हाथ या पैरों में फ्रैक्चर की दशा में अब बड़ा ऑपरेशन
की जरुरत नहीं है। महीन सुराख से ऑपरेशन कर
इम्प्लांट लगाए जा सकते हैं। चिकित्सा विज्ञान में इसे
मिनिमल इनवेसिव सर्जरी कहा जाता है। सीतापुर रोड
स्थित पुरनिया चौराहे के पास सुश्रुत हॉस्पिटल एंड
ट्रॉमा सेंटर में हड्डी से जुड़ी बीमारियों का इलाज
मुहैया कराया जा रहा है। अस्पताल के प्रमुख व हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. अनुप
अग्रवाल ने बताया कि दुघर्टना में हड्डी कई जगह से
टूट जाती हैं। प्लास्टर चढ़ाने पर भी हड्डियां नहीं
जुड़ती। ऑपरेशन करने की जरुरत पड़ती है। अभी तक
बड़ा चीरा लगाकर रॉड, प्लेट प्रत्यारोपित की जाती थी।
इसकी वजह से घाव लंबे तक बना रहता था। हड्डियां
भी देर से जुड़ती थी। क्योंकि रॉड, प्लेट आदि
प्रत्यारोपित करने पर आस-पास की मांसपेसियों को
नुकसान पहुंचता है। महीन सुराख से प्लेट व रॉड
लगाना आसान हो गया है। इसे बायोलॉजिकल फिक्ससेशन
कहा जाता है। उसकी सफलता दर बढ़ गई है। इस
तकनीक से ऑपरेशन करने पर मरीज को बामुश्किल चार
से पांच दिन में काम करने लगता है।
dr anoopएंटीबायोटिक हुई कम
घाव कम होने पर मरीजों को कम दवाएं खानी पड़ती है।
मरीजों को एंटीबायोटिक दवाएं भी कम देने की जरुरत
पड़ती है। डॉ. अनूप अग्रवाल के मुताबिक बड़ा चीरे
में घाव को संक्रमण से बचाने के लिए कई तरह की
एंटीबायोटिक दवा देने की जरुरत पड़ती थी। इसमें काफी
कमी आई है।
ये भी हैं फायदे
-संक्रमण के खतरे की आशंका कम
-अस्पताल से दो दिन में छुट्टी
-ऑपरेशन के दौरान खून का रिसाव कम
-जल्द घाव ठीक होने की संभावना।
अस्पताल एक नजर में
सुश्रुत हॉस्पिटल में 25 बेड हैं। इसमें न्यूरो, हड्डी,
गेस्ट्रो और एडवांस लैप्रोस्कोपिक सर्जरी की सुविधा है।
स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग का संचालन भी हो रहा है।
इसमें डॉ. अनुराधा सिजेरियन और सामान्य प्रसव के
अलावा लैप्रोस्कोपिक सर्जरी भी कर रही हैं।
साभार: रजनीश रस्तोगी

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