16 सौ करोड़ के ऊर्जा घोटाले पर पूछे गए सवाल पर सदन में सपा सरकार ने दिया गलत जवाब पढि़ए कैनविज टाइम्स के प्रधान सम्पादक प्रभात रंजन दीन की विशेष रिपोर्ट

Amar Singhजनहित से जुड़े महत्वपूर्ण मसले पर विधानसभा अगर सच की उपेक्षा करे और झूठ को संवैधानिक शक्ल दे तो आप समझ लें कि विधानसभा के औचित्य पर सवाल नहीं, संकट है। सरकार को सोच-समझ कर बहुत तैयारी के साथ सदन में जवाब प्रस्तुत करना होता है और सदन की शीर्ष पीठ पर आसीन व्यक्ति पूरी गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ उसे विधायी कार्यवाही में दर्ज करता है। लेकिन असलियत यही है कि सरकारें विधानसभाओं को बहुत हल्के में लेती हैं और सदन भी खुद की मर्यादा बचाए रखने में दिलचस्पी नहीं रख रहा है।

राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना में उत्तर प्रदेश में हुए 16 सौ करोड़ रुपए के घोटाले के प्रसंग में पूछे गए एक सवाल पर समाजवादी पार्टी की सरकार ने 29 जून को विधानसभा के शीर्ष सदन विधान परिषद में एक सफेद झूठ दर्ज कराया। उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से दिए गए जवाब में तथ्यपरक सूचनाओं की कमी का होना या तथ्यों से इन्कार किया जाना अत्यंत गंभीर मामला है। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना में 16 सौ करोड़ रुपए का घोटाला समाजवादी पार्टी के ही शासनकाल में हुआ था। बसपा-काल के पहले। सपा सरकार ने विधान परिषद में 29 जून को जो गलत जवाब पेश किया वह गैरजानकारी के कारण हुआ या पूर्व सपा नेता अमर सिंह को बचाने की नीयत से? इस प्रसंग में यह उल्लेख करना जरूरी है कि इस योजना की मंजूरी में उत्तर प्रदेश विकास परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष अमर सिंह सक्रिय रूप से शामिल थे। जांच से जुड़े दस्तावेजों में जिक्र है कि यह डील दुबई में हुई थी। उसमें यूपी पावर कॉरपोरेशन के तत्कालीन अध्यक्ष दीपक सिंघल भी मौजूद थे।

बहरहाल, अभी 29 जून को विधान परिषद में डॉ. यज्ञदत्त शर्मा ने 16 सौ करोड़ रुपए के घोटाले की सतर्कता अधिष्ठान से हो रही जांच की प्रगति के बारे में सरकार से सवाल पूछा और यह भी जानकारी मांगी कि इस सम्बन्ध में 22 मई 2007 को पूर्व सांसद भानु प्रताप वर्मा का मुख्यमंत्री को लिखा पत्र सरकार को प्राप्त हुआ कि नहीं। प्रदेश सरकार ने अपने जवाब में यह तो जानकारी दी कि सतर्कता अधिष्ठान से मामले की जांच रिपोर्ट प्रतीक्षित है, लेकिन साथ ही यह भी कह दिया कि पूर्व सांसद द्वारा मुख्यमंत्री को लिखा गया पत्र प्राप्त नहीं हुआ है। सब जानते हैं कि सरकार को किसी भी विषय पर जवाब देना होता है तो सम्बद्ध विभाग के आला अफसर से लेकर पूरा अमला तथ्यों की छानबीन और पुष्टि करने के बाद ही जवाब तैयार करता है, जिसे सदन में प्रस्तुत किया जाता है। क्या सरकार के आला नौकरशाह मुख्यमंत्री या मंत्री को अंधेरे में रख रहे हैं? क्या सचिवालय शासन को यह जानकारी नहीं दे पाया कि इतने बड़े घोटाले से सम्बन्धित पूर्व सांसद का पत्र बाकायदा मुख्यमंत्री दफ्तर में ‘रिसीव्ड’ है और औपचारिक रूप से सदन में उसकी आधिकारिक स्वीकारोक्ति भी की जा चुकी है? इतना बड़ा सच छुपा लिया गया या समाजवादी पार्टी अब भी अमर सिंह के दबाव में है और उन्हें इस घोटाला-प्रसंग से उबारने के लिए प्रयासरत है? तो क्या नई विधानसभा के सत्र की शुरुआत में सरकार ने सदन में विपक्ष को जो भरोसा दिया था कि अमर सिंह के समय की गलतियां नहीं दोहराई जाएंगी, वह गलत था? काबीना मंत्री अम्बिका चौधरी ने सदन में कहा था कि बड़े औद्योगिक घराने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से आकर मिल रहे हैं। तब सदन में यह बात उठी थी कि सपा के शासनकाल में विकास के नाम पर उत्तर प्रदेश विकास परिषद का गठन हुआ था और सपा नेता अमर सिंह इसके अध्यक्ष और सदस्य के रूप में अनिल अंबानी, अमिताभ बच्चन, सुब्रत राय सहारा वगैरह शामिल हुए थे लेकिन उम्मीद के अनुरूप परिणाम नहीं निकला था। सदस्यों ने यह उम्मीद भी जताई कि प्रदेश को पौंटी चड्ढा व जेपी गु्रप से मुक्ति मिलेगी। तब अखिलेश सरकार के वरिष्ठ दूत अम्बिका चौधरी ने इसे स्वीकार किया था और भरोसा दिया था कि इस बार पहले जैसा नहीं होगा।

सपा के पूर्ववर्ती शासनकाल में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत काम कराने के लिए नियम-कानून ताक पर रख कर 14 बड़ी कम्पनियों को मनमाने तरीके से ठेका दे दिया गया था। तीन सौ प्रतिशत की दलाली के अलावा बिना काम के 15 फीसद अग्रिम भुगतान और बाजार से तीन गुना अधिक दर पर काम कराने जैसे अनाप-शनाप फैसले लिए गए और 16 सौ करोड़ रुपए की ऐसी-तैसी कर दी गई। इससे लखनऊ समेत 65 जिलों के हजारों गांवों में विद्युतीकरण का बंटाधार हो गया। जिन कम्पनियों को काम मिला था उनमें लार्सन एंड टूब्रो, रिलायंस, जिटको, नागार्जुन समेत कई नामी कम्पनियां थीं। इसमें कई दक्षिण भारत की कम्पनियां शामिल की गई थीं।

इस घोटाला प्रकरण की प्रशासनिक जांच भी हुई और सपाई-सत्ता के खास दिनेश कुमार गुप्ता समेत करीब आधा दर्जन अधिकारियों के खिलाफ नोटिस जारी करने और निलंबन जैसी फौरी कार्रवाइयां भी हुईं, लेकिन घोटाले का मामला ढक्कन हो गया। विचित्र पहलू यह है कि सपा शासन के बाद सत्ता की कुर्सी सम्भालने वाली बहुजन समाज पार्टी ने सपा काल के इस घोटाले की जांच सतर्कता अधिष्ठान को दे कर सपा को राहत दे दी। अब आप ध्यान दें कि बसपा काल में ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय के सैकड़ों करोड़ के घोटाले की जांच समाजवादी पार्टी की सरकार ने सतर्कता अधिष्ठान को क्यों सुपुर्द कर दी। जबकि प्रदेश के लोकायुक्त ने उपाध्याय के घोटाले के अत्यंत विस्तृत और गंभीर होने के कारण उसकी सीबीआई से जांच कराने की मुख्यमंत्री से औपचारिक सिफारिश की थी। सतर्कता के बदले सतर्कता… घोटाले की जांच के इस ‘साम्य’ पर उठे सवाल का यही जवाब है। लेकिन समाजवादी पार्टी पर अब भी असर डाल रही ‘अमर-आंच’ का जवाब…?
साभार कैनविज टाइम्स

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