देहली गैंग रेप कांड पर लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष डॉ. ओंकार भारती बाबा के विचार
16 दिसम्बर 2012 को अनामिका के साथ चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म हुआ। अनामिका के साथ उसका मित्र भी था, जिसने विरोध किया तो बलात्कारियों ने उसे मार-मारकर अधमरा कर दिया और दोनों को निर्वस्त्र कर बस से बाहर फेंक दिया और मरने के लिए छोड़ दिया। अनामिका के साथ बलात्कारियों ने सामूहिक बलात्कार करने के बाद नृशंसतापूर्वक उसकी मृत्यु सुनिश्चित कर दी। बाद में लोगों ने देखा और अस्पताल पहुंचाया।
इस घटना के बाद राजधानी दिल्ली का युवक सड़कों पर उतर आया। सारे देश के सभ्य समाज ने गहरा दुख महसूस किया। राजधानी दिल्ली में युवा आंदोलनकारी इंडिया गेट पर पहुंचने लगे और भारत सरकार तथा दिल्ली सरकार से शांतिपूर्वक न्याय की गुहार लगाने लगे। मांग सिर्फ इतनी थी कि दोषियों को पकड़ा जाए और कड़ी सजा से दंडित किया जाए। तथा अपनी बात कहने के लिए उन्हें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एंव शीला दीक्षित से बात करने का मौका दिया जाए ताकि सरकार भविष्य में महिलाओं की सुरक्षा हेतु आवश्यक कदम उठाए। परंतु सरकार ने युवा आंदोलनकारियों को भारी पुलिस लगाकर रोक दिया तथा आंदोलनकारियों से मिलने की आवश्यकता ही नहीं समझी। युवा आंदोलकारी शांति पूर्ण ढंग से राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री से मिलने की मांग करते रहे और राष्ट्रपति भवन में घुसने का प्रयास करने लगे। परंतु पुलिस ने बल प्रयोग द्वारा उन्हें पीछे धकेल दिया।
22 और 23 दिसम्बर 2012 को भारत वर्ष के करोड़ों लोगों ने टेलीविजन के माध्यम से देखा कि कैसे सरकार, दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स ने युवाओं और महिलाओं को नृशंसतापूर्वक आंसू, गैस, वॉटर कैनन और लाठियों द्वारा पीटा। उस दिन दिल्ली का तापमान 5 डिग्री सेंटीग्रेट था। सैकड़ों आंदोलनकारी गम्भीर चोटों का शिकार हुए।
आखिरकार पानी जब सिर से ऊपर जाता लगने लगा तो सरकार की संवेदना जाग उठी। प्रधानमंत्री और महामहिम राष्ट्रपति तथा कई अन्य नेताओं ने कहा गुस्सा जायज है लेकिन हिंसा न करें। अगर सरकार 17 दिसम्बर को ही सक्रिय हो जाती तो शायद दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल सुभाष चंद्र तोमर की जान बच जाती। इतना ही नहीं सैकड़ों महिलाएं और युवा भी घायल न होते। सरकार को जनरल वीके सिंह और स्वामी रामदेव को दंगा भड़काने के आरोप में आरोपित न करना पड़ता तथा सुभाष चंद्र तोमर की असामायिक मृत्यु का ठीकरा अरविंद केजरीवाल के सहयोगी पर न मढऩा पड़ता।
जबकि वास्तव में कांस्टेबिल सुभाष चंद्र तोमर प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक स्वयं गिर पड़े थे। आंदोलनकारियों में से कुछ लोगों ने प्राथमिक उपचार का प्रयास भी किया और अस्पताल पहुंचाने में अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। लेकिन सवाल यह है कि इसका जिम्मेदार कौन है? भारत सरकार के मुखिया जो अपने छोटे से बयान द्वारा अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं या दिल्ली सरकार जहां कांग्रेस पार्टी की ही मुख्यमंत्री हैं और महिला हैं। कुल मिलाकर तो सरकार के अंहकार की पराकाष्ठा और भारतीय युवा आंदोलनकारियों की विवशता के सिवा कुछ और नहीं है। ‘जबरा मारै रोवै न देयÓ वाली कहावत चरितार्थ होती है।
महाभारत काल में हस्तिनापुर के महत्वाकांक्षी शासकों द्वारा भरी सभा में द्रोपदी की चीरहरण करना तत्कालीन राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था की पोल खोलता है पर आज हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक संविधान के मालिक हैं, परंतु फिर भी असुरक्षित हैं। हजारों साल बीत जाने के बाद भी दुष्कर्म और चीर-हरण की मानसिकता का संक्रमण आज भी फल-फूल रहा है। इसकी पुष्टि प्राचीन हस्तिनापुर और आज के आधुनिक दिल्ली के महामहिम माननीय प्रणब मुखर्जी के सुपुत्र जो भारतीय संसद में माननीय सांसद हैं ने 27 दिसम्बर 2012 को जिम्मेदारीपूर्वक बयान देकर अपने सुविचार सार्वजानिक व्यक्त कर दिए हैं। क्या सभ्यता के नाम पर हम सभ्यता का ढोंग कर रहे हैं?
दिनांक 25 दिसम्बर, 2012 को जब पूरे भारतवर्ष का सभ्य समाज अनामिका बलात्कार कांड की वेदना से व्यथित था। उसी वक्त बरेली के एक छात्रनेता ने चलती सड़क से एक लड़की को अपनी गाड़ी में बिठाने का प्रयास किया। लड़की किसी तरह भागकर एक दुकान में घुस गई। जहां कुछ लोगों ने आगे आकर उसकी इज्जत को तार-तार होने से बचा लिया।
15 अगस्त 2012 से ठीक दो-चार दिन पहले जब भारत सरकार स्वतंत्रता दिवस की तैयारी कर रही थी और अपने सुशासन से झंडा फहराने वाली थी, भारतवर्ष की आर्थिक राजधानी मुम्बई में सिक्योरिटी गार्ड द्वारा युवा महिला वकील पल्लवी पुरकायस्थ के साथ उसी के घर में दुष्कर्म कर प्रयास किया गया। और विरोध करने पर पल्लवी की नृशंक हत्या कर दी गई। वकील पल्लवी की हत्या के ठीक एक दिन पहले दिल्ली जल बोर्ड की कर्मचारी युवती के साथ आगरा हाईवे पर सामूहिक दुष्कर्म किया गया।
महिला समाज छेडख़ानी, दुष्कर्म तथा यौन उत्पीडऩ के भय से मुक्त नहीं हो पा रहा है। और तो और अबोध बच्चे निरंतर इसका शिकार हो रहे हैं। तमाम ऐसे मामले जिसमें पीडि़त पक्ष शर्मिंदगी से बचने के लिए चुप्पी साध लेता है या भय से चुप हो जाता है। गीतिका शर्मा की आत्महत्या भय और मजबूरी का ही परिणाम है। अधिकतर मामलों में दुष्कर्मीं पैसे और पहुंच के बल पर बड़ी बेशर्मी से मामले की लीपा-पोती करने में कामयाब
रहते हैं।
समस्त भारत वर्ष में बलात्कार की दिल दहलाने वाली घटनाएं होती रहती हैं। पीडि़त पक्ष के पास न्यायालय जाने के सिवा कोई चारा नहीं होता। यहां तक कि प्रथम सूचना रिपोर्ट भी अक्सर न्यायालय के हस्तक्षेप से ही लिखी जाती है। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के जनपद फैजाबाद में अयोध्या कोतवाली के अंदर एक होटल में कानून का मान रखने वाले एक दरोगा मानसिंह ने एक लड़की जिसका कुछ ही दिन पहले बलात्कार हुआ था, का दोबारा बलात्कार किया गया। दरोगा जी फैजाबाद उस लड़की को बड़े साहब से न्याय दिलाने के बहाने पड़ोसी जिले से लाए थे।
भारतीय समाज में बलात्कार केवल बलात्कार के परिभाषा से नहीं समझा जा सकता। यह शरीर पर किया जाता है लेकिन इससे छलनी आत्मा होती है। पीडि़ता के लिए जीवन नर्क बन जाता है। बलात्कार हत्या से भी बढ़कर भयंकर अपराध है, ऐसे में बलात्कार की सजा आजीवन कारावास या दस वर्ष के कारावास और जुर्माना है। हास्याप्रद यह है कि यदि कोई लोकसेवक या जेल अधीक्षक द्वारा यह कुकृत्य उनकी अभिरक्षा में किया जाता है। तो परिभाषा में सम्भोग करता है लिखा है। सजा पांच वर्ष की होगी और गिरफ्तारी बिना वारंट या मजिस्ट्रेट के आदेश के बगैर नहीं की जाएगी। लोकसेवकों पर मुकदमा भी सक्षम अधिकारी के बिना सहमति के नहीं चल सकता और अपराध जमानती है। भारतवर्ष में जिम्मेदार पदों पर बैठे वर्र्ग के लिए अलग कानून की व्यवस्था है ताकि मौजूदा सरकारों के प्रति उनकी निष्ठïा बनी रहे।
आजादी के 65 वर्षों के बाद भी बलात्कार जैसे घृणित एवं अमानवीय कुकृत्य पर न कभी कठोर कानून बनाए गए और न कभी अपने मौजूदा समय में सरकारों द्वारा इसमें संशोधन या बदलने की आवश्यकता ही महसूस की गई। कुछ विद्वान अधिकारी एवं नेता पहनावे में सुधार तथा समय से पहले घर के अंदर घुस जाने की मुफ्त सलाह देते हैं। तथाकथित विद्वानों को बच्चों के साथ दुष्कर्म और युवा महिला वकील पल्लवी पुरकायस्थ की हत्या के कारणों पर भी प्रकाश डालना चाहिए।
28 दिसम्बर, 2012 को जब अनामिका अपनी अंतिम सांसे ले रही थी, तब अचानक सरकार अनामिका की व्यथा से व्यथित हो उठी। दोषियों को जल्द सजा देने का अश्वासन प्रधानमंत्री ने दे दिया। कांग्रेस अध्यक्ष ने नववर्ष न मनाने की घोषणा कर दी। लेकिन क्या इससे अनामिका का सम्मान और हंसता-खेलता जीवन लौट आएगा। अगर अनामिका को सम्मान दिला सकता है तो सिर्फ कठोर कानून, जो देश की शेष अनामिकों की सुरक्षा की गारंटी दे।
समस्त भारत वर्ष में एक तरफ अनामिका बलात्कार कांड से दुख और आक्रोश का माहौल है तो वहीं दूसरी तरफ भारत-पाक का मैच हो रहा है। भारतीय क्रिकेट बोर्ड और देश के महान खिलाडिय़ों को जरा भी ख्याल नहीं आया कि क्रिकेट को टाल दिया जाए। और एक बार फिर भारत सरकार ने यहां भी संवेदना प्रकट करने का मौका खो दिया।
आज जब भारतीय सभ्य समाज को यह आभास हो चुका है कि छेडख़ानी और बलात्कार जैसी घटनाएं हमारे भारतीय समाज का हिस्सा बन चुकी हैं। अनामिका बलात्कार कांड इसी समाज के नरपिशाचों ने किया है। अब ऐसे नरपिशाचों के मंसूबे को कठोरता पूर्वक कुचलने का समय है।
समाज का युवा आज बहुत दिनों बाद जागा है। आज ऐसे कानून की भारतवर्ष को आवश्यकता है जो इस घृणित अपराध पर अंकुश लगा सके। अनामिका बलात्कार कांड सिर्फ बलात्कार ही नहीं है, बल्कि मातृत्व पर हमला है, अगर अब भी हमने समुचित कानून नहीं बनाया तो हमें वंदे मातरम्ï कहने का कोई अधिकार नहीं हैं।
आज युवाओं की संख्या समाज में ज्यादा है और समस्याओं से जूझना भी उन्हीं को पड़ता है। मैं युवा समाज से अपील करता हूं कि आप सब एकजुट हों, और अपने भारतीय सभ्य समाज के बारे में जो भविष्य में आपकी पीढिय़ों द्वारा स्थापित किया जाएगा और उस समय वह किस दिशा में होगा, इसका निर्धारण अब इसी समय करना होगा ताकि हमारे बच्चे और महिलाएं खुली हवा में सांस ले सकें। इसलिए समाज को सही दिशा में ले जाना हम सभ्य भारतीयों का नैतिक दायित्व है।
देश के भाइयों एवं बहनों बलात्कार जैसे घृणित अपराध के विरुद्ध क्या कानून होना चाहिए। इस पर अनेक मत हो सकते हैं निस्संदेह बलात्कार के विरुद्ध कठोरतम कानून बनाना चाहिए। मैंने युवा आंदोलनकारियों को फांसी की मांग करते सुना और देखा, कुछ का मत है कि तड़पा-तड़पा कर मार डालना चाहिए। कुछ बंध्याकरण का मत रखते हैं तथा कुछ अन्य देशों के कठोर कानून के अनुकरण की बात भी कहते हैं। परंतु मेरा मत कुछ अलग हो सकता है। मैं भी कठोरतम दंड चाहता हूं। क्योंकि बलात्कार और दुष्कर्म जैसे घृणित एवं जघन्य कृत्य सभ्य समाज में एक बीमारी की तरह हैं। अब हम बच्चों और बहन-बेटियों का इसका शिकार बनते नहीं देखना चाहते हैं। बलात्कार और दुष्कर्म करने वाले मानव भेडि़ए की सोच को सुधारवादी आंदोलनों से नहीं बदला जा सकता। ऐसे अपराधियों को कठोर कानून द्वारा ही नियंत्रित किया जा सकता है।
मेरे विचार से बलात्कार और दुष्कर्म के लिए विशेष कानून बनाना होगा। और इसके लिए विचारण की पारदर्शी और सपाट प्रक्रिया भी बनानी होगी। ताकि विचारण 6 माह की अवधि तक सम्पन्न हो सके। शीघ्रता का मतलब यह नहीं है कि बिना गुण-दोष के आधार पर बिना मंथन और विचार के सजा दे दी जाए। यह मेरा सुझाव है कि जो बारीक कमियां समय सीमा के निर्धारण की हों उनका सुधार न्याय हित में उच्चतम निर्धारित करें।
1. आबादी के अनुसार न्यायालयों की संख्या सुनिश्चित की जाए ताकि बलात्कार पीडि़त महिलाओं और उत्पीडि़त बच्चों के  प्रकरण की सुनवाई जल्द हो सके।
2. प्रत्येक जिले में जिला जज द्वारा एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की नियुक्ति की जाएं तो सिर्फ बलात्कार से सम्बन्धित मामलों की ही सुनवाई करें तथा उच्चन्यायालयों में भी ऐसी ही व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
(लेखक समाजवादी पार्टी के नेता व लविवि छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष हैं)बलात्कारियों के लिए दंड क्या हो
आजीवन कारावास, जिसका अभिप्राय अंतिम सांस तक करावास हो। सम्पूर्ण भारत वर्ष के प्रत्येक राज्य में एक-एक नई जेल बनाई जाएं जहां सिर्फ राज्य के दोष सिद्ध बलात्कारी रखे जाएं। प्रत्येक राज्य में सरकारें भूमि का एक बड़ा हिस्सा इस कार्य के लिए सुनिश्चित करें। जिसके मध्य जेल बनाई जाए एवं बचे हुए शेष भूभाग में वन्य जीव-जंतुओं के लिए जंगल स्थापित करें। जेल परिसर में अधिकारियों और आवश्यक कर्मचारियों के सिवा अन्य कोई प्रवेश न करे। किंही विशेष कारणों से प्रवेश के लिए अनुमति राज्य सरकार दे सकती है।
प्रत्येक कैदी से श्रम कराकर उसके खाने-पीने की चीजों को जेल परिसर में ही उत्पादित किया जाए। खाद्यान्न की कमी पर केंद्र और राज्य सरकारें खाद्यान्न की व्यवस्था करें।
जेलों के निकट मेडिकल रिसर्च सेंटर बनाए जाएं जहां डॉक्टर एवं वैज्ञानिक इन कैदियों पर रिसर्च करके समूची मानव सभ्यता के कल्याण के लिए कार्य करें परंतु विदेश से वैज्ञानिकों को रिसर्च के लिए आमंत्रण भारत सरकार का अधिकार हो।
कैदियों को पूर्णत: स्वस्थ रखा जाए। इसके लिए भारत सरकार एवं राज्य सरकारों को धन की व्यवस्था करनी होगी। हर तीन महिने बाद इन कैदियों से उनके सामथ्र्य के अनुसार ब्लड निकाला जाए जो जरूरतमंदों के लिए भारत सरकार, सरकारी ब्लड बैंकों में उपलब्ध कराए।
आवश्यकता पडऩे पर मानव अंगों को इन कैदियों से प्राप्त किया जा सके। मृत्योपरांत इनकी आंखें जरूरतमंदों को उपलब्ध कराई जाएं। मृत्यु होने के पश्चात इन कैदियों के शरीर पर भारत सरकार का अधिकार हो। भारत सरकार को यह अधिकार हो कि अपने देश में मृत शरीरों को छात्रों की पढ़ाई के लिए मेडिकल कॉलेजों आदि को उपलब्ध कराएं अथवा रीति-रिवाज से जेल परिसर में ही उनका सम्मानजनक अंतिम संस्कार करावाएं।
यदि किसी कैदी के पास कोई सम्पत्ति है तो वह भारत सरकार की होगी। यदि कैदी का कोई निकटतम रिश्तेदार नहीं है तो रिश्तेदार होने की दशा में रिश्तेदारों की होगी।  निकटतम रिश्तेदार का अभिप्राय माता-पिता बच्चे और पत्नी से है।
नाबालिग बच्चे चंूकि सही-गलत का निर्धारण अपने सामान्य बुद्धि से नहीं कर सकते। न्यायालय सुनाई करते समय उनका भविष्य ध्यान में रखते हुए दोष सिद्ध होने पर बालिग होने तक बाल जेलों में निरुद्ध रखे और पढ़ाई-लिखाई की समुचित व्यवस्था बाल जेलों में ही की जए। बालिग होने पर यदि दोबारा ऐसे अपराधों में पकड़े जाएं और दोष सिद्ध हो तो नरमी का प्रावधान खत्म माना जाए।

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