15 अगस्त को हर देशवासी के मन में उठ रहा है यह सवाल

Irom Sharmila Chanuआम जनता को आतंकित करने वाले सशस्त्र बल कानून के खिलाफ पिछले 12 सालों से संघर्ष करने वाली इरोम शर्मिला अब किसी भी दल के लिए मुद्दा नहीं हैं। जेल की अंधेरी कोठरी में कैद शर्मिला को 15 अगस्त के दिन भी सूरज की पहली किरण देखने की इजाजत नहीं है। हमारे लोकतंत्र ने यह हक भी उससे छीन लिया है। उसे आदेश दिया गया है वहां रहने का जहां रोशनी को भी आने की इजाजत लेनी पड़ती है। अब सवाल उठता है उसे किस गुनाह की सजा मिली है, ऐसी क्या मजबूरी है? सवाल बहुत सीधे हैं मगर जवाब उस अंधेरे कमरे में कहीं खो गए हैं। मणिपुर में तीसरी बार सरकार बनाने वाली कांग्रेस के लिए इरोम अब कोई मुद्दा है ही नहीं। मणिपुर सरकार इरोम शर्मिला को जबरन नली के सहारे भोजन पहुंचा रही है ताकि वह जिंदा रहे। आजाद भारत में जनता के हक के लिए लडऩे वाली इरोम को जेल की अंधेरी कोठरी मिली है। इस साहसी महिला की दुनिया अंधेरी तब है जब ओलम्पिक में महिला मुक्केबाजी का कांस्य जीतने वाली एमसी मैरीकॉम भी इसी मणिपुर की हैं। सत्ता में न रहते हुए भी एक महिला सुपर पीएम हैं। लोकसभा में स्पीकर भी महिला और तो और नेता विपक्ष भी महिला। राज्यों में महिलाओं की ही सत्ता है। कहीं दीदी तो कहीं अम्मा। दिल्ली में भी महिलाओं का बोलबाला है। यहां मुख्यमंत्री शीला दीक्षित हैं तो भ्रष्टïाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाली टीम अन्ना की एक सदस्य किरन बेदी भी महिला ही तो हैं। वामपंथियों के खेमे की महिला वृंदा करात सक्रिय सदस्य हैं। शर्मिला कुछ बोलती तो नहीं, वह रोती हैं लेकिन उनके आंसुओं की ताकत और उनकी जीवटता ने ही देश के कोने-कोने से लोगों को उनके साथ खड़ा करना शुरू कर दिया है। कभी अन्ना तो कभी रामदेव चालीसा पढऩे वाले चैनलों ने भले ही इरोम की सुध न ली हो लेकिन देश भर से मिल रहे समर्थन ने इस साहसी महिला के संघर्ष को गूगल के सर्च इंजन से निकाल कर अब आम आदमी तक पहुंचा दिया है। न्यूज नेटवर्क 24 का इरोम शर्मिला के साहस को सलाम करता यह आलेख…

ईरोम को, मणिपुर के मालोम कस्बे में वर्ष 2000 में बस के इंतजार में खड़े 10 निहत्थे नागरिकों को केवल शक के कारण मार देने की घटना ने ऐसा झकझोरा कि वह इस एएफएसपीए का विरोध करने को उठ खड़ी हुईं। उन्होंने प्रण कर लिया कि अब वह अपने प्रदेश से एएफएसपीए के नहीं हटने तक अनशन करेंगी यानी यह आमरण अनशन था। ईरोम अपने निर्णय पर असमंजस में थी, लेकिन उनका यह निर्णय सही निकला और सरकार ने ठीक दो दिन बाद ही उन्हें बलपूर्वक खाना खिलाना शुरू कर दिया। ईरोम को न्यायिक हिरासत में ले लिया गया। तब से लेकर अब तक यह उनके सत्याग्रह का 11वां वर्ष है। ईरोम का अनशन आज विश्व का सबसे लम्बा चलने वाला अनशन है। सरकार ईरोम पर एक माह में लगभग 40 हजार रुपए खर्च करती है। आज ईरोम का वजन 66 किलोग्राम से घटकर 34 किलो रह गया। वह इस बात से और ऊर्जा से लबरेज हो जाती हैं कि अब वह अकेली नहीं हैं, अब और लोग भी उनके समर्थन में आगे आ रहे हैं। 10 जुलाई 2004 को एक युवती थांगजाम मनोरमा को उनके घर से सेना द्वारा उठा कर ले जाने व उसका बलात्कार कर, जान से मार देने पर उसकी मां खुमानलीला ने भी यह प्रण किया कि वह जब तक उसके दोषियों को सजा नहीं दिला लेती तब तक चैन से नहीं बैठेंगी। इस घटना ने वहां की महिलाओं को भीतर तक हिला दिया। फलस्वरूप वहां की आम घरेलू मणिपुरी की महिलाओं ने 15 जुलाई 2004 को असम राईफल्स के इलाकाई मुख्यालय के सामने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया। उनका नारा था कि ‘भारतीय सेना आओ और हमारा बलात्कार करो’। यह आजाद भारत की सबसे शर्मनाक घटना थी, लेकिन इसके बाद भी इस पर न तो केन्द्र और न ही मणिपुर सरकार की नींद ख्ुाली। मीडिया ने भी इस शर्मनाक घटना को नजरअंदाज किया। इरोम के समर्थन में वहां के युवतियां व छात्राएं नुक् कड़ नाटक के जरिए गरजती हैं और कहती हैं कि हम मांस के थरथराते झंडे हैं। देखो, बीच चौराहे पर हम लेकर खड़े हैं हमारी वही छातियां, जिन पर तिरंगे गाड़ देना चाहते थे तुम। अपने राष्ट्र से कहो कि वह घूरे हमें। अपनी राजनीति से कहो कि हमारा बलात्कार करे। अपनी सभ्यता से कहो कि वह हमारा सर काटकर फेंक दे हमें जंगल में। हमारी छोटी-छोटी उंगलियां काट कर लगा लो अपनी वर्दी पर, स्टार्स की तरह। यह एक पीड़ा है, जो अभिव्यक्त होती है नाटक में। लेकिन जो नाटक कह रहा है, वह सच्चाई भुगत रहे हैं यहां के बाशिंदे। टीआरपी की अंधी दौड़ में शामिल चैनलों पर, मणिपुर की खबर नेशनल मीडिया में नहीं आती। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना है कि यह कानून अमानवीय है। यह आश्चर्यजनक ही है कि जब सभी एक सुर में कह रहे हैं कि कानून अमानवीय है तो फिर इसे हटाने की पहल क्यों नहीं की जाती है। समीक्षा यह भी हो कि स्वायत्तता की मांग कर रहे भूमिगत समूहों की राज्य सत्ता को उखाड़ फेंकने का यह संघर्ष दबने के बजाए और व्यापक हुआ है। कई नए भूमिगत समूह खड़े हो गए हैं। तो फिर जिस मूल काम के लिए यह कानून लाया गया, वह तो खत्म नहीं हुआ। यह भी कैसी विडंबना है कि यह सरकार, हिंसक आंदोलन चला रहे नक्सलियों से बात करने को तैयार है, अपनी ओर से पहल करती है। असम में ही उल्फा से बात करने को तैयार है लेकिन क्या यह सरकारी दमन नहीं है कि मणिपुर में एक सत्याग्रही का अनशन पिछले 12 सालों से इस कानून को हटाने के लिए ही जारी है और सरकार उनसे बात तक नहीं करती है?
क्या केवल इसलिए शर्मिला से बात नहीं की जाती है कि वह तो सत्याग्रह कर रही हैं, सरकार का क्या बिगाड़ लेंगी? पिछले 12 वर्षों में सरकार ने केवल 65 लोगों को उनसे मिलने की इजाजत दी है, लेकिन सरकार मुगालते में है क्योंकि अब ईरोम के साथ पूरा देश एक हो रहा है। शर्मिला कुछ बोलती तो नहीं, वह रोती हैं लेकिन उनके आंसुओं की ताकत और उनकी जीवटता ने ही देश के कोने-कोने से लोगों को उनके साथ खड़ा करना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों शर्मिला के समर्थन में अहमदाबाद से लेकर श्रीनगर तक 10 राज्यों में 7300 किलोमीटर की यात्रा तय करता शर्मिला बचाओ जत्था भोपाल पहुंचा। जत्थे के लोगों की एक ही मांग है कि अब सरकार शर्मिला की बात सुने। यह शर्मिला के आंदोलन की खूबसूरती ही है कि उनके एक साथी ने कहा कि आपको यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक कड़ा पत्र लिखना चाहिए तो उन्होंने कहा कि यह मेरे सत्याग्रह के खिलाफ है। मैं शांतिपूर्ण तरीके से सत्याग्रह कर इस कानून को हटवाने के लिए अनशन पर हूं, मेरे आंदोलन से किसी को ठेस ना पहुंचे, नुकसान ना हो, यह ध्यान रखना भी मेरा दायित्व है। इरोम, ‘आम्र्ड र्फोसेज स्पेशल पावर एक्ट’ को मणिपुर से हटाना चाहती है। इसमें यह स्पेशल पावर होते हैं कि शक के आधार किसी की भी जान ली जा सकती है। वह दूसरों के लिए अपनी जिंदगी लगा रही है। लेकिन इस बात का असर किसी पर नहीं पड़ता है। क्योंकि अंधो के शहर में रोशनी करना और बहरों के शहर में संगीत का कोई मतलब नहीं होता है। इरोम की इस कोशिश को मीडिया ने भी अनशन का नाम दिया है। लेकिन पुलिस ने धारा 309 के तहत आत्महत्या करने की कोशिश में हिरासत में रखा है। इरोम का शरीर पीला पड़ चुका है पर आखों में चमक आज भी बरकरार है। एक प्रश्न और कि उसने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया कि उसे अपनी मां से मिलने की भी इजाजत नहीं जिसने उसे सांसे दी हैं।
अब तो इरोम की मां भी उनसे मिलना नहीं चाहती वह भी सिर्फ इसलिए कहीं बेटी के आसुओं को देखकर वह कमजोर न पड़ जाए। इरोम की मां का कहती हैं कि एक रात भूखे सोना कितना मुश्किल होता है। इरोम को इतने सालों से कितनी तकलीफ हो रही होगी। इरोम को नाक से लगी ड्रिप उसे जिंदा रखने की खुराक तो पहुंचा रही है पर उसे सबसे ज्यादा जरूरत है तो अपने संघर्ष
के परिणाम की। जिसे 11 साल हो गए हैं। लेकिन इरोम की आवाज आज भी अनसुनी है। आज इरोम को मणिपुर के लोग आयरन लेडी के रूप में जानते हैं, लेकिन गूगल पर। आम इंसान के कानों के आस-पास ऐसी कोई गूंज भी नहीं है। कभी वल्र्ड कप के दौरान तो कभी अन्ना के कारण बहुत सी खबरे ब्रेकिंग न्यूज नहीं बन पाती। हाल ही में सरकारी काबिल मंत्रियों के झुंड में से एक मंत्री ने कहा था कि वह बातचीत करेंगे व सहमति बनाने की जल्द ही कोशिश कारेंगे, लेकिन कोई सरकार से यह पूछे कि 11 साल क्यूं लग गए सहमति पर चर्चा के लिए। अब क्या फैसला इरोम की अन्तिम सांस के इंतजार में बचा रखा है। जिस देश में राजीव गांधी के हत्यारों पर माफी पर विचार किया जा सकता है। माफी की अपील की जा सकती है, उसी देश में एक महिला के अनशन पर बैठने का संघर्ष किसी को समझ में नहीं आता।
इरोम का दर्द इस कविता में साफ साफ महसूस किया जा सकता है
इरोम चानू शर्मिला की कविता

कांटो की चूडिय़ो जैसी बेडिय़ो से
मेरे पैरो को आजाद करो
एक संकरे कमरे में कैद
मेरा कसूर है
परिंदे के रुप में अवतार लेना

कैदखाने की अंधियारी कोठरी में
कई आवाजें आसपास गूंजती हैं
परिंदो की आवाजों से अलग
खुशी की हंसी नहीं
लोरी की नहीं

मां के सीने से छीन लिया गया बच्चा
मां का विलाप
पति से अलग की गई औरत
विधवा की दर्द-भरी चीख
सिपाही के हाथ से लपकता हुआ चित्कार

आग का एक गोला दीखता है
कयामत का दिन उसके पीछे आता है
विज्ञान की पैदावार से
सुलगाया गया था आग का गोला
जुबानी तजुर्बे की वजह से

एंद्रिकता के दाम
हर व्यक्ति समाधि में है
मदहोशी विचार की दुश्मन
चिंतन का विवेक नष्ट हो चुका है
सोच की कोई प्रयोगशीलता नहीं

चेहरे पर मुस्कान और हंसी लिए हुए
पहाडिय़ों के सिलसिले के उस पार से आता हुआ यात्री
मेरे विलापो के सिवा कुछ बचाकर नहीं रखतीं
ताकत खुद को दिखा नहीं सकती

इनसानी जिंदगी बेशकीमती है
इसके पहले कि मेरा जीवन खत्म हो
होने दो मुझे अंधियारे का उजाला
अमृत बोया जाएगा
अमरत्व का वृक्ष रोपा जाएगा

कृत्रिम पंख लगाकर
धरती के सारे कोने मापे जाएंगे
जीवन और मृत्यु को जोडऩे वाली रेखा के पास
सुबह के गीत गाए जाएंगे
दुनिया के घरेलू काम-काज निपटाए जाएंगे

कैदखाने के कपाट पूरे खोल दो
मैं और किसी राह पर नहीं जाऊंगी
मेहरबानी से कांटो की बेडिय़ां खोल दो
मुझ पर इल्जाम मत लगाओ
कि मैंने परिंदे के जीवन का अवतार लिया था…

(विष्णु खरे द्वारा हिंदी अनुवाद)

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