विनीत त्रिपाठी,
सीनियर मैनेजर-मीडिया एडवोकेसी, ब्रेकथ्रू

‘हे अंतिमा… अंतिमा सुन… जल्दी से पोछा लगा दे फिर कुछ कर। अरे काफी…. देख तेरे भाई को स्कूल जाना है जल्दी से उसके लिए नाश्ता बना दे। आप सोच रहे होंगे यह मैं क्या लिख रहा हूं। चौंकिए मत ये कहानी हरियाणा और उसी तरह के कई प्रदेशों की कहानी है जहां बेटे को बेटी के ऊपर तरजीह दी जाती है और बेटे की चाह में कई अनचाही बेटियां दुनिया में आ जाती है और इनके बाद और कोई बेटी जन्म न ले इसलिए इनका नाम काफी या अंतिमा रखा जाता है जिसका मतलब होता है कि अब काफी हो गया या यह अंतिम है यानी अब और बेटी नहीं चाहिए। देश भर में जहां कई सालों से सरकार बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ का नारा दे रही हैं वही डराने वाला तथ्य यह है कि तमाम प्रयासों के बाद भी पूरे देश में जन्म के समय लिंगानुपात 906 से घटकर 899 हो गया है। इसकी तस्दीक थिंक टैंक नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट (2020—21) करती है।
प्रो अमर्त्य कुमार सेन ने अपने विश्व प्रसिद्ध लेख “मिसिंग वूमेन” में सांख्यिकीय रूप से यह साबित किया है कि पिछली शताब्दी के दौरान दक्षिण एशिया में 100 मिलियन महिलाएं गायब हुई हैं। ऐसा महिलाओंं के साथ जीवन भर होने वाले भेदभाव के कारण हुआ है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार 2019 में देश में प्रतिदिन बलात्कार के औसतन 87 मामले दर्ज हुए और वहीं 2019 में महिलाओं के खिलाफ अपराध (Crime against Women) के कुल 4,05,861 मामले दर्ज हुए जो 2018 की तुलना में सात प्रतिशत अधिक हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के आंकड़ों पर आधारित एक रिपोर्ट मुताबिक देश में 84.7% पुरुषों के मुकाबले में 70.3% महिलाएं ही साक्षर हैं।यह रिपोर्ट जुलाई 2017 से जून 2018 के आंकड़ों के आधार पर तैयार की है।
लड़कियों के सामने पितृसत्तात्मक सोच से उपजे भेदभाव को कोविड-19 जैसी महामारी ने और अधिक बढ़ा दिया। देश के 5 राज्यों में.‘मैपिंग द इंपैक्ट ऑफ कोविड-19’ नाम से हुई एक स्टडी के मुताबिक, इसकी पूरी संभावना है कि कोविड की वजह से सेकेंडरी स्कूल में पढ़ रही लगभग 20 मिलियन लड़कियां शायद कभी स्कूल न लौट सकें। स्टडी में सामने आया है कि किशोरावस्था की लगभग 37% लड़कियां इस बात पर निश्चित नहीं थी कि वे स्कूल लौट सकेंगी। ई-लर्निंग के दौरान लड़कियों के पीछे जाने का एक कारण ये भी है कि वे स्कूल न जाने के कारण घर के कामों में लगा दी जाती हैं।
तकरीबन 71 प्रतिशत लड़कियों ने माना कि कोरोना के बाद से वे केवल घर पर हैं और पढ़ाई के समय में भी घरेलू काम करती हैं. वहीं लड़कियों की तुलना में केवल 38 प्रतिशत लड़कों ने बताया कि उन्हें घरेलू काम करने को कहे जाते हैं। कोविड के कारण लड़कियों की पढ़ाई एक बार रुकने से उनकी जल्दी शादी के खतरे भी बढ़ गए हैं। वर्ष 2019 में ‘चाइल्ड राइट्स ऐंड यू’ (क्राई) की रिपोर्ट ‘ऐजुकेटिंग द गर्ल चाइल्ड’ के मुताबिक देशभर में स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों में से 25.2 फीसदी लड़कियां स्कूल दूर होने की वजह से स्कूल छोड़ देती हैं। किसी अनहोनी होने का भय लड़कियों के स्कूल तक पहुंचने की हिम्मत और जरूरत पर भारी पड़ता है।
आंकड़ों से स्पष्ट है कि शिक्षा हो या अवसर या फिर आने-जाने की आजादी या फिर उनके साथ होने वाला अपराध हर जगह लड़कियों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उनकी पहचान उनके अस्तित्व से ज्यादा उनके जेंडर से की जाती है। घर हो या बाहर वो हर जगह असुरक्षित महसूस करती है। कई बार उनको जन्म ही नहीं लेने दिया जाता है या जन्म लेने के बाद भी उन्हें मार दिया जाता है। झूठी इज्जत के नाम पर उनके निर्णय लेने की क्षमता को भी छीन लिया जाता है। उसके खिलौने से लेकर करियर और शादी तक का चुनाव उसकी मर्जी से नहीं होता है।उसकी इच्छाओं के आगे बेटे को तजरीह दी जाती है।
लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। 10 वीं या 12 वीं के परिणाम हों या फिर कोई भी प्रतियोगी परीक्षा,राजनीति का क्षेत्र हो या न्यायपालिका या फिर खेल,जहां भी अवसर मिला है लड़कियों ने सफलता के नए आयाम बनाएं हैं उदाहरण के लिए टोक्यो ओलंपिक में पदक विजेता मीराबाई चानू हो या फिर सेमीफाइनल तक पहुंची महिला हॉकी टीम की कई सदस्य,उन्होंने न्यूनतम साधनों पर अधिकतम परिणाम दिए हैं। टोक्यो पैरालंपिक में गोल्ड पर निशाना लगाने वाली अवनि लेखरा पैरालंपिक खेलों में पदक जीतने वाली पहली महिला निशानेबाज हैं। ओलपिंक में 21वीं सदी की शुरुआत से भारत को जो 16 पदक मिले उनमें आठ महिलाओं के नाम रहे। आर्थिक गतिविधियों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है,आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2019 के मुकाबले 2020-21 में 77 फीसदी अधिक महिलाएओं ने डीमैट खाता खोला। छठी आर्थिक जनगणना के अनुसार देश में कुल 5.85 करोड़ उद्यमियों में 80.5 लाख महिलाएं हैं।
जिस देश में लड़कियों को जन्म से ही बोझ समझा जाता हो वहां इस तरह की कहानियां उम्मीद पैदा करती है कि शायद इससे लोग लड़कियों की वैल्यू समझ पाएं और लड़का-लड़की के भेद से आगे बढ़ कर उनको शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में बराबर के अवसर उपलब्ध कराएं। माता-पिता को भी अपनी लड़कियों को पढ़ाई में उनके पसंद का विषय चुनने, बाहर आने-जाने, खुद निर्णय लेने, आर्थिक मामलों को देखने सहित दहेज की जगह उन्हें पारिवारिक संपत्ति में हिस्सेदार बनाने की जरूरत है । यदि परिवार खुद अपनी बेटियों के साथ खड़े होने लगेगें तो समुदाय अपनेआप ही साथ आ जाएगा। अगर महिलाओं को अपनी पूरी क्षमता से आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा तो वह परिवार के साथ ही देश और समाज के लिए भी बेहतर होगा। सरकारों को भी अपनी योजनाओं में लड़कियों की शादी से ज्यादा उन्हें पढ़ने और आगे बढ़ने के साधन व अवसर उपलब्ध कराने पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है जिससे लड़कियों को भी लड़कों की तरह ही अवसर व साधन मिल सकें। इन सबके बिना डाटर्स डे की सार्थकता बेमानी है।

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