IMG_0055अखातीज पर कैसे IMG_0055 बता रहे हैं अरूण तिवारी
इन्द्र देवता ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी है। अगले आषाढ-सावन-भादों में वे कहीं देर से आयेंगे; कहीं नहीं आयेंगे; कहीं उनके आने की आवृति, चमक और धमक वैसी नहीं रहेगी, जिसके लिए वे जाने जाते हैं। हो सकता है कि वह किसी जगह इतनी देर ठहर जायें कि 2005 की मुंबई और 2006 का सूरत बाढ प्रकरण याद दिला दें। इस विज्ञप्ति के एक हिस्से पर मौसम विभाग ने अपनी मोहर लगा दी है; कहा है कि वर्ष-2014 का मानसून औसत से पांच फीसदी कमजोर रहेगा। शेष हिस्से पर मोहर लगाने का काम अमेरिका की स्टेनफार्ड यूनिवर्सिटी ने कर दिया है। पिछले 60 साल के आंकङों के आधार पर प्रस्तुत शोध के मुताबिक दक्षिण एशिया में अत्याधिक बाढ और सूखे की तीव्रता लगातार बढ रही है। ताप और नमी में बदलाव के कारण ऐसा हो रहा है। यह बदलाव ठोस और स्थाई है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव भारत के मध्य क्षेत्र मे ं होने की आशंका व्यक्त की गई है। वर्षा औसत मे ं पांच फीसदी गिरावट का आंकङा कितना प्रभाव डाल ेगा, चिंता इससे ज्यादा इस प्रश्न का उत्तर तलाशने की है कि हम क्या करें ? इन्द्र देवता की विज्ञप्ति सुनें, तद्नुसार कुछ गुनें, उनकी अगवानी की तैयारी करें या फिर इंतजार मिथक का टूटना जरूरी जवाब जानने के लिए इस मिथक को तोङना जरूरी है कि वर्षा औसत से ज्यादा हो तो बाढ और औसत से कम हो तो सूखा लाती है। सत्य यह ह ै कि भारत के जैसलमेर में भारत के राष्ट्रीय वर्षा औसत से अत्यंत कम वर्षा होती है और चेरापूंजी मे ं कई गुना ज्यादा; बावजूद इसके क्रमश: जैसलमेर मे ं न हर साल सूखा घोषित होता है और न चेरापूंजी में बाढ। इसका तात्पर्य यह है कि यदि जिस साल, जिस इलाके मे ं वर्षा का जैसा औसत हो, हम उसके हिसाब से जीना सीख लें तो न हमें बाढ सतायेगी और सूखा। कारण ही निवारण एक अन्य सत्य यह है कि बाढ हमेशा नुकसानदेह नहीं होती। सामान्य बाढ नुकसान से ज्यादा नफा देती है। प्रदूषण का सफाया कर देती है। खेत को उपजाऊ मिट्टी से भर देती है। अगली फसल का उत्पादन दोगुना हो जाता है। बाढ नफे से ज्यादा नुकसान तभी करती है, जब अप्रत्याशित हो; आसमान मे ं बादल फट जाये; वेग अत्यंत तीव्र है; नदी पुराना रास्ता छोङकर नये रास्ते पर निकल जाये; बाढ के पानी में ठोस मलबे की मात्रा काफी ज्यादा हो अथवा जरूरत से ज्यादा दिन ठहर जाये। बाढ के बढते वेग, अधिक ठहराव, अधिक मलबे और अधिक मारक होने के कारण भी कई हैं: नदी में गाद की अधिकता, तटबंध, नदी प्रवाह मार्ग तथा उसके जलग्रहण क्षेत्र के परंपरागत जलमार्गों में अवरोध। मिट्टी और इसकी नमी को अपनी बाजुओं मे ं बांधकर रखने वाली घास व अन्य छोटी वनस्पति का अभाव, वनों का सफाया, वर्षाजल संचयन ढांचो ं की कमी, उनमें गाद की अधिकता तथा उनके पानी को रोककर रखने वाले पालों-बंधो ं का टूटा-फूटा अथवा कमजा ेर होना – ये ऐसे कारण हैं, जो बाढ और सूखा… दोनों का दुष्प्रभाव बढा देते हैं। यदि खनन अनुशासित न हो; मवेशी न हों; मवेशियों के लिए चारा न हो; सूखे की भविष्यवाणी के बावजूद उससे बचाव की तैयारी न की गई हो, तो दुष्प्रभाव का बढना स्वाभाविक है; बढेगा ही। ऐसी स्थिति में सूखा राहत के नाम पर खैरात बांटने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। उसमें भी बंदरबांट हो तो फिर आत्महत्यायें होती ही हैं। ऐसे अनुभवों से देश कई बार गुजर चुका है। गौर करने की बात है कि अकाल पूरे बुंदेलखण्ड मे ं आया, लेकिन आत्महत्यायें वहीं हुईं, जहां खनन ने सारी सीमायें ला ंघी, जंगल का जमकर सफाया हुआ और मवेशी बिना चारा मरे ; बांदा, महोबा और हमीरपुर। इ ंतजार बेकार, तैयारी जरूरी निष्कर्ष स्पष्ट है कि यदि मौसम विभाग ने सूखे की चेतावनी दी है, तो उसका आना तय मानकर उसकी अगवानी की तैयारी करें। तैयारी सात मोर्चों पर करनी है: पानी, अनाज, चारा, ईंधन, खेती, बाजार और सेहत। यदि हमारे पास प्रथम चार का अगले साल का पर्याप्त भंडारण है तो न किसी की ओर ताकने की जरूरत पङेगी और न ही आत्महत्या के हादसे होंगे। खेती, बाजार और सेहत ऐसे मोर्चे हैं, जिन पर महज् कुछ एहतियात की काफी तैयार रखे ं पानी के कटोरे और पौशाला तो आइये, सबसे पहले हम बारिश की हर बूंद को पकङकर धरती के पेट में डालने की कोशिश तेज कर दें। परंपरागत तौर पर ला ेग यही करते थे। इसके लिदो तारीखें तय थीं – कार्तिक में देवउठनी ग्यारस और बैसाख मे ं आखा तीज। ये अबूझ मुहुर्त माने गये हैं। इन दो तारीखों को कोई भी शुभ कार्य बिना पंडित से पूछे भी किया जा सकता हैं। इन तारीखों मे ं खेत भी खाली होते हैं और खेतिहर भी। ये हमारे पारंपरिक जल दिवस हैं। अत: गांव पानी के इंतजाम के लिए इन तारीखों हर वर्ष दो काम अवश्य करता था: देवउठनी ग्यारस को नये जलढांचो ं का निर्माण और अक्षया तृतीया को पुराने ताल की मिट्टी निकालकर पाल पर डाल देना। अक्षय तृतीया का मतलब ही है कि ऐसी तृतीया, जिस दिन किए कार्य का क्षय नहीं हो।गौरतलब है कि स ूखे की अगवानी के तैयारी क्रम का यह सबसे पहला और जरूरी काम है। पानी के पुराने ढांचों की साफ-सफाई, गाद निकासी और टूटी-फूटी पालो ं को दुरुस्त करके ही हम जलसंचयन ढांचो ं की पूरी जलग्रहण क्षमता को बनाये रख सकते हैं। ढांचो ं मे ं हम अधिकतम पानी रोक सके तो सूखे का डर कम सतायेगा ओर बाढ भी उतने वेग से नहीं आयेगी। अक्षया तृतीया से इंसा नही नहीं, मवेशियों के लिए भी प्याऊ-पौशाला लगाने के शुभारंभ का भी रिवाज रहा है। आइये, आज ही शुरुआत करें। जरूरत भर भंडारण जरूरी अभी-अभी गेहूं की फसल कटकर घर आई है। ऐसे खेतिहर परिवार जिनकी आजीविका पूरी तरह खेती पर ही निर्भर है, वे इनका इतना भंडारण अवश्य कर ले ं कि अगली रबी और खरीब..दोनो फसलें कमजोर हों, तो भी खाने के लिए बाजार से खरीदने की मजबूरी सामने न आये। यदि गलती से आप धान का घरेल ु भंडार खाली कर चुके हो ं तो अतिरिक्त मोटे अनाज के बदले चावल ले लें; क्योंकि सूखा पङा तो चावल, के दाम बढेंगे। आलू समेत सभी सब्जियो ं की कीमतें भी बढेंगी, अत: जो सब्जियां सुखाकर उपयोग के लिए संरक्षित की जा सकती हों, संरक्षित कर ले ं। कुल मिलाकर वे अधिक पानी की मांग करने वाली फसला ें के उत्पाद अपनी जरूरत के लिए अवश्य बचा रखें। किंतु इसका मतलब कतई नहीं है कि व्यापारी कमाने के लिए जमाखोरी करें। जमाखोरी और कीमतो ं पर निय ंत्रण बाजार में जमाखोरी और कीमतों की बढोत्तरी को नियंत्रित करना तथा सरकारी स्तर पर भंडारण क्षमता व गुणवत्ता का विकास आने वाली नई सरकार के समक्ष सबसे जरूरी व पहली चुनौती होगी। यह आसान नहीं होगा। यदि वह यह कर सकी तो बधाई का पात्र बनेगी; नहीं उसके पक्ष की लहर का खिलाफ मे ं बदलते ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। भ ंडारण व प्रसंस्करण क्षमता का विस्तार गौरतलब है कि भंडारण गृहों मे ं 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और शीतगृहों मे ं विशेष कर्ज व छूट योजनााओं के बावजूद कोई विशेष प्रगति देखने को नहीं मिल रही है। गोदामों में अनाजों की बर्बादी के नजारे आज भी आम हैं। भारत मे ं सब्जी तथा फल उत्पादन की 40 प्रतिशत मात्रा महज् स्थानीय स्तर पर उचित भंडारण तथा प्रसंस्करण सुविधााओ ं के अभाव में नष्ट हो जाती है। इसका पुख्ता स्थानीय रोजगार व आर्थि स्वावलंबन का विकास तो होगा ही, सूखे के नजरिये से भी इस मोर्चे पर पहल सार्थक होगी। चारे और ईंधन का अतिरिक्त इंतजाम सूखे का अन्य पहलू यह है कि सूखा पङने पर भूख और प्यास के कारण
सबसे पहले मौत मवेशियों की होती है। पीने के पानी और चारे के इंतजाम से मवेशियों का जीवन का तो बचेगा ही, उनके दूध से हमारी पौष्टिकता की भी रक्षा होगी। इसी तरर्ह इंधन का पूर्व इंतजाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं। र्कइ ऐसे झाङ-झंखाङ, पत्ती व घास, जिन्हे हम बेकार समझकर अक्सर जलाया दिया करते हैं; उन्हे सुखाकर चारे और ईंधन के रूप मे ं स ंजोने का काम अभी समझदार करे ं फसल चक्र मे ं बदलावइसी क्रम में एक जरूरी एहतियात खेती के संदर्भ में है। चेतावनी है कि वर्षा कम होगी। हो सकता है इतनी कम हो कि फसल ही सूख जाये या फूल.. फल में बदलने से पहले ही मर जाये। क्या यह समझदारी नहीं कि ऐसे में मैं गन्ना-धान जैसी अधिक पानी वाली फसल की बजाय कम पानी वाली फसला ें को प्राथमिकता दूं ? मोटे अनाज, दलहन और तिलहन की फसलें बोऊं ? यदि पानी वाली फसलें बोनी ही पङे तो ऐसे बीजो ं का चयन करूं,
जिनकी फसल कम दिनों में तैयार होती हो ? खेती के साथ बागवानी का प्रयोग करुं ? वैज्ञानिक कहते हैं कि फसल चक्र में अनुकूल की बदलाव की तैयारी जरूरी है। यह समझदारी होगी।इसके अलावा हमें चाहिए कि हम सब्जी, मसाल े, फूल व औषधि आदि की खेती को तेज धूप से बचाने के लिए लिए पॉलीहाउस, ग्रीन हाउस आदि की सुविधा का लाभ लें। खेत मे ं नमी बचाकर रखने के लिए जैविक खाद तथा मल्चिंग जैसे तौर-तरीको ं का जमकर इस्तेमाल करें। कृषि, बागवानी, भूजल,
भंडारण, प्रसंस्करण तथा गृह आदि विभागों को भी चाहिए कि संबंधित तैयारियोंमे जिम्मेदारी के साथ सहयोगी बने।
काम आयेगी सेहत में सतर्कता सूखा पङने पर मौसम और मिट्टी की नमी में आई कमी सिर्फ खेती को ही चुनौती नहीं देती, हमारी सेहत को भी चुनौती देती है। अत: एहतियाती कदम उठाने के लिए स्वास्थ्य विभाग के अलावा सतर्क तो हमे ं भी होना ही पङेगा। भूलें नहीं कि दूरदृष्टि ला ेग आपदा आने पर न चीखते हैं और न चिल्लाते हैं; बस! एक दीप जलाते हैं। समय पूर्व की तैयारी एक ऐसा ही दीप है। आइये, प्रज्जवलित करें।

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