इंकलाब जिंदाबाद…
वन्दे मातरम…
भारत माता की जय…

अजीब दौर है… या फिर… दौरे हैं. जो नारे साल में एक दो बार ही नज़र आते हैं…

आज़ादी या लोकतंत्र नामक त्यौहार के उत्सव मनाने के दिन और उसके बाद तारीख नाम के फटे बोरे में भर कर स्टोर रूम में रख दिए जाते हैं, अगले साल के उत्सवी दिन तक के लिए. जब इन्हें फिर निकाल कर नहला धुला कर, उत्सवी रंग में रंगा जाता है. हाँ ईमानदारी का रोग कुछ ज्यादे हो तो इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि भुला दिया जाता है.

अजीब दौर है… जब एकाएक सारे के सारे भ्रष्‍टाचारी, ईमानदारी के पक्ष में नारे लगा रहे हैं और हम हैरान-परेशान उसे देखने पर मजबूर हैं. देखने पर मजबूर इसलिए हैं क्योंकि कुछ समझ में नहीं आ रहा. क्या हो रहा है ? कौन सी हवा है ये ? नारे लगाते, चौकड़ी भरते, लोकतंत्र की दुहाई देते सांसद, लोकतंत्र को रौदने वालों का साथ देते सांसद. जाग चुकी जनता, जो की गाँधी वादी टोपी पहन कर, मैट्रों में कानफाडू नारे लगा कर, थोडा संयमित रखने का उपदेश देने वालों को उनकी औकात बता कर, सड़कों पर हुडदंग करके, लोकतंत्र की जीत, जनता जनार्दन की जीत बताते लोकतंत्र के तमाम  दलाल, वे लोग जो सालों से सड़कों पर उतरते रहे हैं अपनी मांगों को लेकर और हर बार हुकूमत की लाठियां खा कर या फिर कोरे आश्वाशन लेकर घर को लौटते रहे हैं. वो लोग भी जो सालों से शोपिंग मालों में बैठ कर ये सवाल करते रहे हैं- लोकतंत्र???  एवी… ये किस चिड़िया का नाम है ? ये सब लोग शामिल हैं इस लड़ाई और जीत में. कंधे से कंधे मिला कर लड़ा है इन लोगों ने इस जंग को.

अजीब दौर है… जब खुदा के नाम की तरह लोकतंत्र भी बिकाउ माल बन गया है. अल्लाह के नाम पर दे दो… नहीं तो खुदा के नाम पर ही कुछ दे दो.. मगर कुछ तो दे दो. की गुहार कर भीख मांगने वाले भिक्मंगों की तरह, हमारे माननीय सांसद जिन्होंने सालों तक इसे लुटा, खसोटा और नोचा है, अब वे लोकतंत्र की दुहाई देते हुवे मांग कर रहे हैं. संसद की गरिमा बचाएं. दुहाई जनता की, दुहाई लोकतंत्र की, इसके नाम पर आप लोग सब कुछ भुला कर हमें बख्स दीजिये. ख़ैर बख्सिश और भीख देने में हमारा कोई सानी नहीं, (जेब दलिद्दर, दिल है समन्दर… की तर्ज पर मूड तो किया दो रूपये का छुट्टा हो तो अपने इन माननीय सांसदों को दे दूँ, देखा तो अपने कमीज में कोई जेब ही नहीं थी) इसलिए तो यहाँ ऐसे- ऐसे नियमों, कानूनों और धर्मों को आविष्कार किया गया जो सदियों से लोगों को भिखारी बनाते रहे हैं. सो थोड़ी सी मान-मनौवल के बाद जनता मान गई और इस तरह बेचारा लोकतंत्र नष्ट होते-होते रह गया.

जवाब?

अजीब दौर है… लोगों में वे भी शामिल हैं जो कातिल हैं और शामिल मकतुल भी हैं. दोनों कंधे से कंधे मिला ‘भ्रष्‍टाचार मुर्दाबाद’ बोल रहे हैं. समझना वाकई मुश्किल है कोंन किसके खिलाफ है ? लोग बताते हैं ये रामराज्य आने का संकेत है. हालाँकि जिन इमानदार चेहरों को मैं पहचानता हूँ. वो इन दिनों बड़े डरे-सहमें से दिखाई देते हैं. ना समझ पाने की स्थिति में गर्दन ‘हाँ’ के रूप में हिलाने को हम मजबूर हैं. देश के प्रधानमंत्री जी से भी ज्यादे मजबूर. एक तरफ तमाम शक्तियों से लैश लोकतंत्र के हाकिम लोग हैं, तो दूसरी ओर हकीमों से त्रस्त जनता. जिनकी शक्लों की पहचान हाकिमों से अलग रख कर नहीं की जा सकती. सवाल उठा सकते हैं. पहचान तो आवाजों से भी कि जा सकती हैं. मानता हूँ… हाँ पहचान आवाजों से भी की जा सकती है मगर अब तो आवाजें भी आपस में इतनी गढ़मढ़ हो चुकी हैं कि पहचान करना मुश्किल है कौन बोल रहा है. फिर भी ये जीत हैं, बताने वाले इसे देश की जीत बताते हैं, अवाम की जीत भी, साथ ही ईमानदारी की जीत भी बताई जाती है और भी पता नहीं किन-किन मूल्यों की जीत बताई जाती है. तो फिर जीत भले दिखाई दे या ना दे, जीत को मानना तो पड़ता ही है.

अजीब दौर है… जब भ्रष्‍टाचारी माँ के दुलारे बेटे उसकी सौत ईमानदारी के पक्ष में नारे लगा रहे हैं. मुझे उम्मीद थी ये देख कर ईमानदारी इठला कर नाच गा रही होगी, भ्रष्‍टाचारी माँ छाती पिट -पिट कर रो रही होगी. लेकिन जब इन दोनों के इलाके में गया तो देखा ईमानदारी पहले की तरह ही रो रही थी और भ्रष्‍टाचारी पहले की तरह ही मजे में थी. उसकी सेहत देख कर लगा 12 दिन से इसका वजन कम करने के अभियान में लगे लोगों के तो वजन कम हो गए मगर इसकी सेहत पर कोई फर्क ही नहीं पड़ा. सोचा लगे हाथ पूछ लूँ – माननीय  भ्रस्टाचारी जी आप किस चक्की का आटा खाती हैं ?  मगर छोटे-मोटे लोग बड़े-बड़े लोगों से सवाल नहीं करते. इसलिए डर के मारे हम चुप्पी मार वापस हो लिए.

अजीब दौर है… टीवी देखिये. तथाकथित जनता की जीत के जश्न के तमाम विजुअल्स दिखाए जा रहे हैं. विजुअल इफेक्ट्स और साउड इफेक्ट्स की वजह से जश्न और शानदार दिखाई दे रहा है. टीवी पर बेइमानियों के लिए मशहूर एंकर मेकअप से रंगी-पुती ईमानदारी का इंटरव्यू ले रही है. ईमानदारी के चेहरे पर लगे क्रीम-पाउडर उसकी बेबसी और गरीबी की लकीरों को छुपा पाने में नाकाम हैं. एंकर जबरदस्ती माईक उसके मुंह में ठुसे जा रही है. ईमानदारी के बेटे जबरदस्ती उसे आन्दोलन के सम्बन्ध में कुछ न कुछ बोलने पर मजबूर किये जा रहे हैं. जब इंटरव्यू दे कर ईमानदारी भीड़ के किनारे आ खड़ी हुई तो किसी ने सवाल किया आप इतनी डरी हुई क्यों हैं ?

बगैर बैनर तख्‍ती के भी कुछ-कुछ होता है

ईमानदारी – मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं और बड़े हो गए बच्चों से हर माँ-बाप को डरना होता है मैं भी डर रही हूँ. फिलहाल जनता और ईमानदारी की जीत का जश्न मानाने वाले ईमानदारी के इस जवाब पर तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे हैं. जश्न मानती भीड़ में से किसी ने कहा -ईमानदारी सठिया गई है. मुझे भी लगा ईमानदारी सठिया गई है. कुछ ही साल पहले देश भी सठियाया था. बिना समझे बुझे मेरा सर ‘हाँ’ के प्रतिक रूप में जुम्बिशें खाए जा रहा है… अजीब दौर है या फिर दौरे हैं…?

Anjule Shyam Maurya— अंजुले श्याम मौर्य
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‘मीडिया का एक अदना सा स्टुडेंट. पिछले तीन साल से कई चैनलों में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश. एक कट्टर टीवी और सिनेमाई दर्शक, जिसका मानना है, सिनेमा से बड़ा कोई लिटरेचर नहीं होता और बदलाव की बयार यहीं से बहेगी’|

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