इस सप्ताह प्रदर्शित फिल्म ‘खामोशियां’ भट्ट कैम्प की ओर से पेश की गयी एक और हॉरर फिल्म है। हॉरर फिल्में बनाने में माहिर रामसे ब्रदर्स की जगह ले चुके भट्ट कैम्प ने इससे पहले ‘राज’ और ‘मर्डर’ जैसी सफल हॉरर फिल्में दी हैं। लेकिन इस कैम्प की ओर से अब हॉरर पर इतनी ज्यादा फिल्में बना दी गयी हैं कि लगता है कोई नया आइडिया उनके पास नहीं बचा। फिल्म की कहानी विक्रम भट्ट ने लिखी है। ‘खामोशियां’ में जो कुछ आप देखेंगे उसे अब भट्ट कैम्प की विभिन्न फिल्मों में देख चुके हैं। कहानी में जरूर कुछ नयापन है लेकिन फिल्म की रफ्तार बेहद धीमी है।

कबीर (अली फजल) एक लेखक है। उसकी प्रेमिका उसका साथ छोड़ कर किसी और से शादी कर लेती है तो वह अपना एक उपन्यास लिखने के लिए एकांत में जाने का निश्चय करता है। वह शहर से बाहर आता है और रास्ते में एक गेस्ट हाउस में रुकता है। गेस्ट हाउस को मीरा (सपना पब्बी) चलाती है। मीरा का पति जयदेव (गुरमीत चौधरी) लंबे अर्से से बिस्तर पर है। यहां रुकने के दौरान कबीर और मीरा एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं। लेकिन कबीर के साथ गेस्ट हाउस में कई डरावनी घटनाएं घटती हैं जिसके बारे में उसे लगता है कि यह सब मीरा जानती है लेकिन अनजान बनी हुई है। दरअसल मीरा का पति जयदेव दिखने में दूसरे इंसानों की तरह है, लेकिन उसके अंदर एक ऐसा राक्षस भी छिपा हुआ है जो उसे शैतान बना देता है। कबीर गेस्ट हाउस में ही रुक कर जयदेव और मीरा की असलियत जानने का फैसला करता है। सच सामने आने पर वह भौंचक्का रह जाता है।

अली फजल अपनी भूमिका में जमे हैं। उनके अभिनय में नित निखार आ रहा है। गुरमीत चौधरी की यह पहली फिल्म है। उन्होंने फिल्म में खासी मेहनत की है जो साफ नजर आती है। सपना पब्बी का काम भी ठीकठाक रहा। उन्होंने अभिनय से ज्यादा अपना सौंदर्य प्रदर्शित करने में रुचि दिखाई। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी की मांग के मुताबिक ही है। निर्देशक करण दर्रा यदि पटकथा पर और मेहनत करते तो यह और अच्छी फिल्म बन सकती थी।images

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