लखनऊ। पुलिस आयुक्त कार्यालय में एसीपी क्राइम एवं क्राइम अगेंस्ट वूमेन श्वेता श्रीवास्तव ने मदर्स डे पर अपनी मां को नमन करते हुए कहा मेरी मां ने ना सिर्फ मेरी बल्कि मेरी बेटी की भी जिम्मेदारी निभा रखी है। उन्हीं के कारण मैं अपनी सभी ड्यूटी को निष्ठा पूर्वक संपादित कर पा रहे हैं। उनके बिना पुलिस ड्यूटी में शत-प्रतिशत दे पाना संभव नहीं था। उन्होंने कहा कि मेरा बेटा आजकल मेरे साथ नहीं रहता। कोविड-19 की वजह से घर पर नहीं रहते हैं। घर पर जाकर उससे मुलाकात होती है और दूर से उसको देख लेती हूं। ड्यूटी का पालन करना उनकी प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि हम कोरोना महामारी के सभी प्रिकॉशन ले रहे हैं। सभी को जागरूक कर रहे हैं। वही प्रिकॉशन अपने लिए भी लेते हैं। कार्य की अधिकता के कारण हम अपनी थोड़ी लापरवाही कर जाते हैं। लेकिन हम हर संभव प्रयास करते हैं कि लोगों को जागरूक करने के साथ जनता की सुरक्षा, कानून व्यवस्था का पालन करना और करवाना साथ ही अपनी भी सुरक्षा करें। उन्होंने कहा परिवार का साथ हो तो हर चीज मैनेज हो जाती है। पुलिस परिवार के साथ बच्चों को देखना परिवार को देखना काफी चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने मदर्स डे पर सभी को यही संदेश देते हुए कहा कि मृत्यु के कई रास्ते हैं लेकिन जन्म देने का सिर्फ एक ही रास्ता वह है मां। आज के दिन ही नहीं हर दिन अपनी मां का सम्मान करें। अपनी मां को कभी अनुभव ना होने दें कि वह अलग हैं, अलग-थलग पड़ी हैं उनके लिए आपके पास सम्मान ही उनका सबकुछ है। बता दें कि एसीपी स्वेता श्रीवास्तव का पैतृक गांव देवरिया जिला में है लेकिन उनका जन्म और पढाई लिखाई लखनऊ में हुई है। उनके परिवार में पिता वीके श्रीवास्तव, माँ श्रीमती अजय श्रीवास्तव, पति अभिनय सिन्हा, भाई मानस श्रीवास्तव और बेटा नामिष कृष्णा है।

मां एक अनुभूति, एक विश्वास, एक रिश्ता नितांत अपना सा। गर्भ में अबोली नाजुक आहट से लेकर नवागत के गुलाबी अवतरण तक, मासूम किलकारियों से लेकर कड़वे निर्मम बोलों तक, आंगन की फुदकन से लेकर नीड़ से सरसराते हुए उड़ जाने तक, मां मातृत्व की कितनी परिभाषाएं रचती है। स्नेह, त्याग, उदारता और सहनशीलता के कितने प्रतिमान गढ़ती है? कौन देखता है? कौन गिनता है भला? और कैसे गिने? ऋण, आभार, कृतज्ञता जैसे शब्दों से परायों को नवाजा जाता है। मां तो अपनी होती है, बहुत अपनी सी। हम स्वयं जिसका अंश हैं, उसका ऋण कैसे चुकाएं। कितनी बार नन्ही लातें उस पर चलाईं? कितनी बार आपने क्या-क्या तोड़ा, बिखेरा और उसने समेटा। कितनी मिन्नतों के बाद किसी चूजे की भांति आप चार चावल दाने चुगते थे और आपकी भूख से वह अकुला उठती थी। क्या याद है आपको वह सुहानी संध्या जब दीया-बाती के समय मंत्र, श्लोक और स्तुतियों के माध्यम से आपकी सुकोमल हृदय धरा पर वह संस्कार और सभ्यता के बीज रोपा करती थी। नहीं भूले होंगे आप वे फरमाइशें और नखरे जिन्हें वह पलकों पर उठाया करती थी। दाल-चावल से लेकर मटर पुलाव तक, अजवाइन डली नमकीन पूरी से लेकर मैथी-पराठे तक, मलाईदार श्रीखंड से लेकर पूरनपोली तक और कुरकुरी भिंडी से लेकर भुट्‍टे के किस तक कितने प्यार में पके रसीले व्यंजन हैं जो मां के सिवा किसी और की स्मृति दिला ही नहीं सकते। माँ की ममता को कोई भी कम नहीं कर सकता माँ खुद एक देवी का स्वरुप है।

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