे देश की तरह उन्हें यहां भी शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ता।
दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी के छोड़कर भागना अरविन्द केजरीवाल का अपना निर्णय था। इसमें कार्यकताओं की कोई सहमति नहीं थी। केजरीवाल का पूरे देश में लड़ने का निर्णय अपना था। बनारस से खुद लड़े। बताया जाता है कि पार्टी फण्ड की सर्वाधिक हिस्सा उन्होने बनारस में खर्चा कर दिया। अन्य उम्मीदवारों को अधर में छोड़ दिया गया। इसी प्रकार अमेठी से कुमार विश्वास को लड़ाने का निर्णय भी ठीक नहीं था। आम आदमी पार्टी के बड़े नेता दिल्ली और आस-पास की सीटो पर पूरा ध्यान केन्द्रित रखते, प्रमुख नेता वहीं से लड़ते, तो परिणाम ठीक हो सकता था। तब वह भले ही पराजित होते, लेकिन भविष्य की रूपरेखा बनी रहती। लेकिन अरविन्द को लगा कि वह पूरे देश में भाजपा और कांग्रेस दोनो के विकल्प बन जाऐगे उनके इस चिन्तन में कार्यकर्ता नहीं थे। उनकी इच्छाओं का कोई महत्व नहीं था।
आम आदमी पार्टी की दुर्गति के लिए सर्वाधिक जिम्मेंदार केजरीवाल थे। इसमें उनके अन्य कोर सदस्यों की सहभागिता थी। लेकिन इन सबने बड़ी चालाकी से जवाबदेही का मौका टाल दिया। केजरीवाल सरकार बनाने के लिए दिल्ली के उपराज्यपाल की चौखट पर पहुंच गए। वह जानते थे कि यह कार्य कांग्रेस के समर्थन से सकता है। कांग्रेस ने मना कर दिया। ये वही नेता थे जो अन्य पार्टियों को राजनीति सिखाने का दावा करते थे। लेकिन यह खुद सिद्धान्तों की राजनीति नहीं सीख सके। ये जिम्मेंदारी से भागते रहे। दूसरी पार्टियों के दुर्गुण इनमें आ गए। बनारस में केजरीवाल ने खुलकर वोट बैंक की राजनीति की। जिन्हे सुधारने की बात कर रहे थे,उनसे ही प्रेरणा ले रहे थे। नाटक में तो ये सबसे आगे थे। बनारस में चुनाव लड़ने के लिए केजरीवाल ट्रेन से पहुंवे थे। कहा कि बनारस नहीं छोड़ेगे। लेकिन मतदान समाप्ति के दो घण्टे पहले प्लेन से दिल्ली लौट गए। नाटक के प्रतीक दिलचस्प है। वोट लेना था तो ट्रेन से गए। लौटे हवाई जहाज से। वोट लेना था कहा बनारस में रहेगे। वोट पड़ चुके तो दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने का दुबारा प्रयास करने लगे। माफी तो मांगी तो दिल्ली के मुख्यमंत्री पद को छोड़ने की। आम चुनाव गलत ढंग से लड़ा, इसके लिए ना कोई माफी मांगी। ना जवाबदेही का निर्धारण होने दिया।
सोनिया गांधी और राहुल ने कहने के लिए सही पराजय की जिम्मेंदारी ली। किन्तु अरविन्द केजरीवाल ने ऐसा करना भी जरूरी नहीं समझा। उन्होने इसकी नौबत ही नहीं आने दी। पहले दुबारा मुख्यमंत्री बनने की गोटी चली। उसमें सफलता नहीं मिली तो न्यायपालिका से टकराकर जेल चले गए। इसी को मुद्दा बना दिया। वह नियमानुसार मुचलका भर कर इस स्थिति से बच सकते थे। देश की न्यायिक व्यवस्था का सम्मान उन्हे करना चाहिए था। यह अग्रेंजों की नहीं स्वतंत्र देश की न्यायिक प्रक्रिया है। लेकिन अरविन्द केजरीवाल ने अपने राजनीतिक हित को न्यायिक व्यवस्था से ज्यादा सम्मान दिया। वह चुनाव में अपनी बड़ी विफलता से ध्यान हटाना चाहते थे।
इसी प्रकार सपा और बसपा के शीर्ष नेतृत्व ने अपने को पराजय की जिम्मेंदारी से मुक्त रखा। जबकि उन्हे सबसे पहले आत्म चिंतन करना चाहिए।

(लेखक डॉ0 दिलीप अग्निहोत्री चर्चित स्तम्भकार हैं। डॉ. अग्निहोत्री समय-समय पर सम-सामयिक विषयों पर आलेख लेखन का कार्य भी पूरी निष्ठा के साथ निष्पादित करते रहते हैं।)

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