कमलेश श्रीवास्तव

लखनऊ की शान रहे पूर्व मेयर व पदमश्री डा एससी राय की पुण्यतिथि पर उन्हें शत शत नमन
आज लखनऊ की शान रहे पदमश्री डा एससी राय की पुण्यतिथि है। राजधानी के दस साल मेयर रहने वाले डा राय जितना भाजपा में लोकप्रिय थे उतने ही अन्य दलों में भी। आज उनकी पुण्यतिथि उनकी ही पार्टी यानी भाजपा के लोगों को ही याद नहीं रही। पदमश्री डा एससी राय राजधानी से सीधे जनता द्वारा चुने जाने वाले पहले मेयर थे। राजधानी के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहली पसंद हमेशा से डॉक्टर एस सी राय ही हुआ करते थे। उनसे अंतिम बार विस्तार से जो बात हुई थी उस पोस्ट को मैं वैसे का वैसे ही डाल रहा हूं। उनका रिश्तेदार होने और उनका लम्बा सानिध्य पाने का मुझे सदैव गर्व रहेगा।
दस साल मेयर रहने व दो दशक से भी अधिक समय तक राजनीति में रहने वाला यह शख्स इतना बेदाग था कि कोई बुराई खोजे ना मिली किसी को। हिन्दू धर्म में मान्यता है कि शालिग्राम की बटिया (पत्थर का गोल टुकड़ा) कहीं भी किसी भी जगह रख दो वह अपवित्र नहीं होती। यही हाल डॉ. राय का था । राजनीति के दलदल में भी वह पाक साफ यानी पवित्र रहे। अभी कुछ दिन पहले उनसे मुलाकात हुई। करीब दो घंटे बात भी हुई। राजनीति में जब जिक्र चला तो उनके मुंह से किसी के लिए कोई शिकायत नहीं निकली। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, चन्द्रशेखर, वीपी सिंह, चौधरी चरण सिंह के पंसदीदा चिकित्सकों में एक रहे डॉ. राय के पास इन लोगों से जुड़ी स्मृतियों का खजाना था। राजनीति में अटल जी को अपना आदर्श मानने वाले डा. राय को चौधरी चरण सिंह का अपनापन याद था। किस प्रकार अपने प्रधानमंत्री आवास पर बुलाना और हाथ पकड़ कर स्वयं घर के अंदर ले जाना सब याद है। एक पूर्व मुख्यमंत्री की जिद का भी जिक्र करते हुए कहा कि यह मुख्यमंत्री अपने घर पर ही ऑपरेशन थिएटर बनवाकर उनसे ऑपरेशन करवाना चाहते थे लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था। रामप्रकाश गुप्त और राजनाथ सिंह के सहयोग और सपा मुखिया व पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से मिले अपनेपन से वह हमेशा अभिभूत रहे। रामप्रकाश गुप्त जब मध्य प्रदेश के राज्यपाल बने तब डॉ. राय को राजभवन में मेहमान के तौर पर बुलाया था। कुछ दिन पहले जब वह बीमार थे तब गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने घर आ कर उनसे कुशल क्षेम पूछी थी। राजनाथ सिंह उनके स्वास्थ्य के बारे में समय समय पर जानकारी लेते रहे हैं। मैने जब पूछा कि आपने तीसरी बार मेयर का चुनाव क्यों नहीं लड़ा तो वह बोले कि नए लोगों को मौका देना चाहिए। इसबार मेयर के रूप आपकी नजर में कौन सबसे बेहतर है इस पर उन्होंने कहा था कि पूर्व नगर आयुक्त दिवाकर त्रिपाठी राजनीति में उतरते हैं तो वह लखनऊ के मेयर के रूप में अच्छा विकल्प होंगे। अभी सिर्फ चर्चा है बाकी भाजपा हाईकमान तय करेगा। लखनऊ को दिवाकर त्रिपाठी ने बहुत करीब से समझा है और अपने कार्यकाल का बड़ा हिस्सा यहां बिताया है। फिर आज के दौर की राजनीति पर और अटल जी पर पूछे जाने पर इतना कहा कि अटल और लखनऊ को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी का डॉ. राय के घर आना और उनसे गर्मजोशी से मिलना बतियाना सब डॉ. राय की स्मृतियों में कैद था। उस दिन क्या पता था कि यह बातचीत उनसे आखिरी बातचीत होगी। उनसे अध्यात्म जैसे गूढ़ विषय पर भी चर्चा की जा सकती थी तो बॉलीवुड के पुराने किस्से भी खूब चाव से सुनाते थे। उनके पास वेद पुराण साहित्य सम्बन्धी किताबों का अद्भुत कलेक्शन था। किताबों वाली अलमारी की चाभी वह भले किसी को न दें पर मुझे वह आसानी से मिल जाती। सार्वजनिक मंच से उनके द्वारा मेरा नाम लेना मुझे बहुत अच्छा लगता था। मेरी निजी समस्या के बारे में कितनी भी भीड़ में हो जरूर पूछते थे। मेरे संघर्ष को उन्होंने देखा था। हमेशा मेरा हौसला बढ़ाते कहते तुम अच्छा कर रहे हो इसे बनाए रखना। कम लोगों को ही जानकारी होगी डॉ. राय की पहल पर ही लखनऊ में वर्ष 1998 में कूड़े से बिजली बनाने वाली परियोजना की शुरूआत हुई थी। गोमती तट पर लक्ष्मण मेला की शुरूआत भी उन्होंने की थी।
उन्होंने अपनों के दंश भी कम नहीं झेले। भाजपा की सरकार में उन्हें अपनों से दर्द मिले लेकिन कभी भी सार्वजनिक शिकायत नहीं की। उनके विकास कार्यों व अच्छी पहल में भाजपा के ही बड़े लोग अड़ंगे डालते थे लेकिन वह बयानबाजी कभी न करते। अपनी पुस्तक सर्जन से सृजन तक में उन्होंने राजनीति के अलावा एक चिकित्सक के रूप में कई दिग्गज हस्तियों से जुड़ी स्मृतियां साझा की हैं। बचपन से अब तक अपनी परिजनों के बीच हर बात पर एक बार उनका जिक्र जरूर आता था। मेरी माता जी के वह फूफा थे। वह हमारे नाना थे। बात सादगी हो या फिर आदर्श की हम सबके आईडियल थे वह। इतना सरल इनसान मैने न देखा था। घर के हर छोटे छोटे से पर्व में समय निकाल कर वह जरूर आते। उनकी सादगी को मैने अपनी आंखों से देखा है। पहली बार मेयर चुने के बाद अपनी व्यस्ततम दिनचर्या में भी उनके पास सभी के लिए समय होता था। स्वयं अपने कपड़े धोना अपने जूतों पर पालिश करना प्रेस करना जैसे कार्य वह खुद करते। राजधानी का पहला नागरिक होने का गर्व उन्हें छू कर भी न गुजरा था। रिक्शेवाला हो या खोमचे वाला डॉ. राय के घर से कोई खाली हाथ नहीं जाता था। जनसमस्या सुनते सुनते वह सामने वाला यदि बीमार होता था तो उसके उपचार में लग जाते थे। बीते छह सालों से कैंसर का दर्द दबाए वह दूसरों का दर्द बांट रहे थे। मोहल्ले वालों के डॉ. राय डाक्टर बिरादरी में बेहद प्रतिष्ठित नाम था। पद्म पुरस्कार से सम्मानित डॉ. राय के अंतिम समय में केजीएमयू के कुलपति प्रो.रविकांत थे। केजीएमयू उनकी जिंदगी का एक अटूट हिस्सा था जहां पढ़े और फिर पढ़ाया। आज डॉ. राय नहीं है तो लखनऊ उनके बगैर सूना लगता है।

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