‘शोले’ हिंदी सिनेमा इतिहास की पचास श्रेष्ठ फिल्मों में एक है। इसे बनने में ढाई साल लग गए थे। लेकिन प्रोडक्शन में जाने से पहले कास्टिंग को लेकर भी खासी कवायद हुई। ठाकुर बलदेव सिंह के लिए प्राण साहब के नाम विचार किया गया। वो बिलकुल फिट बैठ रहे थे। उनके लिए तो यह बायें हाथ का काम था। लेकिन जाने क्या हुआ कि ‘सीता-गीता’ में काम कर चुके संजीव कुमार का नाम आ गया। उनके पक्ष में वज़न यह था कि यह आदमी हर किरदार को चैलेंज की तरह स्वीकारता है। जान डाल देगा। उनके नाम पर अंतिम मोहर लग गयी। और प्राण आउट हो गए।
धर्मेंद्र ठाकुर के किरदार के लिए मचल गए
वीरू के रोल के लिए धर्मेंद्र पहले से ही तय थे। लेकिन एक दिन धरम अचानक गरम हो गए। ठाकुर का किरदार हम करेंगे। एक शुभचिंतक ने समझाया। क्या कर रहे हो? अगर आप ठाकुर बनोगे तो संजीव वीरू का रोल करेंगे। हेमा पर फ़िदा हैं संजीव। हालांकि हेमा इससे पहले संजीव कुमार का प्रस्ताव सिरे से खारिज कर चुकी थी। लेकिन संजीव ने हार नहीं मानी थी। करीब आने का कोई न कोई बहाना ढूंढते थे। और वीरू के रोल में उन्हें यह मौका मिल जायेगा। और क्या भरोसा हेमा का। हैं तो दोनों कुंवारे न। ऐसे में हेमा गयी न हाथ से। इस आशंका के मद्देनज़र धरम पा’जी नरम हो गए।
हेमा के करीब रहने के लिए लाईट मैन को पटा रखा था
सुना तो यह गया था कि धरम पाजी इस हद तक हेमा पर फिदा थे कि लाईट मैन को पटा रखा था कि गाने की शूटिंग के दौरान कुछ न कुछ गड़बड़ कर देना ताकि बार बार रीटेक करना पड़े और इस बहाने हेमा के ज्यादा करीब रहने का मौका मिले। जय का क़िरदार शत्रुघ्न सिन्हा के लिए रिज़र्व था। लेकिन अमिताभ बच्चन ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया। सुना है किसी मंत्री-संत्री से सिफ़ारिश भी करवाई। दोनों एक दूसरे को चाहते भी बहुत थे। और डायरेक्टर रमेश सिप्पी मान गए। प्यार करने वालों के बीच दीवार नहीं बनूंगा। शूटिंग शुरू होने से पहले दोनों की शादी भी हो गयी। जब शूटिंग शुरू हुई तो बेटी श्वेता गर्भ में थी और शूटिंग ख़त्म हुई तो बेटा अभिषेक गर्भ में था।
अमजद नहीं गब्बर के लिए पहली पसंद थे डैनी
गब्बर के लिए पहली पसंद डैनी थे। परंतु वो फ़िरोज़ खान की ‘धर्मात्मा’ में व्यस्त थे। डेट नहीं निकाल पाए। अमजद खान को ले आये सलीम-जावेद। पहली नज़र में रमेश सिप्पी ने उन्हें रिजेक्ट कर दिया। लेकिन सलीम-जावेद को इत्मीनान था। उन्हें कई ड्रामों में देख चुके थे। फैमिली बैकग्राउंड भी वज़नदार थी। पिता जयंत माने हुए विलेन थे। बाद में वो चरित्र रोल करने लगे थे और भाई इम्तियाज़ भी मंजे हुए विलेन थे। सिप्पी अनिच्छा से राजी हो गए। बाकी तो हिस्ट्री है। पूरी फिल्म में सिर्फ़ नौ सीन में दिखे गब्बर अमजद खान का ख़ौफ़ पूरी फ़िल्म पर छाया रहा.…कितने आदमी थे.…तेरा क्या होगा रे कालिया…ये हाथ हमको दे दो ठाकुर…
वीर विनोद छाबड़ा

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