swami-vivekananda-52562752a8cdf_exlबचपन से ही सच को अपना अचूक शस्त्र मानने वाले बालक नरेन्द्र ने स्वामी विवेकानन्द बन दुनिया को नई राह दिखाई…
अरे नरेन्द्र… फिर से बताओ… क्या हुआ था.. ऐसा भी होता है। हां.. सच की राह पर चलने वालों की अंत में जीत होती है। गोवर्धन…बोला हमें फिर से सुनना है पूरा किस्सा.. विष्णु बोला कहानी सचमुच प्रेरणा देने वाली है… अरे कक्षा में गुरु जी आ गए तो.. अरे नहीं… हमें पता चल जाएगा… नरेन्द्र की कहानी की कक्षा में इतने रम गए कि उन्हें अपने गुरु जी के आने और उनके पढ़ाने का आभास तक नहीं हुआ। गुरु जी के कक्षा में पढ़ाये जा रहे पाठ पर किसी का ध्यान न था। कहानी और किस्सों को याद कर बच्चों में अभी भी बातें चल रही थी।
इस पर गुरु जी को गुस्सा आ गया और उन्होंने कक्षा में पढ़ाए जा रहे पाठ के बारे में सब बच्चों से बारी बारी पूछा कोई सही जवाब नहीं दे पाया। फिर नरेन्द्र की बारी आई तो उन्होंने न सिर्फ पाठ के बारे में बताया बल्कि गुरु जी जो आगे बताने वाले थे उसके बारे में भी बता दिया। गुरुजी ने नरेन्द्र की प्रशंसा की और सारे बच्चों को अपनी सीट पर खड़ा करने का दण्ड सुना दिया। नरेन्द्र भी जब बच्चों के साथ अपनी सीट पर खड़े हो गए तो गुरु जी ने पूछा… नरेन्द्र तुम क्यों खड़े हो गए। यह सब मेरे कारण अपने पाठ पर ध्यान नहीं लगा पाए इन्हें मैं ही कहानी सुना रहा था। इतना सुनते ही गुरु जी का गुस्सा उतर गया। नरेन्द्र स्वामी विवेकानन्द के नाम से विश्वविख्यात हुए और बच्चों ही नहीं युवाओं ने इन्हें अपना आदर्श माना। स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। पिता विश्वनाथ दत्त हाईकोर्ट के प्रसिद्ध वकील थे। वे नरेन्द्र को पश्चिमी संस्कृति में ढालना चाहते थे किन्तु नरेन्द्र बचपन से ही ईश्वर व ज्ञान की खोज में लगे थे। ईश्वरीय शक्ति को प्राप्त करने के लिए उन्हें रामकृष्ण परमहंस जैसा गुरू मिल गया था जिसने नरेन्द्र को स्वामी विवेकानन्द बनाया। जब तक बच्चे व युवा पवित्र होकर अपने उद्ïदेश्य पर डटे रहेंगे तब तक वे कभी असफल नहीं होंगे। स्वामी विवेकानन्द ने सरल मानवीय जीवन पर जोर दिया और जातिविहीन समाज की परिकल्पना भी प्रस्तुत की।
पूजा कौशिक

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