धार्मिक आस्था के साथ देश में मनाये जाने वाले सूर्य की उपासना के पर्व छठ का पौराणिक महत्व तो है ही, यह पर्व ग्रामीण परिवेश और लोकरीति को भी रेखांकित करता है। आधुनिकता के युग में इस लोकपर्व ने ग्राम्य जीवन और लोक परम्पराओं को जीवित रखने में योगदान दिया है।

अस्ताचल और उदयाचल सूर्य को नमन करने से स्वास्थ्य पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है जो इस पर्व के वैज्ञानिक महत्व को दर्शाता है।
लोक आस्था का यह पर्व पौराणिक काल से ही पूरी श्रद्धा और भक्तिभाव से मनाया जाता है। सूर्य की उपासना के इस पर्व का सबसे पहले उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। ऐसी कई कथाएं प्रचलित हैं जिनमें सूर्य की महिमा और छठ पर्व को करने के विधान बताए गए हैं। विष्णुपुराण, भगवतपुराण, ब्रह्मपुराण में भी छठ पर्व का उल्लेख मिलता ही है।
बिहार के सोनपुर के गजेंद्र मोक्ष नौलखा मंदिर के जगतगुए स्वामी लक्ष्मीनारायणाचार्य शास्त्री जी ने भाषा से कहा कि वैसे तो छठ व्रत का पुराणों में बहुत उल्लेख मिलता है। इसका उल्लेख ऋगवेद में भी है । इसे लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं रामायण काल से लेकर महाभारत काल तक इसका उल्लेख मिलता है।
उन्होंने बताया कि एक कथा के अनुसार ऋषि अर्क को स्वयं आकाशवाणी से इस महान पर्व को करने की प्रेरणा मिली थी । ऋषि अर्क कुष्ठ रोग से बुरी तरह से पीडिम्त थे, पीड़ा के कारण वे अपना शरीर तक त्यागना चाहते थे लेकिन तभी आकाशवाणी हुई और उन्हें इस पर्व की महिमा का ज्ञान मिला। जिसके बाद ऋषि अर्क ने पूरी श्रद्ध और भक्ति से इस व्रत को किया और अंतत: भगवान सूर्य की अनुकंपा से वे पूरी तरह ठीक हो गए।

 

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