केशव प्रसाद मौर्य
भगवान राम के आशीर्वाद से शिलान्यास का यह अवसर यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिला है जो शिव की नगरी काशी के प्रतिनिधि हैं। वह लालकृष्ण आडवाणी की 1990 में रथयात्रा के सारथी भी थे। मोदी जी को न समझने वाले मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राजनीतिक गलियारों में यह अनर्गल चर्चा छेड़ते थे कि मोदी जी अयोध्या नहीं गए। राम को भूल गए। यह वे लोग थे जो अपने को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं। मेरा मत है कि मोदी जी का संकल्प रहा होगा कि वह शिलान्यास के गवाह बनना चाहेंगे और अब शिलान्यास ही उनके हाथों हो रहा है। अब मोदी जी का अयोध्या जाने का फ़ैसला हो गया तो वही कथित धर्मनिरपेक्ष फिर मीनमेख निकालकर सलाह दे रहे हैं कि मोदी को शिलान्यास से दूर रहना चाहिए। यह वह लोग हैं जो भारत की अंतर्धारा से अनजान हैं। रामसेतु को काल्पनिक मानने वाली कांग्रेस की समस्या है कि मोदी को अयोध्या इसलिए नहीं जाना चाहिए क्योंकि पंडित जवाहरलाल नेहरु भी सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में नहीं गए थे। लेकिन वह यह नहीं बताती कि नेहरू तो सोमनाथ मंदिर के निर्माण के ही ख़िलाफ़ थे। उनकी धर्मनिरपेक्ष अचकन आड़े आ रही थी। वह यह नहीं बताती कि नेहरू के सख़्त एतराज के बावजूद पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा पूजा की। आज़ादी मिलने व जूनागढ़ की रियासत का भारत में विलय होने पर जब सरदार पटेल की पहल पर प्रखर विद्वान डा. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के नेतृत्व में सोमनाथ मंदिर के निर्माण का फ़ैसला हुआ था, लेकिन पटेल और फिर गांधी के गुजरने के बाद पंडित नेहरू ने मंदिर निर्माण को लटकाने की कोशिश की, लेकिन संविधान विशेषज्ञ और संस्कृति व सभ्यता के महान पोषक मुंशी के संकल्प के कारण ही मंदिर का निर्माण हो सका। मंदिर निर्माण को लेकर वह चट्टान की तरह नेहरू के सामने खड़े थे। नेहरू को भरने वाले उनके दोस्त तबके शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम थे जो नहीं चाहते थे कि मंदिर का निर्माण हो। वह इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को देने की वकालत कर यह साबित करने की फ़िराक़ में थे कि ऐसा होने पर हिंदू हीन भावना से ग्रसित रहेंगे। होना यह चाहिए था कि सोमनाथ मंदिर के साथ अयोध्या, मथुरा और काशी में मंदिर निर्माण का फ़ैसला हो जाता तो आज देश की तस्वीर कुछ और होती। इसलिए नेहरू और मोदी में फ़र्क़ है। कांग्रेस की छाया यानी एनसीपी के वरिष्ठ नेता शरद पवार ने कोरोना की आड़ में मोदी जी के अयोध्या जाने पर सवाल उठाया जिससे उनकी राजनीतिक समझ पर ही संदेह होता है।
दरअसल, अयोध्या के कारण पिछली सदी के आख़िरी दशक से अब तक देश तमाम अद्भुत योग का गवाह रहा है। लेकिन 2014 से उसने ऐसी करवट ली कि राजनीति की मुख्य धारा ही बदल गई है। इस बदलती राजनीति में यह भी विचित्र योग है कि मोदी जी की जन्मभूमि वह गुजरात है जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने साढ़े पांच हज़ार साल पहले मथुरा से जाकर अपनी कर्मभूमि बनाया था। द्वारिका में अपना ठिकाना बनाकर स्थापित कर उन्होंने साबित किया कि भारतवर्ष की मुख्यधारा द्वारिका से निकलती है, इंद्रप्रस्थ से नहीं। महाभारत युद्ध में इंद्रप्रस्थ आए और युद्ध के बाद धर्म सत्ता स्थापना करने के बाद द्वारिका लौट गए। उसकी गुजरात ने महात्मा गांधी और सरदार पटेल को दिया जो आज़ादी की लड़ाई के ठोस वाहक बने। देवताओं के आशीर्वाद से उसी गुजरात से नरेंद्र मोदी जी उत्तर प्रदेश में भगवान शंकर की नगरी काशी आए और 2014 में पहला लोकसभा चुनाव लड़ा व जीता और सीधे प्रधानमंत्री बने। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद भवन की चौखट पर माथा टेककर उन्होंने संकेत दिया कि व्यवस्था बदलने आए हैं। 2019 में दूसरी बार लोकसभा चुनाव जीतकर उन्होंने संविधान के प्रति पर माथा टेका और क़ानून के ज़रिए कश्मीर, तीन तलाक़ और नागरिकता क़ानून को दुरुस्त किया।
ख़ैर, संसद भवन की सीढ़ियों पर माथा टेकने के बाद छह साल बाद अब शिलान्यास का अवसर आया हो लेकिन राम के प्रति भाजपा की निष्ठा में कभी रत्ती भर कमी नहीं आई। इस काल में मोदी जी की अगुवाई में राजग सरकार ने भगवान राम के चरित्र को संबल मानकर ही शासन किया। राम का चरित्र सदा प्रासंगिक है। कालातीत है। सामाजिक सरोकारों के जिन मानदंडों का भगवान राम ने स्थापित किया था, उसको मोदी जी ने बढ़ाया है। प्रयागराज कुंभ संपन्न होने के बाद मोदी ने सफ़ाई कर्मचारियों के पैरों को धोकर उनका जो सम्मान किया, वह समकालीन राजनीति में दिखाई नहीं पड़ता। यह भावपूर्ण दृश्य भगवान राम और निशादराज की भेंट याद दिलाता था। उनका स्वच्छता मिशन जिसकी खिल्ली उड़ती थी, उसको लेकर बच्चे-बूढ़े सब गंभीर हैं। जनता का उनमें अटूट भरोसा है क्योंकि केंद्र सरकार की नीतियां गरीबोन्मुखी रही हैं। राम मंदिर भाजपा का अगर संकल्प रहा तो ग़रीबी की कल्याणकारी योजनाएं उसका मिशन। अंत्योदय यानी समाज के आख़िरी पंक्ति पर खड़े व्यक्ति की चिंता करना और उसके चेहरे पर मुस्कान लाना राजग सरकार का धर्म है। यही कारण है कि मोदी जी कहते हैं कि भाजपा चंद सालों के लिए नहीं बल्कि लंबे काल के लिए शासन के लिए आई है और ग़रीबों का कल्याण उसका बीज मंत्र है। इसी कड़ी में ‘वन नेशन-वन राशनकार्ड’का एलान किया ताकि कोई भूखा न रहे और देश में कहीं पर हो, उसको राशन की सहूलियत रहे। शुष्क बौद्धिकवाद से परे यह जीवंत व आत्मिक भारतीय समाज का ही सामर्थ्य है कि कोरोना काल में लाखों श्रमिकों ने इधर से उधर से पलायन किया, लेकिन किसी ने भूख का कारण अपना जीवन नहीं खोया। समाज और सरकार ने उनकी चिंता की। इसे ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना का विस्तार कर छठ पूजा तक किया है और तब तक आर्थिक रूप से तंग लोगों को मुफ़्त राशन दिया जाएगा जिससे क़रीब 80 करोड़ लोगों को फायदा मिलेगा। इस योजना पर क़रीब 90 हज़ार करोड़ रूपये खर्च होंगे।
यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारत के चित्त, मानस व काल में राम और राष्ट्र एक-दूसरे के पूरक हैं। इनकी सुरक्षा सबसे अहम है। मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले छह साल से देश चैन में है और कोई बम धमाका नहीं हुआ। आतंकी गतिविधियों से निजात मिली।सरकार ने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से गुवाहाटी तक देश को भरोसा दिलाया कि आतंकवाद के दिन लद गए। वहीं रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया अभियान में अभूतपूर्व प्रगति हासिल हुई है। आत्मनिर्भरता भी सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण कवच है। इस मामले में ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ का नारा देकर प्रधानमंत्री जी ने एक अभूतपूर्व पहल की है। कोरोना संकट पर उन्होंने कहा कि इस संकट को अवसर में बदलना है। आत्मनिर्भर भारत अभियान का प्रयोग चौतरफ़ा है। इसके तहत प्रधानमंत्री ने मई में 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज का ऐलान किया। इसके तहत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के लिए सरकार ने 16 योजनाएं लागू की हैं। इस क्षेत्र में 30 लाख इकाइयों के लिए आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना के तहत 1.10 करोड़ रुपये स्वीकृत भी किए जा चुके हैं। गरीब कल्याण योजना के तहत 1.70 लाख करोड़ रुपये का बंदोबस्त किया गया। मनरेगा के तहत रोज़गार बढ़ाने के लिए 40 हज़ार करोड़ रूपये की अतिरिक्त राशि देने की व्यवस्था की गई। जनधन योजना में महिलाओं के खातों में पांच सौ-पांच सौ रूपये की तीन किस्तें जमा की जा चुकी हैं। खाद्य प्रसंस्करण के तहत 35 हज़ार करोड़ रूपये के निवेश से 9 लाख कुशल व अर्द्ध कुशल रोज़गार सृजन का मोटा अनुमान है। किसानों को लागत मूल्य का कम से कम डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का निर्णय लेकर स्वामीनाथन की रपट स्वीकार कर ली है। कहा जा सकता है कि राम और रोटी के बीच प्रधानमंत्री मोदी जी एक सेतु की तरह हैं और जिन पर देश की एक सौ पच्चीस करोड़ जनता को पूरा भरोसा है। हरेक नागरिक को पूरा भरोसा है कि राम मंदिर के निर्माण होने तक सबके पास अपना मकान होगा और हरेक चूल्हा दोनों वक्त जलेगा क्योंकि लोगों को राम भी चाहिए और रोटी भी! मोदी जी की सरकार उसी दिशा में आगे बढ़ रही है।

(लेखक उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं)

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